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कुंठ रोगों की पहचान, कुष्ठ रोगों की चिकित्सा Learn Here

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कुंठ रोग, उपचार: कुंठ रोगों की पहचान-वात, पित्त, कफ, रस, रुधिर, मांस तथा पानी इन सातों तत्वों की गतियों में विघ्न पड़ने से कंठ रोग पैदा होते है परन्तु इन रोगों में ही एक ऐसा रोग भी होता है जिसे हम महाकुंठ रोग कहते हैं। शेष प्रकार के रोग कुंठ रोग ही कहलाते हैं। 1. महा कुंठ रोग-थोड़ा सा काला कुछ लाल रुखा, खुरदरा, पतली त्वचा वाला, अत्यंत व्यथा, काला कुष्ठ, कपाल कुष्ठ कहा जाता है। 2. औदुम्बर कुष्ठ-जो गूलर के फल के समान गोल, पीला, रोम युक्त, व्यथा, दाह, लाल लाल खुजली से पैदा हो, उसे औदुम्ब कुष्ठ कहते हैं। 3. मंडल कुष्ठ-सफ़ेद लिए, लाल रंग, पतली त्वचा वाला, स्वेदयुक्त, मंडल के समान, आकार वाला, आपस में मिला हुआ, मंडल कुष्ठ कहा जाता है। 4.  सिद्धश कुष्ठ-सफेदी लिए, लाल रंग, पतली त्वचा वाला, रगड़ने जिसमें से धूल के समान रुएँ उड़े, तो रब्बी के फूल के सिद्धरा हो उस सिद्धश पुष्ठ कहते हैं। यह अधिकतर छाती में ही होता है। 5. काकण कुष्ठ-चोंटली के समान वर्णवाला बीच में काला, स्वाभाविक पकने वाला न हो तीव्र वेदना युक्त हो उसे काकण कुष्ठ कहते हैं। 6. पुंडरीक कुष्ठ-जो सफ़ेद कमल पत्र के समान अंत में लाल व ऊँचा हो उसे पुंडरीक कुष्ठ कहते हैं। 7. जिह्व कुष्ठ-जो कठिन अंत में लाल मध्य में  धूम्र के रंग के समान वेदना युक्त रीछ की जीह्व के समान खुरदरा हो उस ऋच्छ जिह्व कुष्ठ कहते हैं। 8. क्षुद्र कुष्ठ-गज चर्म, चर्मदल, विचचिर्का विषादि का पामा, मधु ध्द्रविस्पोट किटिभि, अलसक, शताक यह 11 प्रकार का क्षुद्र कुष्ठ रोग होता है, इसकी चिकित्सा भी क्षुद्र कुष्ठ के अंतर्गत बताई गई है।

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कुष्ठ रोगों की चिकित्सा

1. हरड़, कंजा, सरसों, हल्दी, बावची, सेंधा नमक वायविडिंग इन को बराबर मात्रा लेकर गौ पेशाब में पीसकर लेप करें तो कुष्ठ रोग से आराम आ जाएगा।
2. बावची का चूर्ण, अद्रक के रस में पीस कर लेप करने से कुष्ठ में आराम होता है।
3. मुठ, मूली के बीज, फलप्रियंग, सरसों, हल्दी, नाग केसर इनका लेप करने से सिद्ध कुष्ठ दूर हो जाते हैं।
4. अपामार्ग का रस हल्दी का चूर्ण तथा मूली के बीज तीनों को पीस कर लेप करने से सिद्ध कुष्ठ नष्ट हो जाता है।
5. दारू हल्दी, मूली के बीज, हरताल, देवदार नागर बेल का पान, शंख चूर्ण सबको पानी में पीस कर लेप करने से कुष्ठ रोग को लाभ होता है।
6. सेंधा नमक, चमबड़, सरसों तथा पीपल को नींबू के रस या कांजी में पीस कर लेप करने से कुष्ठ रोग ठीक हो जाता है।
7. बहेड़े की छाल, कठूसर की जड़ इन के कवाय में बावची का कलक तथा गुड़ डालकर पीने से श्वेत कुष्ठ का नाश होता है।
8. बाबची, हरताल, मेनसिन, चांटोली की जड़, चित्रमूल, गौमूत्र में पीस कर लेप करने से श्वेत कुष्ठ नष्ट हो जाता है।

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वृ. मंजिष्ठादि कवाय

मंजीठ कुट की छाल, सिहोरा, नागर मोथा, वच, सोंठ, हल्दी, दारू, हल्दी, कटेरी का चंचाग, नीम परवल, कुटकी नारंगी वायविडिंग चित्रक, देवदार, चूरनहार, भांगरा, पीपल जायफल, वाद शतावर, खैर हरड़ बेहड़ा, आमला, चिरायता, बकायन, विजयसार, अमलतास, फूल त्रियुंग, बावची, रक्त चन्दन, बरुना, शुद्ध जमालगोटा पित्तपापड़ा, सारिवा, अतीस, घमासा, इंद्रायण, सुगंध वाला। इन सबका कवाय बना कर पीने से कुष्ठ रोग शीघ्र दूर हो जाती है। शरीर में नया खून बनता है।

खदिरारिष्ठ

खैर की लकड़ी तथा देवदार दार एक 3 किलो, बावची 700 ग्राम, दारू हल्दी 1 किलो, त्रिफला 1 किलो। इन सबको बारीक़ कूट कर 120 किलो पानी में मिलाकर आग पर पकाते रहें जब पक कर उसका आठवां भाग रह जाए तो उसे नीचे उतार लें। नीचे उतार कर उसे छान कर उसमें शहद 11 किलो शक़्क़र 6 किलो शत्रपुष्प 1 किलो, शीतल चीनी, नाग केसर, जायफल, लोंग, छोटी इलायची, दाल चीनी तेज पत्र, पल तथा पीपल, 4 पल लेकर सबकी चूर्ण तैयार करके उस सेरिमाल में मिला दें, इसके पश्चात मिटटी के पात्र में भर कर मुँह बंद करके एक मास तक धूप में रखें, बाद में छान कर किसी बर्तन में भर सुरक्षित स्थान पर रख लें।

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गज चर्म

रोग की पहचान – यह रोग क्षुद्र कुष्ट रोग है जिसे आम तौर पर गज चर्म रोग कहा जाता है, जो कोढे गाड़ा हाथी की त्वचा के समान रुखा तथा काला होता तो गज चर्म कहते हैं।

उपचार – पारद 1 भाग दोनों जीरे 2 भाग, हल्दी दोनों 2 भाग, काली मिर्च 1 भाग, सिंदूर 1 भाग, गंधक आमला सार 1 भाग तथा मेनमिल 1 भाग प्रथम पारा और गंधक की कज्जली करें, सब चीज़ों को बारीक़ पीस कर छान कर गौ घी में 1 दिन सेवन करें। इसका मर्दन करने से गज चर्म रोग ठीक हो जाता है। पारा, गंधक, नीला थोथा, कत्था, मेहंदी, खुरासानी अजवायन, मोम, मालकांगुनी। इन सब चीज़ों को समान मात्रा में लेकर, इन्हें पीस छान कर एक दिन गाए के घी में घोट कर, मर्दन करने से, गज चर्म रोग दूर हो जाता है।

कच्छ राक्षस तेल

मेनसिल, छीरा, कसीस, सेंधा नमक, आमला सार गंधक, सोना मक्खी, पत्थर फोड़, सोंठ, पीपल तलिहारी, बायविडिंग चित्रक, नीम के पत्ते, 1/2 – 1/2 ग्राम लेकर बारीक़ पीस कर सरसों का तेल 2 किलो, आम का दूध किलो, 100 ग्राम, थूहर का दूध 100 ग्राम गो मूत्र 3. 1/2 किलो मिलाकर उसे पका लें। जब केवल तेल मात्र ही रह जाए  तो उसे उतार कर छान लें।

लाभ – इस तेल की मालिश करने से क्षुद्र कच्छ पामा तथा हर प्रकार के कुष्ठ रोग दूर हो जाते हैं।

भगन्दर

गुदा रोगों में भगन्दर को सबसे कष्टदायक माना जाता है। कुछ लोग तो इस रोग को लेकर इतने दुःखी होते हैं कि आत्म हत्या तक करने को तैयार हो जाते हैं। उसका कारण यह भी हो सकता है कि शौच के समय उन्हें बहुत कष्ट होता है।

रोग की पहचान – गुदा के चारों ओर, दो – दो अंगुल में छोटी – छोटी फुंसियां निकल आती हैं, धीरे – धीरे यह पक कर मवाद देने लगती हैं।

रोगी को सबसे पहले यही सलाह दी जाती है कि जैसे ही उसे रोग के ऐसे लक्षण नजर आए तो उसी समय, जोंक लगवा कर खून साफ करवा दें।

  1. सांठी की जड़ गिल्यु, सोंठ, मुलहठी, बेरी के कोमल पत्ते इन सबको कूट बारीक़ पीस कर सरसों के तेल में डाल कर आग पर पकावें, पकाते समय रस में चार गुना गौ मूत्र मिला लें, जब थोड़ा से तेल शेष रह जाए तो उसे नीचे उतार लें, इस तेल को उन फुंसियों पर लगा कर मालिश करते रहें।
  2. निशोथ, तिल जमाल गोटा, मजीठ, सेंधा नमक इनको पीस आर घी तथा शहद में मिला कर लेप करने से भगंदर के फोड़े समाप्त हो जाते हैं।
  3. रसौंत दोनों हल्दी, मंजीठ, नीम के पत्ते निशोथ तेजफल, इन्हें बारीक़ पीस कर इसका लेप भगंदर वाले स्थान पर करने से रोगी अच्छा हो जाता है।

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गुग्गलादि कवाय

मेंसा गुगुल, हरड़, बहेड़ा, आमला बायविडिंग सबका कवाय हर रोज पीने से भगंदर रोग का नाश होता है।

अन्त्र वृद्धि

अन्त्र शोथ में उदर सूचीभेद के समान फूल जाते हैं अन्त्र विरोध, पेट फूलना, पेट की गैस का खिंचाव, नाभि प्रदेश में खिंचाव उदर पीड़ा तथा अंतड़ियों का फूलना आदि सामान्य लक्षण हैं।

उपचार – खरैटी कलफ के साथ अरंडी का तेल, सिद्ध कर पीने से, आह्यमान शूल अंत्रवृद्धि गुलम का नाश होता है।

  1. रास्ना, मुलहटी, गुर्च, अरंडमूल, खरैटी, अमलतास का गुच्छा, गोखरू, परबल तथा अडूसा इन के कवाय में अरंडी का तेल डाल कर पीने से अंत्रवृद्धि नष्ट होती है।
  2. इन्द्रायण की जड़ का चूर्ण, अरंडी का तेल, दूध में मिला कर पीने से अंतर वृद्धि रोग से मुक्ति मिलती है।

लेप – गुगुल एलुआ कुंदर, गोंद, लोघ, फिटकरी तथा बिरोजा इनको पानी में डाल कर पीस लें, जिससे एक लेप तैयार हो जाएगा, इसका लेप अंत्रवृद्धि स्थान पर करें लाभ होग़ा।

गुटका

शुद्ध शिंगरफ 5 ग्राम, एलुआ 5 ग्राम, गुगुल 5 ग्राम, लाल बाले 5 ग्राम, करंज के बीज 5 ग्राम, नौशादर 5 ग्राम, काला नमक 5 ग्राम, हींग 5 ग्राम।

इन सबको बारीक़ पीस कर, घी क्वार के रस में घोटकर मटर के दाने के आकार की गोली बनाएं।

खुराक – बड़ों के लिए 2 गोली 1 समय दिन में 3 बार-छोटों के लिए 1 गोली 1 समय दिन में 2 बार। 

उदर कृमि रोग

पहचान और कारण – असमय, भोजन, अजीर्ण अथवा कृमिज पदार्थो का भोजन और मल का अवरोध होने से पदार्थों का रस न बन कर केवल मल सड़ने लगता है। उसी से छोटे व बड़े कृमि पैदा हो जाते हैं, जो छाती में अपना घर बना लेते हैं।

उपचार – नागर मोथा, मूसाकर्ण, त्रिफल, सेजना की छाल तथा देवदार का कवाय उसको वायबीडिंग 1/10 ग्राम मिलाकर पीने से कष्ट दूर हो जाता है।

  1. अनार की जड़ की दाल, पला, वायबीडिंग इनका कवाय शहद डाल कर पीते रहने से कष्ट दूर हो जाता है।
  2. बड़ी हरड़ के चूर्ण में शहद मिलाकर, गौ के पेशाब में सेवन करें।
  3. हल्दी तथा गुड़ दोनों को मिलाकर पीने से रोग मुक्त हो सकते हैं।
  4. धतूरा की जड़ तथा अरंणड की जड़े संभालू की जड़ साठी की जड़ सहजना की जड़े इन सबको बारीक़ पीस कर लेप करने से उदरकृमि रोग से मुक्ति मिल जाती है।
  5. साठी की जड़, त्रिफला समान मात्रा में लेकर इन सबका चूर्ण बना लें, हर रोज सुबह शाम शहद में एक छोटा चम्मच चूर्ण सेवन करने से उदर रोग से मुक्ति मिलेगी।
  6. कसौंदी की जड़ मधु के साथ मिलाकर सेवन करने से रोग मुक्त हो सकते हैं।

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मेद रोग

लक्षण और कारण – जो लोग अधिक आराम करते हैं, हर समय बैठे रहते हैं, दिन में सोते रहते हैं, कफ वाली चीज़ों का अधिक प्रयोग करते हैं और साथ ही मिठाइयाँ अर्थात मीठी चीज़ों का अधिक प्रयोग करते हैं ऐसे लोग मोटे हो जाते हैं, इस मोटापे के कारण उन्हें श्वास रोग, शरीर में दर्द किसी भी काम के योग्य नहीं रहते।

उपचार – 1. गिलोय तथा त्रिफला के कवाय में शहद मिलाकर पिलाने से प्राणी रोग मुक्त हो जाते हैं।

2. बासी ठन्डे पानी में शहद मिलाकर हर रोज सुबह पीने से रोग दूर हो जाता है।
3. त्रिफला, त्रिकुटा, चित्रक, नागर मोथा, वायबीडिंग इनके कवाय में गुगुल डाल कर पीने से रोग चला जाता है।
4. अरण्ड के पत्तों शाक हर रोज सेवन करें।
5. वायबीडिंग, सोंठ, उपाक्षार, कांति सार, चूर्ण जौ तथा आमले के चूर्ण के साथ शहद मिलाकर खिलाने से प्राणी रोग मुक्त हो जाते हैं। खूब भूख लगती है पेट साफ रहता है।
6. परवल तथा चीता का कवाय कर सौंफ और हींग का चूर्ण मिलाकर रोगी को पिलाएं तो वह ठीक हो जाएगा।
7. मूली अथवा त्रिफला का चूर्ण शहद में मिला कर रोगी को दें।

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