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वित्तीय लेखांकन की सीमाएँ (Limitations of Financial Accounting)

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वित्तीय लेखांकन मुख्यतया अंतिम खाते अर्थात लाभ – हानि तथा आर्थिक चिट्टा तैयार करने से सम्बन्ध रखता है। व्यवसाय अब इतना जटिल  गया है कि मात्र अंतिम खातों द्धारा प्रदत्त सूचनाएँ सुचना सम्बन्धी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं होती हैं। प्रबंध – तंत्र को व्यसायिक क्रियाओं के नियोजन, नियंत्रण तथा समन्वय कार्यो के लिए सूचनाओं की आवश्यकता होती है जो वित्तीय लेखांकन द्धारा यथेष्ट रूप से उपलब्ध नहीं होता है। वित्तीय लेखांकन की इन्हीं सीमाओं के कारण लागत लेखांकन एवं प्रबंधकीय लेखांकन का हुआ है।

वित्तीय लेखांकन की कुछ सीमाओं का आगे वर्णन किया जा रहा है :

1. ऐतिहासिक प्रकृति (Historical Nature):- वित्तीय लेखांकन इस अर्थ में ऐतिहासिक प्रकृति का होता है कि इसके अंतर्गत उन सभी व्यवहारों का लेखा किया जाता है जो एक समयविधि विशेष में व्यवसाय में संपन्न हो चुके होते हैं। भविष्य की अनिश्चितताओं के प्रभाव का वित्तीय लेखांकन में कोई स्थान नहीं होता है। प्रबंध – तंत्र को भावी नियोजन हेतु सूचना की आवश्यकता पड़ती है, परन्तु वित्तीय लेखांकन केवल ऐसी सूचना प्रदान कर सकता है जो घट चुकी है तथा भविष्य में क्या घटेगा, इसकी कोई सुचना नहीं दे सकता है। वित्तीय लेखांकन ऐसा कोई सुझाव नहीं देता है कि संस्था की कार्यकुशलता को बढ़ाने के लिए क्या किया जाना चाहिए।



2. संस्था के बारे में समग्र सूचना लेना (Provides Information about the concern as a whole):- वित्तीय लेखांकन में सम्पूर्ण व्यवसाय के लिए सूचना लिपिबद्ध किया जाता है कोई भी व्यक्ति केवल कुल व्ययों और कुल प्राप्तियों के बारे में सूचना पा सकता है उत्पादानुसार, प्रक्रियानुसार, विभागानुसार या किसी अन्य क्रिया के अनुसार सूचना को अभिलिखित नहीं करते हैं। लागत निर्धारण तथा लागत नियंत्रण के उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहायता पहुँचाने के लिए यह आवश्यक है कि क्रियानुसार (Activity-Wise) सूचना का लेखा रखा जाए।

3. मूल्य निर्धारण में सहायक नहीं (Not Helpful in Price Fixation):- वित्तीय लेखांकन उत्पादों के मूल्य को तय करने में सहायक नहीं होता है। एक उत्पाद की लागत तभी ज्ञात की जा सकती है जब उस पर सभी व्यय किए जा चुके हों। पहले से ही उत्पाद की लागत निर्धारित करना संभव नहीं है संस्था को निकट भविष्य में माल की आपूर्ति करने के लिए (या निविदा (Tenders) प्रस्तुत करने हेतु) मूल्य को उद्धत करने की आवश्यकता पड़ सकती है। कीमत निर्धारण हेतु परिवर्तनशील तथा स्थिर लागतों, और अप्रत्यक्ष लागतों से सम्बंधित सूचनाओं की आवश्यकता होती है। मूल्य निर्धारण के परियोजन के लिए विगत अभिलेखों के आधार व्ययों का अनुमान लगाया जाता है। वित्तीय लेखांकन इस सम्बन्ध में अपेक्षित सूचनाएँ नहीं प्रदान कर सकता है। इस प्रकार यह कीमत निर्धारण में सहायक नहीं होता है।

4. लागत – नियंत्रण संभव नहीं (Cost Control Not Possible):- वित्तीय लेखांकन के अंतर्गत लागत नियंत्रण संभव नहीं है। लागत सम्बन्धी आँकड़ो की जानकारी वित्तीय अवधि की समाप्ति के बाद ही हो पाती है और उस स्तर पर लागत के नियंत्रण के लिए कुछ नहीं किया जा सकता है। वित्तीय लेखांकन में ऐसी कोई तकनीक नहीं है जो यह निश्चय करने में सहायता कर सके कि जो व्यय किए जा रहे हैं, वे अधिक हैं या कम। यदि लागते अधिक हो जाती हैं तो उसके लिए उत्तरदायित्व निर्धारित करने की कोई क्रिया – विधि वित्तीय लेखांकन में नहीं है। लागत निर्धारण की प्रक्रिया में वास्तविक लागतों की समय – समय पर सतत समीक्षा की आवश्यकता होती है जो वित्तीय लेखांकन में संभव नहीं है।

5. नीतियों का मूल्यांकन संभव नहीं (Appraisal of Policies Not Possible):- वित्तीय लेखांकन में विभिन्न नीतियों एवं कार्यक्रमों का मूल्यांकन करना संभव नहीं है। बजट में निर्धारित लक्ष्यों के साथ वास्तविक कार्य – निष्पादन की तुलना करने की कोई तकनीक नहीं है। यह नहीं निर्धारित किया जा सकता है कि क्या कार्य पूर्व – निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार हो रहा है अथवा नहीं। कार्यकुशलता के निर्धारण का मापदंड केवल यह है कि वित्तीय अवधि के अंत में लाभ की समीक्षा की जाए। इस प्रकार प्रबन्धकीय निष्पादन के मूल्यांकन का एकमात्र मापदंड लाभदायकता है। एक संस्था का लाभ कई बाह्या तत्वों से भी प्रभावित होता है, अतएव प्रबंध की कार्यक्षमता का निर्धारण करने का यह एक विश्वसनीय आधार नहीं होता है।

6. केवल वास्तविक लागतों का अभिलेखन (Only Actual Costs Recorded):- वित्तीय लेखांकन में केवल वास्तविक लागत समंको को लेख – बद्ध किया जाता है। सामग्री, जायदाद और अन्य सम्पत्तियों को क्रय करने के लिए भुगतान की गई राशि को लेखा पुस्तकों में लिपिबद्ध किया जाता है। इन वस्तुओं और सम्पत्तियों के मूल्यों में समय – समय पर वृद्धि या कमी होती रहती है। सम्पत्तियों के वर्तमान मूल्य लेखों में अंकित लागतों से बिल्कुल भिन्न हो सकते हैं। वित्तीय लेखों में मूल्य परिवर्तनों को कोई लेखा नहीं किया जाता है। इस प्रकार अभिलिखित लागतें सम्पत्तियों के सही मूल्य या सही सूचना नहीं प्रदान कर सकती हैं।

7. रणनीतिक निर्णय लेने में सहायक नहीं (Not Helpful in Taking Strategic Decisions):- प्रबंध को श्रम का मशीनों द्धारा प्रतिस्थापन, नयी उत्पाद का प्रारम्भ व प्रवेश, उत्पादन की विद्यमान किसी कार्य को बंद करना, क्षमता का विस्तार करना, आदि जैसे अनेक रणनीतिक निर्णय लेने पड़ते हैं। इन निर्णयों के प्रभाव तथा इनमें निहित लागतों को पहले से नहीं निर्धारित किया जा सकता है। अंतिम निर्णय लेने से पूर्व उपलब्ध अनेक वैकल्पिक सुझावों का अध्ययन किया जाता है। वित्तीय लेख ऐसे महत्वपूर्ण निर्णय लेने हेतु आवश्यक सूचना नहीं उपलब्ध कर सकते हैं क्योंकि इस लेखांकन पदृति में सम्पूर्ण संस्था के लिए सूचनाओं को लिपिबद्ध किया जाता है और ये घटित हो चुकने के बाद ही उपलब्ध होते हैं।

8. तकनीकी विषय (Technical Subject):– वित्तीय लेखांकन एक तकनीकी विषय है। व्यसायिक व्यवहारों को लेखबद्ध करने तथा उनके प्रयोग करने के लिए लेखांकन सिद्धान्तों एवं परम्पराओं का ज्ञान होना आवश्यक है। एक व्यक्ति जो लेखांकन विषय में परिचित तथा उसमें पारंगत नहीं है, उसके लिए वित्तीय लेखों की बहुत कम उपयोगिता होती है।

9. परिमाणात्मक सूचना (Quantitative Information):- वित्तीय लेखांकन में केवल उसी तथ्य और सूचना का अभिलेखन किया जाता है जिसका परिमाणात्मक माप किया जा सकता है। कोई भी तथ्य जिसका परिमाणात्मक माप नहीं किया जा सकता है, वित्तीय लेखांकन का अंग नहीं हो सकता है, भले ही वह व्यवसाय के लिए अति महत्वपूर्ण क्यों न हो। सरकार की नीतियों और योजनाओं का व्यवसाय की कार्य – प्रणाली पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। उपक्रमीयनीतियों (Entrepreneurial Polices) पर सरकारी निर्णयों के प्रभाव का निर्धारण करना आवश्यक होता है। ये ऐसेगुणात्मक तत्व (Qualitative Factors) है जिनका परिणामात्मक माप नहीं किया जा सकता है। वित्तीय लेखांकन इन गुणात्मक तत्वों पर कोई विचार नहीं करता है।

10. लेखांकन सिद्धान्तों के बारे में सर्वसम्मति का अभाव (Lack of Unanimity about Accounting Principles):– लेखापालक लेखांकन सिद्धान्तों के प्रयोग के सम्बन्ध में एक मत नहीं पाए जाते है। अंतर्राष्ट्रीयलेखांकन मानक समिति (International Accounting Standards Committee) के प्रयासों के बाद भी लेखांकन सिद्धान्तों और क्रिया – विधियों के प्रयोग के सम्बन्ध में सर्वसम्मति का अभाव पाया जाता है। स्कन्ध के मूल्यांकन की विधियाँ तथा सम्पत्तियों पर हॉर्स लगाने की पादुतियो दो विवादस्पद विषय हैं जिनके सम्बन्ध में सर्वसम्मति का होना सम्भव नहीं है। भिन्न – भिन्न लेखांकन सिद्धान्तों को प्राथमिक देना व्यक्तिवादिता (Subjectivity) और मैंने पक्षपात को आमंत्रित करना है। इस प्रकार विभिन्न लेखांकन सिद्धान्तों का प्रयोग लेखों की उपयोगिता तथा विश्वसनीयता को कम कर देता है।

11. हेरा – फेरी के अवसर (Chances of Manipulation):- वित्तीय लेखों का प्रबंध की अहं की पूर्ति के लिए मन चाहे ढंग से प्रयोग करने के अवसर बने रहते हैं। स्कन्धों की अधि – मूल्यन (Over-Valuation) या अव – मूल्यन (Under-Valuation) लाभों की राशियों में परिवर्तन ला सकता है। अधिक पारिश्रमिक प्राप्त करने हेतु, अधिक लाभांश वितरित करने हेतु या कंपनी के अंशों के मूल्यों को बढ़ाने के उद्देश्य से लाभ को बढ़ा – चढ़ा कर प्रदर्शित किया जा सकता है। इसी प्रकार कर अपवचन (Tax Evasion) या श्रमिकों को कम बोनस देने, आदि प्रयोजनों के लिए लाभ को कम करके दर्शाया जा सकता है। वित्तीय लेखों में इस प्रकार से की जाने वाली हेरा – फेरी की सम्भावनाएं उनकी विश्वसनीयता को कम कर देती हैं।

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