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अपनी कमज़ोरियों को दूर करें। To overcome your weaknesses

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स माया रूपी संसार में सुख काम दुःख अधिक है। सुख और दुःख हमारे जीवन के दो पहिए हैं। इनके सहारे हमारी जीवन नैया चल रही है। “चिंता” ही सबसे अधिक दुःख का कारण बनती है। क्योंकि चिंता ही और चिता में ज्यादा अंतर नहीं यदि इनमें कोई अंतर है तो यही की चिता तो मानव को एक ही बार जला देती है परन्तु चिंता धीरे – धीरे अंदर से खाती रहती है।

चिंता कहा से पैदा होती है ? Where Concerns Arise?



निरंतर असफलता, गरीबी और रोग को हम मुख्य कारण मानते हैं। इनसे ही चिंता के बीज फूटते हैं। यदि इंसान समय पर उनका उपचार नहीं कर पता तो यही बीज वृक्ष का रूप धारण कर लेते हैं। हीन भावनाएँ भी चिंता का कारण बनती हैं। कई लोग बचपन से ही दब्बू होते हैं। वह अपनी सच्ची बात को कहने में भी संकोच करते हैं।

कोई भी चिंतित मानव (Human) बेफ़िक्र मस्त लोगों की तरह कहकहे नहीं लगा सकता। वह तो रोएगा अगर उसकी आँखे नहीं रोएँगी तो उसका मन रोएगा। इसका परिणाम क्या होगा ? उसके स्वास्थ्य (The Health) पर बुरा प्रभाव और नए – नए रोगों का जन्म लेना। यह नहीं भूलना चाहिए कि मानव हृदय (Human Heart) अति कोमल होता है। ठीक फूल की भाँति। जब भी आप उस फूल पर चिंताओं का बोझ डालेंगे तो आप स्वयं कल्पना कीजिए कि उस फूल का क्या हाल होगा जो चिंताओं के बोझ से दब गया है। क्या वह अपनी आभा को बचा पाएगा ? क्या वह हँस सकेगा ? नहीं ।

बस यही हाल हमारे मन का भी है। यह मन जब भी चिंता के बोझ से दबता है तो हमारा यह शरीर किसी न किसी रोग का शिकार हो जाता है। हमारे शरीर के आधे से अधिक रोग चिंताओं के कारण ही पैदा होते हैं। बाकी कुछ रोग असंतुलित भोजन के कारण होते हैं। असफलता और चिंता का आपसी मेल है। कुछ रोग छुआछूत (Untouchability) से पैदा होते हैं बाकि के प्राकृतिक रोग होते है। असफलता एक बीज है जो चिंता का जन्म देता हैं और चिंता का बीज रोगों को जन्म देता है। मानव (Human) चिंता का कारण अपनी ही कमजोरियों से होता है। यह कमजोरियाँ (Weaknesses) अधिकतर कल्पना के ताने बानो में उलझने से पैदा होती हैं। मैंने अक्सर लोगों को कल्पना में डूबकर अपने लिए दुःख खरीदते देखा है। बिना किसी वजह के वह अपने लिए चिंता पैदा करते हैं।

उदाहरण के लिए मैं आपको एक ऐसे आदमी की कहानी सुनाता हुँ जो किसी कारण वश दुर्घटना का शिकार हो गया। वह अस्पताल (Hospital) में पड़ा यही सोचता रहता था कि -” अब तो मैं अपराजित हो जाऊँगा। डॉक्टर मेरी टाँग काट देंगे तो में कैसे चल पाऊँगा। जब मैं चल नहीं पाऊँगा तो मेरा क्या होगा ? मैं काम नहीं कर पाऊँगा तो खाऊँगा क्या ? क्या मैं और विकलांगों (The Disabled) की तरह सड़कों पर रेंग – रेंगकर चलता हुआ भिक्षा मागूँगा। लोग मेरी ओर दया की दृष्टि से देखते हुए नफ़रत से पच्चीस -पचास पैसे फ़ेंक दिया करेंगे। नहीं …. नहीं ….नहीं ….। मैं ऐसा जीवन नहीं जीना चाहता। ऐसे जीवन से तो मौत ही अच्छी है। डॉक्टर साहब मेरी टाँग काटने से तो अच्छा है की आप मुझे जहर का टीका लगा दें ताकि मैं आराम से मर तो सकूँ। “

अब आप कल्पना करो कि उस आदमी ने अपनी मृत्यु को बुला लिया परन्तु टाँग तो उसकी कटी ही नहीं। बस डॉक्टर ने प्लास्टर चढ़ा दिया जो कि दो मास के पश्चात खुला तो उसकी टाँग बिल्कुल सही हो गई। ऐसे लोग बिना प्रयोजन के ही रोग खरीदते रहते हैं और समय से पूर्व ही मौत की बातें सोचते हैं। जबकि प्रकृति (Nature) ने मानव की हर इच्छा पूर्ति के साधन पैदा कर रखे हैं। धरती और धन का बटवारा इंसान ने किया है , प्रकृति (Nature) ने नहीं।

मानव धर्म से बड़ा कोई धर्म नहीं। लेकिन इंसान ने अपनी स्वार्थ के लिए धर्म के नाम की लकीरें खड़ी करके एक इंसान को दूसरे इंसान से जुदा कर दिया। आदि मानव का न तो कोई घर था , न कोई शहर , न कोई देश और न कोई धर्म। इसलिए उसे कोई चिंता नहीं थी। प्रकृति ने उसे इतना बड़ा संसार दिया। जलवायु, (Climate) प्रकाश, पृथ्वी , खाने – पीने के लिए अनेकों प्रकार के फल। यह सब उस मानव के लिए तो किया गया था। वहीं मानव देशों में बंटा , धर्मो में बंटा। उसने प्रकृति के दिए उपहारों का व्यापार शुरू किया। धनवान, (Rich) भूस्वामी (Landlord) बनकर वह प्राकृतिक साधनों (Natural Resources) को भी बेचने लगा।

यही था चिंता का बीज और हीन भावना की नींव रखने का कारण। जिन लोगों ने प्रकृति की बनाई चीज़ों पर अपना अधिकार जमा लिया और सीधे – सादे लोगों को अपना गुलाम बना कोई शासक बना, कोई जागीरदार, कोई सेठ , कोई अत्याचारी और खूनी बना तथा कोई साधु – संत, ऋषि – मुनि, ज्ञानी बना। बड़े – छोटे, जात – पात, धर्म – अधर्म सबका जन्म इसी धरती पर हुआ। मानव निरंतर आगे बढ़ता रहा। धर्म केवल पूजा का माध्यम रह गया है। प्रकृति को चुनौती (Nature Challenge) देने वाले मानव धर्म को क्या जानते?

बड़े लोगों ने प्रकृति के सब नियम तोड़े और धनवान बने जो प्रकृति के उपासक (Nature Worshipers) थे उनके पास धन नहीं था। उनके मन में हीन-भावना (Inferiority Complex) ने जन्म ले लिया। धन के ढेर के नीचे दबकर उनकी बुद्धि की कोई कीमत न रही। बुद्धिमान और ज्ञानी (Wise and knowledgeable) उसे ही कहा जाने लगा जो धनवान था। जो लोग धनवान न बन सके वे निर्धन और निम्न वर्ग से सम्बन्ध रखने लगे। तभी उनके मन में यह विचार पैदा हुआ कि वे छोटे हैं उनके मन में चिंता पैदा होने लगी। निराशा और असफलता ने उन्हें बुजदिल (Faint of Heart) बना दिया। वह अपनी जिम्मेदारियों को निभा न सके। उन्हें तो कई बार यही संदेह होने लगता था कि हम बुद्धिमान हैं जो कुछ कर ही नहीं पा रहे हैं। छोटेपन और बुद्धिहीन की भावना उनकी हर उन्नति की शत्रु बन गया।

ऐसा कोई भी व्यक्ति हो वह अपने को छोटा ही समझ बैठेगा। उसके मन में छोटेपन का जो भय पैदा हो गया वह निकलेगा कैसे? वह अपनी सारी योग्यता की भूलकर चिंता में डूब जाता है। उसकी आवाज़ भी दबी-दबी रहती है। उसे हर समय यही संदेह रहता है कि लोग उसका मज़ाक उड़ा रहे हैं।

कहने का भावार्थ (Argument) यही है कि ऐसे लोग चिंता के कारण ही अनेक रोगों का शिकार हो जाते हैं। ऐसे लोग जब जीवन के हर सुख से वंचित हो जाएँगे तो उनके पास यही एक चिंता तो रह जाएगी। उनके मन में हीन भावना पैदा होगी। वे कभी भी ऊपर नहीं उठ पाएँगे?

नहीं, उनका जीवन कभी सुखी नहीं रहता। No, His Life Is Not Always Happy.

भूख और गरीबी की भट्ठी में जलकर वे लोग अपनी बुद्धि तक खो बैठते हैं। इसे ही हम हीनभावना कहते हैं। हीनभावना के कारण ही अनेक लोग अपनी तीव्र बुद्धि का भी लाभ नहीं उठा सकते। हिप्नोटिज्म! (Hypnotism) विद्या का पहला नियम है – “अपने आप पर पूरा भरोसा, विश्वास।” यदि आपके मन में आत्म विश्वास नहीं है तो भले ही आप कितने बड़े बुद्धिमान क्यों न हो, आप सफल नहीं हो सकेंगे। यदि आप कोई जरुरी काम करते हुए घबराते हैं या डर महसूस करते हैं तो फिर सफलता की आशा न रखें।

हिप्नोटिज्म (Hypnotism) का अर्थ है -“आत्म विश्वास” (SELF CONFIDENCE) आप किसी भी रोगी का उपचार करने से पूर्व बुद्धि में यह बात बैठा लें कि मुझे सफल होना है और मैं सफल होकर रहुँगा। असफलता से मैं उतनी घृणा करता हुँ जितनी की लोग मौत से करते हैं। हिप्नोटिज्म (Hypnotism) माँगता है विश्वास। जिन लोगों को अपने आप पर ही विश्वास नहीं है वे कहाँ सफलता प्राप्त कर सकते हैं?

किसी भी काम को शुरू करने से पहले मन में यह धारणा कर लें कि -“मैं इस काम को बड़ी जल्दी पूरा कर सकता हुँ। पराजय मेरे सामने कभी भी खड़ी नहीं हो सकती। विजय को प्राप्त करना मेरा लक्ष्य है। हीनभावना कई प्रकार की होती है

1. कई लोग बात करते – करते जबान से बहकने लगते हैं।

2. काम करते – करते अपने आप ही सोचने लगना कि यह गलत है।

3. यदि किसी के नेक काम की प्रशंसा की जाए तो उसका मन टूट जाता है।

4. यदि किसी अच्छी पार्टी या शादी का निमंत्रण पत्र मिले तो हमारा मन अपने आप टूट जाता है और हम कमजोरपड़ जाते हैं।

प्रसिद्ध विद्वान तथा मनोवैज्ञानिक (Psychological) “अलफ्रीड एलडर” (Alfreed Elder) का मत है जो उन्होंने इन शब्दों में बताया है- “हीनभावना (Inferiority Complex) का मारा हुआ आदमी हर समय यह सोचता रहता है कि प्रत्येक आदमी उससे ज्यादा बुद्धिमान है। उसके अंदर जरूर कोई ऐसी कमी है जिसके कारण वह सफल नहीं हो पा रहा है।” ऐसा अहसास हर समय उसके मस्तिष्क को घेरे रखता है। यह एक ऐसा अहसास है जो आदमी को अपनी विशेषता और बुद्धि का अंदाजा ही नहीं होने देता।

हीनभावना (Inferiority Complex) सदा ही नुकसान नहीं देती। संसार में ऐसे बहुत से बड़े और विशेष काम ऐसे लोगों ने किए हैं जो किसी ने किसी कारण से हीनभावना (Inferiority Complex) के शिकार थे। उदाहरण के लिए मैं आप को बताता हुँ “इमानोंटीलकांट” (Immanuel Kant) जो अपने शरीर के अंगो की कितनी ही त्रुटियों के कारण अपनी ही हीनभावना (Inferiority Complex) का शिकार हो गया। इसी कारण उसके मन में प्रतिशोध की जो ज्वाला भड़की तो उसका यह परिणाम हुआ कि उस दुःखी विकलांग ने संसार को ऐसी पुस्तकें दी जिनमें ऐसे ही लोगों की पीड़ा भरी पड़ी थी। मैं अपने पाठकों को यह बता दूँ कि “कांट” की शक्ल भी बड़ी भद्दी थी। लोग उसे देखकर घृणा करते थे। लड़कियॉ तो उसे देखते ही नाक, भौ सिकोड़ कर दूर से निकल जाती थीं। हर जगह नफ़रत, घृणा। “कांट” को इस समाज से घृणा और नफरत मिली थी। वह एकांत में बैठा यही सोचता रहता कि-“इसमें मेरा क्या दोष है? जो लोग मुझसे घृणा करते हैं। उन्हें तो ईश्वर से घृणा करनी चाहिए। जिसने मुझे ऐसा जीवन दिया है। मैं जो कुछ भी हूँ अपने आप से तो नहीं हूँ फिर मुझसे घृणा क्यों?”

ऐसे ही विचारों पर आधारित जो पुस्तकें कांट ने अंग्रेजी भाषा में लिखी उन्हें आज आलोचक लोग भी अमर कृतियों के नाम से याद करते हैं।

हीनभावना क्यों पैदा होती है? इसका प्रभाव मानव शरीर पर कैसे पड़ताहै?” Why Is Inferior Arises? How Does It Affect The Human Body?

यदि कोई विद्यार्थी एक बार परीक्षा में असफल हो जाता है तो वह उस सफलता को रो-पीटकर सहन कर लेता है। परन्तु जब निरंतर असफल होता रहेगा तो उसके मन में अपने बारे में हीनभावना (Inferiority Complex) पैदा हो जाती है। जिसका परिणाम यह होता है कि वह हर परीक्षा से डरने लगता है। यह ही तो है हीनभावना।

कभी –  कभी आप इसलिए भी हीनभावना (Inferiority Complex) का शिकार हो जाते हैं कि आप किसी दूसरे से बहुत सी आशाएँ जोड़ लेते हैं और वे आशाएँ पूरी नहीं हो पाती तो आपके मन में हीनभावना (Inferiority Complex) जन्म ले लेती है। जैसे कि आजकल हमारे समाज में यह बात तो आम ही होती चली आ रही है- “प्रेम” और जब दो प्रेमी मिलते हैं तो शादी से पहले पूरी सोने की लंका खड़ी कर लेते हैं। चाँद को आकाश से लाकर प्रेमिका की झोली में डालने की बातें करते हैं।

चौदहवीं का चाँद हो या आफताब हो

जो भी हो तुम खुदा की कसम लाजवाब हो”

ऐसी बातें शादी से पहले खूब होती हैं क्योंकि ये बातें और वायदे करने में लगता ही क्या है। तभी तो कवि ने कहा है-

कसमें, वायदे, प्यार, वफा

यह सब बातें हैं इन बातों का क्या”

शादी के बाद जब प्रेमिका पत्नी का रूप धारण करती है तो आप उसके लिए साड़ी खरीदने से भी मजबूर हो जाते हैं। ऐसे में आपके मन में हीनभावना (Inferiority Complex) पैदा होगी ही।

इसमें दोष किसका है?” Whose Fault Is It?

जब आप आकाश का चाँद लाकर उसके दामन में डालने की बात कर रहे थे तो आपने यह क्यों नहीं सोचा कि यह असंभव चीज़ है जो सपने में भी पूरी नहीं हो सकती। अब आप अपनी पत्नी ( जो कभी प्रेमिका थी ) के सामने बेबस और मजबूर होकर खड़े हो जाते हैं और अपने को उसके सामने एक अपराधी की तरह महसूस (Feel) कर रहे हैं।

किसी मित्र की उन्नति देखकर भी आप में छोटेपन की भावना पैदा हो सकती है। आपका कोई मित्र यदि धनवान बन जाता है तो उसके सामने आपके मन में छोटेपन का विचार पैदा हो सकता है। धनवान और निर्धन (Rich and Poor) के बीच की खाई को कौन भर सकता है? यही अंतर तो छोटा – बड़ा बना देता है।

कुछ लोगों को खूब हँसी मजाक (Sport) करते देखा गया है किन्तु जब मजाक का रुख उनकी ओर हो जाता है तो वे परेशान हो जाते हैं और इनमें से कुछ ऐसे भी होते हैं कि मज़ाक – मज़ाक (Practical Joke) में उन्हें क्रोध भी आ जाता है। इस क्रोध में लड़ाई भी हो जाती है। अब आप स्वंय सोचें कि क्या आप हीनभावना का शिकार हैं? यदि आप हीनभावना का शिकार हो ही गए हैं तो फिर आप क्या करोगे?

इससे पहले कि बचने के कुछ उपाय बताए जाएँ आपको यही सलाह दी जाती है कि अपनी इस कमजोरी को छुपाने के लिए कुछ ऐसा सोचें कि जिससे लोगों को यह अंदाजा हो जाए कि आप कोई विशेष आदमी नहीं हैं अथवा आप हीन भावना के कारण कोई ऐसी बात कर रहे हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपनी ही कमजोरी से डरते रहते हैं। आम समाज में वह लोग अपना रोब मारने के लिए अच्छे, बढ़िया कपड़े पहनते हैं। किसी महफ़िल में जाकर अधिक से अधिक बातें करते हैं-  बात पर बिना वजह हँसते रहते हैं ताकि लोग उनकी कमजोरी को न पकड़ लें।

लेकिन इस प्रकार की खोखली (Hollow) और झूठी बातों का कोई लाभ नहीं हो सकता। अंततः तो एक दिन आपकी पोल खुल जाएगी। लोग आपसे अधिक भी होशियार बैठे हैं। आप जब भी कभी कहीं जाकर शेखी मारेंगे अथवा झूठी शान जिताएँगे तो आपकी आत्मा स्वंय ही आपको बुरा भला कहेगी। आप यह जानकर दुःखी होंगे कि आप वास्तव में वह नहीं हैं जो कह चुके हैं। यही भावना आपको अपनी ही नजरों में छोटा बना देगी और आप हीन भावना का शिकार हो जाएँगे।

औरतें अपने चेहरे को सुंदर से सुंदर बनाने के लिए संसार भर के मेकअप करती हैं। दिखावा और बनावट के सिवा इन लोगों के पास कुछ नहीं रहा। ऐसे में यदि लोग मन की शांति और निरोगी शरीर की तलाश करेंगे तो क्या यह सम्भव हो सकता है?

नहीं बिल्कुल नहीं” Nope Not At All.

मैं यही प्रार्थना करुँगा कि इन सब बातों से दूर रहें। यह सब बातें आपका समय ख़राब करती हैं इसके साथ – साथ आपके लिए चिंता का कारण भी बनती हैं। बनावटी जीवन (Artificial Life) में शारीरिक आनंद (Physical Pleasure) तो भले ही अधिक है परन्तु मानसिक शांति (Mantle Piece) नहीं है, और जिस मानव के पास मानसिक शांति नहीं है वह कभी भी पूर्ण रूप से स्वस्थ नहीं रह सकता।

रोग – निरोग। इन दोनों में से आपको किस चीज़ से प्रेम हो सकताहै?” Disease – Healthy. Of These Two, What You Might Love.

इस प्रश्न का उत्तर आप स्वंय निरोग (Healthy) ही देंगे। प्रेम निरोगी शरीर (Healthy Body) के लिए आपको जो कुछ भी चाहिए वह आप क्यों नहीं तलाश करते?

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