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हिप्नोटिज्म अपने इतिहास के झरोखे में

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हिप्नोटिज्म  (Hypnosis) का जन्म अठाहरवीं शताब्दी के बीच में हुआ था।

इसका जन्म जर्मनी (Germany) की धरती पर हुआ। कुछ विद्वानों का मत है-

” होनहार बिरवान के होत चिकने पात “

ठीक ऐसा था जर्मनी (Germany ) का एक विद्यार्थी “फ्रोर्डरक मसीमर” (Frordrk Msimr)। जिसमें 1780 में अपने अनुभवों को प्रकाशित किया। उसी ने सारे संसार को पहली बार यह बताया कि “हिप्नोटिज्म” (Hypnosis) के द्धारा मानव शरीर के सारे अंगो की कमजोरियाँ (Weaknesses) तथा छोटे मोटे रोगों को ठीक किया जा सकता है। इसके लिए हाथों के चुबंक तथा आँखो की कशिश का सहारा लिया जा सकता है। मसीमर ने पहली बार रोगों के मस्तिष्क (Brain)तक उतरने का तरीका सिखाया था। प्राम्भ में उसने चुम्बक का प्रयोग किया। परन्तु धीरे -2 वह यह काम आँखो से लेने लगा। इसके लिए वह पहले रोगी की आँखों में आँखे डालकर मदहोश कर देता। फिर उसे अपनी ओर से आदेश देना शुरू कर देता। ऐसी हालत में रोगी केवल वहीं काम करता जिसके लिए उसे आदेश दिया जाता। इस मदहोशी की हालत में मसीमर इस बात का अहसास दिलाता रहता कि – उसका रोग अब कम हो रहा है। धीरे -2 वह रोगी अपने आपको रोग मुक्त होता महसूस करता।

जैसे ही यह बात सरकार और डॉक्टरों तक पहुँची तो इस उपचार का खुला विरोध किया गया। लेकिन आम लोगोंको जब इस उपचार का पूरा लाभ होने लगा। अंत में मसीमर ने एक नवीन चिकित्सा (Treatment) पद्यति में अपना एक स्थान तो बना लिया। परन्तु उसके विरोधियोँ की संख्या काफी बढ़ गई। बिशेष रूप से दवाइयों को बनाने वाले और उन्हें बेचने वालों ने जब अपना धंधा चोपट होते देखा तो खुले विरोध पर उतर आए। उसके विरोध की किसी प्रकार की प्रवाह किये बिना उन्होंने अपना काम जारी रखा।



उन्हीं दिनों में डॉ. मसीमर (Dr. Msimr) ने एक लेख लिखा जिसका शीर्षक था।

” सितारों का प्रभाव मानव शरीर पर “

इस लेख के छपते ही डॉक्टरों की दुनिया में एक अच्छा खासा हँगामा खड़ा हो गया। यह लेख डॉ मसीमर (Dr. Msimr) के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। सन 1746 ई० में ऐसे किसी भी लेख का प्रकाशित होना कोई साधाहरण बात नहीं मानी जाती थी। एक अन्य लेख “ANIMAL MAGNETISM” इसी लेख से जानवरों की चुम्बक शक्ति पर विश्व में पहली बार प्रकाश डाला गया था। जानवर और मानव (Human) के शरीर के अंदर जो विचित्र शक्तियाँ छुपी हुई हैं उनके विषय में जब लोगों के सामने ऐसे तथ्य आए तो चारों ओर से एक हँगामा खड़ा हो गया। कुछ लोग तो इस बात पर विश्वास करने तक को तैयार नहीं थे।

डॉ मसीमर (Dr. Msimr) का खुला विरोध शुरू हो गया। कुछ लोगों ने उन्हें जादूगर, (Magician) तांत्रिक तक कह डाला और कुछ एक ने धोखेबाज़, झूठा, फरेबी तक कहा।

डॉक्टरों का विचार था कि वे एक बहके हुए डॉक्टर है जो अपने रास्ते से भटक चुके हैं और अपने कर्तव्य को भूल कर विनाश की राह पर चल पड़े हैं। ऐसे आदमी को डॉक्टर कहना डॉक्टरी विद्या का अपमान करना है। एक डॉक्टर यदि जादूगरी और तांत्रिक शक्तियों (Psychic Powers) पर विश्वास करने लगे तो उसे पथ भ्रष्ट इंसान ही कहा जाएगा।

इस हँगामे और विरोध के फल स्वरूप वहाँ की “MEDICAL FACULTY” कौंसिल ने उनकी डॉक्टरी डिग्री तक ज़ब्त करने की धमकी दे डाली। डॉ मसीमर ने ऐसी किसी चीज़ की परवाह किए बिना अपने रोगियों का उपचार जारी रखा। बिना दवा दारू के यदि कोई भी रोगी ठीक हो जाए तो इसे लोग जादूगरी नहीं तो और क्या कहेंगे ? लोग न जाने क्या कुछ कहते रहे लेकिन डॉ मसीमर ने अपना कार्य जारी रखा।

अनेक रोगी जब उनके उपचार से रोग मुक्त हो गए तो उनके विरोधियों की जबाने बंद होने लगी। यहीं नहीं लोगों के आश्चर्य की कोई सीमा ही नहीं रही थी। अब डॉक्टरों के अंदर भी दो ग्रुप पैदा हो गए। इसमें से एक दल तो उनका खुला विरोध कर कर रहा था और दूसरा दल उनसे इतना प्रभावित था कि उनके साथ मिलकर काम करने को तैयार हो गया। परन्तु वहाँ की “MEDICAL FACULTY” कौंसिल ने तो बराबर उनका विरोध जारी रखा। इस पर भी डॉक्टर मसीमर ने कौंसिल से कई बार प्रार्थना की:-

“आप लोग स्वयं मेरे कार्यों की जाँच करें। मेरे परीक्षणों (Tests) से जो मानव जाति को लाभ हो रहा है उसका स्वयं निरीक्षण करें तो पता चलेगा कि मैं जो कुछ भी करने जा रहा हूँ वह केवल मानव धर्म की सेवा का की एक अंश है, इस विश्वास के पश्चात मुझे ने केवल अपना कार्य करने की अनुमति दी जाए।”

इस पर भी जब मेडिकल कौंसिल (Medical Council) के लोगों ने डॉ मसीमर (Dr. Msimr) की बात नहीं मानी तो उन्होंने “मानव चुंबक शक्ति” (Human Magnet Power) पर एक बहुत बड़ा लेख लिखा। उस लेख के प्रकाशित होते ही चारों ओर एक नई हलचल मच गई। विज्ञान जगत के लोग तो इस विचार को मानने के लिए तैयार ही नहीं थे। उन्होंने साफ़ साफ कहा कि – ” यदि डॉ मसीमर ( Dr.Msimr) को अपने ऊपर इतना ही विश्वास है तो वह विज्ञान के सिद्धांतों पर काम करके दिखाएँ।

डॉ मसीमर (Dr. Msimr) ने उनकी इस दलील को मानने से इंकार कर दिया। वह अपने पहले लेख में यह बात काफ़ी खुल कर कह चुके थे कि – ” आकाश के चाँद सितारे और चाँद के उतराव चढ़ाव से मानव शरीर पर काफ़ी प्रभाव पड़ता है। इसके साथ – साथ सागर के पानी का उछलना कूदना, तूफान आना, ज्वार भाटा इन सबसे मानव शरीर प्रभावित होता हैं।

उन्होंने इस बात को स्पष्ट रूप से लोगों के सामने रखा कि यदि सागर और इंसान एक दूसरे पर प्रभाव डाल सकते हैं तो फिर जानवरों की चुंबक शक्ति मानव शरीर पर अपना प्रभाव क्यों नहीं डाल सकती ?

उन्होंने यह भी सिद्ध किया कि यह चुम्बक शक्ति लोहे में भी मौजूद है। यदि हम इन दोनों प्राकृतिक शक्तियों का उपयोग मानव शरीर पर करें तो इंसान हर प्रकार के रोगों से मुक्ति प्राप्त कर लेता है। डॉ मसीमर ने अपने विचार डॉक्टरों के सामने रखते हुए कहा कि – ” मानव शरीर के अंदर विशेष प्रकार का एक “तरल वस्तु ” (FLUID) होता है जो अपने एक जानवर वाली चुम्बक शक्ति रखता है। इसके गलत ढंग से बहने से ही मानव शरीर में अनेक रोग जन्म ले लेते है। यदि हम तरल वस्तु  (FLUID) को गलत दिशा कि ओर बहने दिया जाए। यह काम हम मानव शरीर की चुम्बक शक्ति के द्धारा कर सकते हैं। इस क्रिया से हम मानव शरीर को रोग मुक्त बना सकते हैं।

इस बात को प्रमाणित करने के लिए डॉ मसीमर (Dr. Msimr) ने अपने निजी मकान में छोटी सी प्रयोग शाला बनाई। इसी में उन्होंने चुंबक (लोहे के टुकडों ) Iron Pieces से लोगों का उपचार शुरू किया। यह कार्य इस प्रकार से होता था – पहले रोगी को एक दम से सीधा लेटा दिया जाता था फिर उसके पास से लोहे के टुकड़ों को एक –  एक करके आगे को गुजारा जाता था।

कुछ समय के उपचार के पश्चात रोगी ठीक हो जाता था। यदि कुछ लोग इसे जादू समझते थे तो इसमें उनका दोष ही क्या था ? एक बात तो डॉक्टरों की समझ में आ रही थी कि यदि कोई मानव अपने बिखरे हुए विचारों को इकट्ठा करके मन से अध्धयन करें तो अनेक रोगों को मिटाया जा सकता है। उस काल में लोग देवी- देवताओं की पूजा करके पादरियों के आशीर्वाद से रोग मुक्त होने की बातें तो आम ही सोचते थे। तंत्र – मन्त्र द्धारा भी उपचार होता था। लोगों को इन चीजों पर विश्वास था तो डॉ मसीमर (Dr.Msimr) के उपचार पर तो विश्वास होना प्राकृतिक बात थी।

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि मानव को एक दैवी शक्ति दे रखी है। उस शक्ति से वह इतना कुछ कर सकता है जिसकी कल्पना भी नहीं कर सकता। यह तो हमारा दुर्भाग्य है कि मानव की उन्नति के साथ साथ ऐसे महापुरुष, ऋषि- मुनि समाप्त होते चले गए। उनके स्थान पर जादू टोने होने लगे। ऐसे जादूगरों ने ऎसे –  ऐसे अविष्कार (Invention) कर दिखाए कि उन्हें देखकर वह काँपने लगे थे।

ऐसे जादूगरों ने बुरे काम अधिक किए और अच्छे कम। धीरे – धीरे यह जादूगर का भ्रम टूटने लगा जिसके कारण ही इंसान ने अपनी आत्मिक शक्ति (Spiritual Strength) का काम छोड़ दिया जो आत्मिक शक्ति (Spiritual Strength) प्रकृति ने उसे उपहार के रूप में दी थी। विज्ञान के बढ़ते कदमों के साथ –  साथ प्रकृति की एक शक्ति पर से इंसान का विश्वास टूटने लगा। इस आत्मिक शक्ति को केवल ढोंग की संज्ञा दी गई। “वहम ” केवल इंसान अपने ही वहम का शिकार है। यही वहम इंसान को दीमक की भाँति चाट जाता है। इसी कारण अनेक लोग अपनी जान तक खो देते हैं।

ऐसे भी लोग इस दुनिया में है जिनका यह मत है कि यदि किसी काम से जाते समय कोई काली बिल्ली सामने से गुजर जाती है तो समझ लो आपका कोई काम पूरा नहीं होगा बल्कि आपका नुकसान जरूर होगा। यह कैसा वहम है कोई यह नहीं सोचता कि बिल्ली भी तो अपनी राह पर चली जा रही है वह भी तो एक जीव है। काली है तो क्या हुआ ? यदि आप लोग अपने ईश्वर को मानते हो तो फिर यह क्यों नहीं सोचते कि उस काली बिल्ली का जन्म दाता भी तो वहीं ईश्वर है फिर उसके बनाए जीव से घृणा कैसी ? इसे ही अंध विश्वास और वहम कहा जाता है।

शिक्षा और विज्ञान (Science) ने इंसान की आँखे खोल दी हैं। विज्ञान (Science) ने वहम की दीवार में सुराख़ कर दिया और लोग इस वहम से दूर हटने लगे।

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