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समय समायोजित चालू अनुपात (Time Adjusted Current Ratio)

Time Adjusted Current Ratio alloverindia.in

म लोगों ने पहले देखा था कि सभी प्रकार की चालू सम्पत्तियाँ एक समान रउओ से तरल नही होती है और सभी चालू दायित्व  भी तीव्रता की एक समान मात्रा  की दृष्टि  से पुनर्देय नहीं होते। इसके अतिरिक्त आज प्राप्त होने वाला मुद्रा  का मूल्य एक निश्चित अवधि के पश्चात  प्राप्त होने वाली मुद्रा के उतनी ही राशि से अधिक होता है। इसलिए जितना शीघ्र रकम  प्राप्त हो जाय, वह उतना ही उत्तम माना जाता है। अतः यदि चालू अनुपात को ‘तरलता का सूचकांक’ की तरह प्रयोग किया जाय तो इसे मुद्रा के समय मूल्य  लिए समायोजित करना पड़ेगा। विभिन्न चल सम्पत्तियों और चल दायित्वों को ‘कटौती घटक से गुणा करके मुद्रा के समय मूल्य के लिए समायोजित किया जा सकता है।

त्वरित या अम्ल -परीक्षण या तरल अनुपात (Quick or Acid Test or Liquid Ratio)

त्वरित अनुपात, जिसे अम्ल परीक्षण या तरल अनुपात के नाम से भी जाना जाता है, चालू अनुपात की अपेक्षा तरलता का एक अधिक कठोर व सटीक परीक्षण से है। ‘तरलता ‘ शब्द का आशय संस्था की अपने अल्प -कालीन दायित्वों का देय तिथि पर भुगतान करने के सामर्थ्य से है। तरलता की माप के रूप में, चालू सम्पत्तियाँ और चालू दायित्व ये दोनों चालू अनुपात के निर्धारक होते हैं। चालू सम्पतियों में स्कंध और पूर्वदत्त  व्यय भी शामिल होते हैं किन्तु ये दोनों ही अल्पवधि में आसानी से रोकड़  में परिवर्तनीय नहीं होते हैं।



अतः चालू सम्पतियों की इन दोनों मदों को छोड़कर शेष के आधार पर अनुपात की गणना की जाती है जिसे तरल या त्वरित अनुपात कहते हैं। त्वरित अनुपात को त्वरित/तरल सम्पतियों और चालू या तरल दायित्वों के बीच  संबंध के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। कोई सम्पति तभी तरल कही जाती है जब वह अल्पवधि में बिना किसी हानि के करोड़ में परिवर्तित की जा सकती है।   इस अर्थ में, हस्तस्थ रोकड़ और बैंक में रोकड़ सर्वाधिक तरल सम्पतियाँ होती है। प्राप्त विपत्र, विविध देनदार, विपण्य विनियोग और अल्प -कालीन या अस्थयी विनियोग ऐसी सम्पत्तियाँ हैं जिन्हे तरल सम्पतियों में शामिल किया जाता है। स्कंध को तरल सम्पति नहीं  माना जा सकता है क्योंकि ये बिना पर्याप्त हानि उठाये तुरंत रोकड़ में परिवर्तित नहीं किए जा सकते हैं। इसी  प्रकार, पूर्वदत्त व्यय को भी त्वरित / तरल संपतियां मालूम करते समय छोड़ देते हैं क्योकि वे रोकड़ में परिवर्तनीय नहीं होते हैं। त्वरित अनुपात की गणना त्वरित सम्पतियों को चालू दायित्वों से विभाजित करके की जा सकती है।  अतएव,

Quick/ Liquid or Acid Test Ratio =Quick or Liquid Assets/ Current Liabilites

कभी -कभी त्वरित या अम्ल परीक्षण अनुपात की गणना करते समय बैंक अधिविकर्ष को चलो दायित्वों में शामिल नहीं करते हैं, जिसके लिए यह तर्क दिया जाता है कि बैंक अधिविकर्ष  सामान्यतया वित्त-प्रबंध का एक स्थायी ढंग है और यह माँग पर देय नहीं होता है। ऐसी स्थिति में कुल त्वरित सम्पतियों में त्वरित दायित्व से भाग देकर  त्वरित अनुपात किया जाता है।

Quick/ Liquid or Acid Test Ratio =Quick or Liquid Assets/  Quick or  Liquid Liabilites

त्वरित सम्पतियों की गणना इस प्रकार भी की जा सकती है:

चालू सम्पत्तियाँ – (स्कंध +पूर्वदत्त व्यय)

(Current Assets – (Invenoties +Prepaid Expenses)

त्वरित सम्पतियों की गणना इस प्रकार भी स्कंध का आशय सभी प्रकार की रहतिया से है,  अर्थात् तैयार माल, निर्माणाधीन कार्य, कच्ची सामग्री का रहतिया।

एक उदाहरण लिया जाय, एक प्रतिष्ठान में 2, 00,000 रु की तरल सम्पत्तियाँ  हैं और 1,50,000 रु के चालू दायित्व हैं, त्वरित या अनुपात की गणना निम्न प्रकार की जायेगी

त्वरित अनुपात का निर्वचन (Interpretation of Quick Ratio)

प्रायः एक ऊँचा अम्ल परीक्षण अनुपात इस बात का परिचायक होता है कि संस्था तरल है और वह अपने चालू या तरल दायित्वों को समय से पूरा करने का सामर्थ्य रखती है। इसके विपरीत, एक नीचा त्वरित अनुपात यह संकेत करता है कि संस्था की तरलता स्थिति अच्छी नहीं है।

‘स्वयं सिद्ध आदर्श ‘ अथवा परम्परागत रूप से 1:1 का त्वरित अनुपात संतोषप्रद माना जाता है। एक सामान्य विचार यह है कि  यदि त्वरित सम्पत्तियाँ चालू दायित्वों की बराबर हैं तो संस्था अपने अल्प-कालीन देयताओं कप पूरा करने में समर्थ होगी।

यघपि चालू अनुपात की अपेक्षा त्वरित अनुपात तरलता का एक अधिक कठोर माप होता है, तथापि इसका सावधानीपूर्वक प्रयोग करना चाहिए और 1:1 के सिद्धान्त का आँख मूँद कर अनुसरण नहीं करना चाहिए। यदि सभी देनदार वसूल नहीं किए जा सकते हों और चालू दायित्वों को पूरा करने के लिए तुरंत रोकड़ की आवश्यकता हो तो 1 :1 का एक त्वरित अनुपात अनिवार्यतः संतोषप्रद नहीं हो सकता है।

इसी प्रकार एक नीचा त्वरित अनुपात का तात्पर्य आवश्यक रूप से घटिया तरलता स्थिति से नहीं होता है क्योंकि स्कंध पूर्णरूप से तरल से नहीं होते है।इसलिए हो सकता है कि एक उच्च त्वरित अनुपात वाली संस्था की संतोषप्रद तरलता स्थिति न हो यदि उसके देनदार धीमी गति से भुगतान करते हों। दूसरी ओर, एक नीचा त्वरित अनुपात वाली संस्था की तरलता स्थिति अच्छी हो सकती है, यदि उसके तीव्र संचरण वाले स्कंध हों अर्थात् स्कन्धों का जल्दी -जल्दी फेर होता हो।

त्वरित अनुपात का महत्व (Singnificnce)

त्वरित अनुपात एक  संस्था की तरलता का एक उपयोगी माप है। यह संस्था की चालू दायित्वों के तुरंत भुगतान की क्षमता का माप प्रस्तुत करता है यह चालू अनुपात की अपेक्षा तरलता के परीक्षण का एक अति कठोर परीक्षण है। इसका चालू अनुपात के सहायक या सम्पूरक अनुपात के रूप में प्रयोग किया जाता है।

iii) पूर्ण तरल अनुपात (Absolute Liquid Ratio)

यघपि प्राप्य, देनदार और प्राप्य विपत्र सामान्यतया स्कंध की अपेक्षा अधिक तरल होते हैं, तथपि उनकी शीघ्र या समय से वसूली के संबध में सन्देह हो सकता है। अतएव कुछ लोगों का यह मत है कि चालू अनुपात तथा अम्ल परीक्षण अनुपात के साथ -साथ पूर्ण तरल अनुपात की भी गणना करनी चाहिए जिससे चालू सम्पतियों में से प्राप्यों को भी छोड़ा जा सके। पूर्ण तरल अनुपात ज्ञात करने के लिए निम्नांकित सूत्र का प्रयोग किया जाता है:

पूर्ण तरल सम्पतियों में हस्तस्थ रोकड़ व बैंक में रोकड़ एवं बिक्री योग्य प्रतिभूतियाँ या अस्थायी विनियोग सम्मिलित किये जाते हैं। इस अनुपात के लिए स्वीकृत  प्रमाप 50 % अथवा 0.5:1 या 1:2  है, अर्थात्  एक रूपये मूल्य की पूर्ण तरल सम्पतियों को दो रूपये मूल्य के दायित्वों का समय पर भुगतान करने के लिए पर्याप्त मानते हैं क्योंकि लेनदारों से यह आशा नहीं की जाती है कि वे सभी एक ही समय भुगतान के रूप में रोकड़ की माँग करेंगे और तब तक देनदारों तथा स्कन्धों से रोकड़ की वसूली की जा सकती है।

अंतराल माप अथवा प्रतिरक्षा -अंतराल अनुपात (Interval Measure Or defensive Interval ratio)

चल  या  तरल सम्पतियों का चल दायित्व से तुलना करने के अतिरिक्त फर्म की तरलता स्थिति का परीक्षण इस बात का माप करने के लिए भी किया जा सकता है कि फर्म की तरल सम्पतियों उसके परिचालन व्ययों हेतु दैनिक रोकड़ आवश्यकता के लिए पर्याप्त है या नही। तरलता की ऐसे माप को अन्तराल माप अथवा प्रतिरक्षा -अन्तराल ‘अनुपात कहते है। इस अनुपात की गणना दिनों में की जाती है जिसका सूत्र इस प्रकार है :

Interval Measure = Quick or Liquid Assets / Average Daily Cash Operating Expenses

Liquid Assets  = Cash + Short-term Securities +Receivables

चालू सम्पतियों का संरचण अथवा कार्यक्षमता/ कियाशीलता अनुपात अथवा सम्पति प्रबंधन अनुपात (Current Assets Movement or Efficiency/Activity Ratio Or Asset Mangemant Ratios)

किसी व्यवसाय में बिक्री और लाभ अर्जित करने के लिए विभिन्न सम्पतियों में कोष का विनियोजन किया जाता है। वह कार्यक्षमता जिससे इन सम्पतियों का प्रबंधन किया जाता है, बिक्री की मात्रा को प्रत्यक्षतः  प्रभावित करती है। सम्पतियों का जितना उत्तम प्रबंध होगा, बिक्री की राशि और लाभ उतना ही अधिक होगा। क्रियाशीलता अनुपात उस कार्यकुशलता या प्रभावशीलता का माप करते हैं जिसकी सहायता से एक फर्म अपने संसाधनो  या सम्पतियों का प्रबंन्ध करती है। इन अनुपातों को आवर्त अनुपात भी कहा जाता है क्योंकि ये उस गति की ओर संकेत करते हैं जिस पर सम्पतियों को बिक्री में  रूपांतरित किया जा सकता है। उदाहरणार्थ, स्कंध आवर्त अनुपात उस दर की ओर संकेत करता है जिस पर स्कंध में विनियोजित कोष का बिक्री में रूपांतरण किया जा सकता है। भिन्न-भिन्न उद्देश्यों के आधार पर अनेक आवर्त अनुपातों की गणना की जा सकती है, जैसे देनदार आवर्त स्कंध आवर्त पूँजी आदि।

चालू अनुपात तथा अम्ल-परीक्षण अनुपात भरमात्मक परिणाम दे सकते है, यदि चालू अनुपात सम्पतियों में धीमी उधार संग्रह के कारण देनदारों की बड़ी रकम सम्मिलित है। ऐसी प्रकार, चालू अनुपात और भी अधिक भरमात्मक हो सकता है यदि इन सम्पतियों में धीमी गति से संचरण करने वाले स्कंध की बड़ी रकम शामिल हो। चूँकि ये दानो ही अनुपात चालू सम्पतित\यो के संचरण की उपेक्षा करते है, अतएव निम्नांकित आवर्त अथवा कार्यकुशलता अनुपातों की गणना करना महत्वपूर्ण है ताकि उस तरलता या कार्यकुशलता की समालोचना की जा सके जिससे एक फर्म द्धारा तरल सम्पतियों का उपयोग किया जाता है।

स्कंध आवर्त अनुपात  (Stock Turnover Ratio)

प्रत्येक व्यावसायिक संस्था को तैयार माल के स्कंध का एक निश्चित स्तर बनाये रखना पड़ता है ताकि व्यवसाय की आवश्यकताओं को पूरा करने में समर्थ रहा जा सके। किंतु स्कंध का स्तर न तो बहुत ऊँचा और न ही बहुत  नीचा होना चाहिए। निम्लिखित कारणों से अधिक स्कंध रखना हानिप्रद हो सकता है:

अ) इससे पूँजी अनावश्यक रूप से फँस जाती  हैजिसका अन्य कार्यो में लाभप्रद ढंग से उपयोग किया जा सकता है।

ब) अधि-स्कंध के लिए गोदाम में अधिक स्थान की आवश्यकता पड़ती है जिसके लिए अधिक किराया चुकाना पड़ेगा।   आधुनिक डिजाइन

 स) स्कंध के अप्रचलित हो जाने के पर्याप्त अवसर बने रहते हैं। उपभोक्ता आधुनिक डिजाइनके माल को प्राथमिकता देते हैं।

द) स्कंध के धीमे निस्तारण से रोकड़ की भी धीमी वसूली होती है जिससे तरलता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

य ) यदि सबंध अधिक अवधि के लिए रखे जाते है तो उनकी गुणवत्ता में गिरावट की संभावना बनी रहती है।

इसलिए जितना शीघ्र सम्भव हो, स्कंध का निस्तारण करने के लिए परामर्श दिया जाता है। दूसरी ओर,बहुत कम स्कंध का तात्पर्य व्यावसायिक अवसरों से वंचित होना पड़ सकता है। इस प्रकार, व्यवसाय में पर्याप्त स्कंध रखना अति आवश्यक है।

स्कंध आवर्त अनुपात की जिसे ‘स्कंध चलनवेग’ के नाम से भी जाना जाता है, सामान्यतः बिक्री/ औसत स्कंध अथवा बिके  माल  का लागत /औसत स्कंध के रूप में गणना की जाती है। यह बतलाता है कि क्या स्कंध का कुशलतापूर्वक उपयोग किया गया है या नहीं। इसका उद्देश्य यह देखना है कि क्या केवल अपेक्षित न्यूनतम कोष स्कंध में बिना आमदनी के फँसा हुआ है। स्कंध आवर्त अनुपात संकेत करता है कि एक दी हुई अवधि में स्कंध का कितना गुना आवर्त हुआ हा और उस कार्यकुशलता का मूल्यांकन करता है जिससे एक फर्म अपने अकंध करने में समर्थ है।

वर्ष के अंत के स्कंध के मूल को ‘स्कंध चलनवेग ‘ की गणना करने के लिए नहीं लेना चाहिए क्योंकि वर्ष के अंत में स्कंध सामान्तया कम होता है। प्रायः वे\रश के समाप्त होने के पूर्व स्कंध के निस्तारण के लिए प्रयास किये जाते हैं। इसलिए औसत अकंध को स्कंध आवर्त अनुपात का गणना हेतु लेना चाहिए। यदि सम्भव हो तो प्रत्येक माह के प्रारंभ के और अंत के स्कंध के आंकड़े केने चाहिए और उन्हें जोड़ लेना चाहिए तथा उचित प्राप्त करने के लिए इस योग को 13 से विभाजित करना चाहिए। प्रश्नों में, विभिन्न माहों के लिए स्कंध के आंकड़े नहीं दिए हुए होते है, वरन वर्ष के प्रारम्भ तथा अंत में स्कंध दिए रहते हैं : अतएव इन दोनों के अंको के औसत का प्रयोग करना चाहिए। इस अनुपात की गणना के लिए बिके माल की लागत को औसत स्कंध की लागत मूल्य से भाग से विभाजित करना चाहिए।

  1. Inventory Turnover Ratio = Cost of Good Sold/ Average Inventory at Cost

अवधि के प्रारम्भ तथा अंत के स्कंध का योग करके और उसे दो से विभाजित करके औसत स्कंध की गणना करते हैं। स्कंध केमासिक शेषों की दशा में, इन मासिक शेषों को जोड़कर उसमे उतने माहों का संख्या से भाग  देना चाहिए जिनके लिए औसत निकला जा रहा हैं। उदाहरण के लिए, किसी वर्ष में प्रारम्भिक स्कंध 30,000 रु है और अंतिम स्कंध 50,000 रु है तो औसत स्कंध होगा:

Average Inventory = Opening Stock + closing Stock /2 30,000 + 50,000 /2 Rs. 40,000

और,जैसे जनवरी,2003 का प्रारम्भिक स्कंध 20,000 रु है तथा अंतिम स्कंध हैं :जनवरी – 30,000 रु,  फरवरी -40,000 रु,  मार्च -35,000 रु,  अप्रैल -25, 000 रु , मई – 45,000 रु, जून -50,000 रु, जुलाई- 20,000 रु, अगस्त -30,000 रु, सितम्बर -35,000 रु, अक्टूबर -15,000 रु, नवंबर- 25,000 रु एवं दिसम्बर- 20, 000 रु तो औसत स्कंध की गणना निम्नवत् होगी :-

20,000 + 30,000 +  40,000 + 35,000 + 25,000 + 45,000 +50,000  + 20,000 + 30,000 + 35,000 + 15,000  + 25,000 + 20,000 / 13 3,90,000/ 13 = Rs.30,000.

प्रायः बिके माल की लागत पर प्रकाशित खातों से ज्ञात नहीं हो पाती है। इन परिस्थितियों में, स्कंध आवर्त की गणना शुद्ध विक्रय को लागत पर औसत स्कंध से विभाजित करके की जा सकती है। यदि औसत स्कंध लागत पर ज्ञात न हो तो विक्रय मूल्य पर स्कंध को हर के रूप में लिया जा सकता है और जहाँ प्रारम्भिक स्कंध नहीं ज्ञात है, वहाँ अंतिम स्कंध के अंक को औसत मान लिया जा सकता है। अतएव,

B ) Inventory Turnover Ratio = Net Sales/ Average Inventory at Cost

C)Inventory Turnover Ratio = Net Sales / Average Inventory at selling Price

  1. D) Inventory Turnover Ratio = Net Sales/ Inventory

स्कंध रूपांतरण अवधि (Inventory Conversion Period)

स्कंध का पूर्ण निस्तारण यानी बिक्री के लिए लगने वाले औसत समय को जानना भी रुचिकर हो सकता है। स्कंध अवधि की गणना द्धारा यह जानकारी सम्भव है। इस अवधि की दिनों की संख्या को स्कंध आवर्त अनुपात से विभाजित कर गणना की जाती है। इसके लिए निम्नांकित सूत्र का प्रयोग करते हैं

Inventory Conversion Period = Days in a year/ Inventory Turnover Ratio = ? No. of Days. If 365 days are taken then :

Inventory conversion Period = 365/ Inventory Turnover Ratio = ? No. of days.

स्कंध आवर्त अनुपात का निर्वचन (Interpretation of Inventory Turnover Ratio)

स्कंध आवर्त अनुपात स्कंध की बिक्री में रूपांतरण के वेग की माप करता है। प्रायः एक ऊँचा स्कंध आवर्त / स्कंध चलनवेग स्कंध के कुशल प्रबंध का संकेतक होता है क्योंकि जितनी अधिक बार स्कंध की बिक्री होती है, इतनी ही कम धन की स्कंध के वित्त- पोषण के लिए आवश्यकता होती है। एक नीचा स्कंध आवर्त अनुपात स्कंध के अकुशल प्रबंध की ओर  संकेत  करता है। एक नीचा स्कंध आवर्त का अभिप्राय स्कन्धों के रूप में अधि-विनियोजन, सुस्त व्यवसाय (dull business), माल की निम्नकोटि की गुणवत्ता, स्कंध का अनावश्यक एकत्रीकरण, अप्रचलित व धीमा संचरण वाले माल का संग्रह, और किये गए कुल विनियोगों की तुलना में निचा लाभ होता है। यह आवश्यक नहीं है कि  एक अति ऊँचा स्कंध आवर्त अनुकूल स्थिति का परिचायक हो। एस ऊँचा स्कंध आवर्त स्कंध के बहुत नीचा स्तर का परिणाम हो सकता है जिसके परिणामस्वरूप माँग या स्कंध बाहर के सन्दर्भ में माल की कमी हो सकती है, अथवा कम मूल्यों पर स्कंध के मूल्यांकन की रूढ़िवादी पद्धति या संस्था द्धारा छोटे में माल  ढेरों में जल्दी-जल्दी क्रय करने की नीति के कारण यह आवर्त बहुत ऊँचा हो सकता है। स्कंध के एक ऊँचे आवर्त का तात्पर्य  आवश्यक रूप से ऊँचा लाभ प्राप्त करना नहीं होता है। छोटे ढेरों में स्कंध के प्रतिस्थापन की अत्तधिक लागत, स्कंध बाहर की स्थितियों, बहुत कम मूल्यों पर स्कंध के विक्रय, आदि के कारण लाभ कम हो सकते हैं। अतएव, बहुत ऊँचे या बहुत नीचे स्कंध आवर्त की स्थितियों में अंतिम परिणामो का निर्वचन करने के पूर्व और अधिक खोज-बीन करनी चाहिए।

यहाँ यह, उल्लेख करना समीचीन होगा कि स्कंध आवर्त अनुपात के निर्वचन हेतु कोई ‘स्वयं -सिद्ध नियम’ या ‘प्रमाप स्कंध आवर्त अनुपात'(standard inventory turnover ratio)  अर्थात्  सामान्य स्वीकृत आदर्श अनुपात नहीं हैं। उघोग की प्रकृति तथा व्यावसायिक दशाओं के आधार पर विभिन्न संस्थाओं के लिए भिन्न -भिन्न आदर्श हो सकते हैं। फिर भी, वित्तीय विश्लेषण के लिए स्कंध का तुलनात्मक या प्रवृति विश्लेषण  बहुत उपयोगी होता है।

देनदार या प्राप्य आवर्त अनुपात एवं औसत संग्रह अवधि (DEBTORS OR RECEIVABLE TURNOVER RATIO AND AVERAGE COLLECTION PERIOD)

एक प्रतिष्ठान नकद के साथ-साथ उधार माल बेच सकता है। ‘उधार विक्रय सम्वर्द्धन का एक महत्वपूर्ण तत्व है। उदार उधार नीति का अनुसरण करके बिक्री की मात्रा बढ़ायी जा सकती है। किन्तु उदार नीति के प्रभाव का परिणाम यह हो सकता है कि संस्था के कोष का पर्याप्त भाग व्यापारिक देनदारों या प्राप्यों यानी देनदार व प्राप्य विपत्र के रूप में फँसा रह सकता है। व्यापारिक देनदारों के बारे में आशा की जाती है कि उन्हें अल्पवधि मेरोक्ड में परिवर्तित किया जा सकता है एवं इसी कारण चालू सम्पतियों में सम्मिलित करते है। अतएवं, अल्प-कालीन देयताओं का समय से भुगतान के संबंध में प्रतिष्ठान  की तरलता स्थिति उसके व्यापारिक देनदारों के स्वरूप या गुणवत्ता पर निर्भर करती है। देनदारों के स्वरूप का मूल्यांकन करने के लिए दो प्रकार से अनुपात संगणित किये जा सकते हैं।

देनदार/प्राप्य आवर्त अथवा देनदार वेग (Debtors (Receivables) Turnover / Veloclty)

देनदार आवर्त अनुपात एक फर्म के ऋण संग्रह के वेग की ओर संकेत करता है। सरल शब्दों में, यह बतलाता हैं वर्ष भर में औसत देदारो का कितनी बार आवर्त क हुआ है। इस प्रकार   :

Debtors (Receivables) Turnover/Veloclty = Net  Credit Annual Sales/ Average Trade Debtors = No. of Time

Trade Debtors = Sundry Debtors + Bills Receivables and Accounts Receivables Average trade Debtors = Opening trade Debtors + Closing Trade Debtors/2

ध्यातव्य (Note) इस  अनुपात की गणना करने के लिए सदैव देनदारों के सकल मूल्य (gross value) पर विचार करना चाहिए। इनमें से अशोध्य व संदिग्ध ऋणार्थ प्रावधान को घटना नहीं चाहिए। किन्तु, यदि व्यापारिक देनदारों के प्रारम्भिक तथा अंतिम शेषो एवं उधार बिक्री की सूचना उपलब्ध नहीं है तो प्राप्य विपत्रों को शामिल करते हुए देनदारों के शेष से कुल बिक्री को विभाजित करके स्कंध आवर्त की गणना निम्न प्राकर की जय सकती है-

Debtors turnover Ratio = Total Sales / Debtors (inclusive of B/R)

देनदार आवर्त का निर्वचन (Interpretation of Debtors Turnover/ velocity)

देनदार आवर्त वेग बतलाता है कि वर्ष भर में देनदारों का कितने बार आवर्त हुआ है। सामान्यतया, देनदार आवर्त का जितना ऊँचा मूल्य होता है हैं उतना ही अधिक देनदारों / बिक्री का कुशल प्रबंध माना जाता है अथवा देनदार उतने ही अधिक तरल होते हैं। इसी प्रकार, नीचा देनदार आवर्त अनुपात का अभिप्रायः देनदारों / बिक्री का अकुशल प्रबंध होता है या देनदार कम तरल होते हैं। किन्तु अति ऊँचे देनदार आवर्त अनुपात का निर्वचन करते समय सावधानी बरतना आवश्यक है क्योंकि एक अति ऊँचा अनुपात संसाधनों की कमी के कारण उधार विक्रय करने में संस्था की असमर्थता और फलस्वरूप बिक्री तथा लाभ से वंचित होने का प्रतीक हो सकता है। कोई ‘स्वयंसिद्ध नियम ‘ नहीं है जिसका इस अनुपात के निर्वचन के लिए प्रमाप के रूप में उपयोग किया जाए क्योंकि यह व्यवसाय की प्रकृति के अनुरूप एक संस्था से दूसरी संस्था में भिन्न-भिन्न हो सकता है। इस अनुपात की उसी प्रकार का व्यवसाय करने वाली अन्य संस्थाओं के अनुपातों से तुलना करनी चाहिए और अनुपात का अधिक अच्छा निर्वचन हेतु इसकी प्रवृति भी ज्ञात की जा सकती है।

औसत संग्रह अवधि अनुपात (Average Collection Period Ratio)

औसत संग्रह अवधि से  रक संस्था द्धारा अपने प्राप्यों को रोकड़  में परिवर्तित करने ने की जाने वालीं प्रतीक्षा के दिनों की औसत संख्या की जानकारी होती है। इस अनुपात को निम्न प्रकार संगणित करते हैं:

(i ) Average Collection Period  = Average trade Debtors (Drs.+ B/R)  / Sales per day

(ii) Sales per only =Net Sales / No. of Working Days

Or,  Average Collection Period = Average Trade Debtors/Net Sales / No. of Working = Average Trade Debtors  *No.  of  working Days Months / Net Sales

If the Period is in months:

Average collection period = Average Trade Debtors  *  No. of Months / Net Sales

Or Average Collection Period = No. of working days / Debtors Turnover Ratio =  No. of Days.

इस अनुपात के दो मूल अंग व्यापारिक देनदार एवं प्रतिदिन बिक्री है। व्यापारिक देनदारों में प्राप्य होते है और अनुपात की गणना हेतु औसत व्यापारिक देनदार अर्थात् (प्रारम्भिक + अंतिम /2) लेना चाहिए, किन्तु यदि प्रारम्भिक और अंतिम देनदारों के बारे में सूचना न उपलब्ध हो तो देनदार के अंतिम शेष को लेना चाहिए। बिक्री के लिए यदि कोई आंतरिक वापसी हो तो उसे घटाकर शुद्ध उधार बिक्री की राशि लेना चाहिए। यदि उधार की कोई सूचना न तो अनुपात की गणना हेतु कुल बिक्री लेना चाहिए। इसी प्रकार,प्रति दिन बिक्री ज्ञात करने के लिए बिक्री की राशि को एक वर्ष में दिए हुए कार्य दिवसों की संख्या से विभाजित करना चाहिए। यदि प्रश्न में कार्य दिवस की संख्या न दी हुई हो तो इसे 360 मान लेना चाहिए क्योंकि इस अनुपात की गणना के लिए एक वर्ष में 360 या 365 दिन मान लेने का चलन है, यघपि कुछ लेखक एक वर्ष में 300 कार्य दिवस मानते हैं।

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