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आप कैसे अपने घर पर औषधियों का निर्माण कर सकते हैं! सीखें।

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पिपला दिगण पीपल , पीपला मूल , को  चतुरुषण कहते हैं। चतुरुषण, सोंठ , मिर्च , पीपल , पीपला मूल को चतुरुषण कहते हैं, चतुर्बीज :- मेथी , हालों स्याह , अजवायन इन चारों के योग को चतुर्बीज कहते हैं। प्रतिनिधिद्रव्यकस्तुम्बर के नाम, हरा धनिया, सफेद सरसों, लाल सरसों, मेदा, गुर्च असगन्ध, महमिदा,  लाल सरसों, जीवक,  गुर्च, वृद्धि,  सहदेई, कुलझम,  परवल, मुनि,  चिराचता, सुंधिवार, सम्रहालू, सोरठ मिटटी, फिटकरी, लाभउजक  तृण, खस, भारंगी, कटेरी, काकी,  असगन्ध, औषधि निर्माण औषधि निर्माण का कार्य , उतना ही कठिन है जितना कि रोगी को ठीक करने का परन्तु इसमें कोई संदेह नहीं कि बिना ओैषधि के रोगों का इलाज नहीं हो सकता आज आयुर्वेद के बढ़ते कदमों को देख कर उसके शत्रु भी यह मानने को तैयार हो गए हैं कि आयुर्वेद में गंभीर रोग का उपचार है। अब जब हम औषधि निर्माण की बात करते है तो यह बात मेरे प्रिय पाठकों को याद रखनी होगी कि नवीन औषधि उधोग में नई मशीनें आ चुकी हैं, जिन के द्वारा हर प्रकार की दवाएं बड़ी आसानी से बनाई जा सकती हैं, इसलिए जो भी सज्जन औषधि निर्माण करना चाहते हों, उन्हें नवीन प्रणाली की ओर अवश्य ध्यान देना होगा। यह सारा  ज्ञान आपको मशीनरी विक्रताओं के हां से मिल सकता है। अब कुछ और

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वाय बनाना औषधि से 16 गुना जल लेकर  12 घंटे औषधि को जब कूट कर भिगो कर रखें, इसके पश्चात मीठी – मीठी आग पर उसे पकाना चाहिए, जब वह पक कर 1 / 4 भाग रह जाए तो नीचे उत्तर कर उसे छान लें, वाय रति है। फांट बनाना औषधि से आठ गुना जल लेकर 12 घंटे औषधि भिगोने के पश्चात मीठी आंच पर पका लें आधा रहने पर छान लें यह फांट विधि है। हिम बनाना औषधि से चार गुना पानी लेकर, औषधि 12 घंटे भिगो कर कूट कर छान लें, यह हिम विधि है। स्वरस निकालना हरी औषधि को कूट कर अर्क को छान लेना चाहिए। यह स्वरस विधि कहलाती है। परन्तु कई एक हरी औषधियों में से कूट कर अरक नहीं निकलता, इसलिए पहले उन्हें काट कर भीगे हुए कपड़ेे में लपेट कर देगची में रख कर थोड़ा गर्म कर लें इसके पश्चात स्वरस बड़े आराम से निकल सकता है।

अरक निकालना जिस औषधि का अरक निकालना हो और वह सूखी औषधि हो तो उसे बारह से पंद्रह घंटे तक पानी में भिगो कर रखना चाहिए। यदि औषधि हरी हो तो  जो कूट कर नलिका यंत्र ( भवका ) से अरक निकालना चाहिए। कलक विधि हरी औषधि को सिल बट्टे पर पीस कर बारीक चटनी जैसा बना लेना चाहिए तथा सूखी औषधि  जल में डालकर पीस लेने को कलक कहते हैं। पुटपाम औषधि का कलक बना कर जामुन आदि के पत्तों में लपेट कर ऊपर से कपरमिट कर भालू की भूमल में पका लें जब मिटटी का रंग लाल हो जाए तो निकालकर मिट्टी को अलग करके, अंदर से औषधि को निकाल लें और उसमें से निचोड़ कर अरक निकाल लें। 

घृत एवं तेल विधि औषधियों को कमल बना कर और सूखी औषधियों हों तो मवाय बना कर समान घृत या तेल में मिला दें और मीठी आंच पर उसे पकाते रहें घृत या तेल जब नाम मात्र रह जाए तो उसे उतार लें। अवलेह विधि औषधियों को कवाव कर चार गुनी चीनी मिला कर पका लें, यदि गुड़ डालना हो तो दुगना डालें, चासनी एक तार की तैयार करके नीचे रखें यही अवलेह विधि है। पाम विधि पाम में पड़ने वाली रसादिक औषधियों के अतिरिक्त अन्य औषधियों को बारीक पीस कर कपड़ छान करके सब औषधियों के बराबर चीनी मिला कर तीन तार की चासनी बनाएं। अब उसे नीचे उतारकर रसादिक औषधि तैयार कर लें। फिर उसमें शहद आदि मिला लेने से यह औषधि तैयार हो गई। सौवीर कच्चा और पक्का जौ कूटकर पानी में भिगो दें फिर उसे कपड़े में छान लें, इसी छने हुए जौ को सौवीर कहते हैं।

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कांजी या आरनाल एक किलो चावल को 14 किलो पानी में भिगो दें, फिर उसे उबाल कर उसकी मांड निकाल लें। 1 सेर कुथली का कवाय करके छान लें और मांड कवार्य  में राई, जीरा – नमक , सोंठ – हींग  हल्दी 1 ग्राम बारीक पीस कर मिला दें। मिट्टी की हांड़ी को सरसों के तेल से चुपड़ कर उसमें इसमें  भर कर  3  दिन तक हांड़ी मुंह बंद करदें, बस यही कांजिया आरनाल बनाने की विधि है। चावल का धोवन पहले चावलों को पानी में साफ कर आठ गुने पानी में 2 घंटे तक भिगो कर रखें फिर छान लें, चावल शब्द का यहां पर अर्थ साठी धान से है। लाख का रस बनाना पीपल की लाख को आठ गुने पानी में डाल कर आग पर पकाये साथ – साथ थोड़ा सा सुहागा भी डालते जाएं, जब जब गल जाएं तो चतुर्थाश रहने पर कड़ाही को उतार कर उसे छान लें,  बस यह  लाख का रस तैयार है। आसव जो औषधियां हिसाब से लिखी गई हैं उन्हें आठ गुने पानी में पकावें इनमें गुड़ भी मिला कर मिट्टी के बर्तन में पकावें।  यदि इस मिट्टी के बर्तन को चूरे या भूसे में दबा कर पकाया जाएं तो सबसे अच्छा होगा, एक मास तक दबा रहने के पश्चात उसे निकल कर छान लें, कई वैध इस असाव को नलिमा यंत्र दुआरा अरक निकल कर भी जल्दी से काम में  लाते हैं। अरिष्ट हिसाब से तैयार की गई औषधियों को जब कूट कर आठ गुने पानी में पका लें, जब यह चौथाई रह जाएं तो उत्तर कर छान लें, फिर इसमें गुड़ एवं दूसरी औषधियां मिलाकर इसे भूसे में एक मास  के  लिए दबाए रखें। एक मास के पश्चात इसे निकाल कर छानते हुए शीशियों में भर बढ़िया लेबल लगाएं।

नाम प्रयोग औषधि मात्र में यहां पर दूध , घी , मूत्र , मात्र का नाम हो तो वहां पर केवल गाय का ही अर्थ है। यदि वहां पर गंधक लिखा है तो वहां पर आमला सार गंधक लें। यदि पारद लिखा हो तो हियुले पारद लें। यदि हरताल का नाम हो तो हरताल तवकी लेवें। गियोल का सत बनाना गियोल को बारीक कूट कर 4 गुने पानी में 4  घंटे तक भिगो दें, फिर उसे छान लें, गिलो को एक बार फिर से पानी डाल कर उबालें। उसे पका कर नीचे उतार कर ठंडा करके हाथों से उसे मसलकर सत निकाल लें। इसे एक बार फिर से छान लें। इस प्रकार से सारे पानी को इकट्ठा कर लें। किसी साफ बर्तन में भरकर रख दें। बस गिलो का सत तैयार है। कजली बनाना जिन औषधियों में पारा तथा गंधक का प्रयोग होता हो ऐसे अवसर पर इन दोनों को इकट्ठा करके उनका एक साथ घुटाई करे कि पारे की चमक नजर न आएं। जब तक सही कजली न बन जाए उसे दवाई में न मिलाएं।

रसौंत दरुहंदी को कच्चे तथा गीली लकड़ियों के बारीक टुकड़े कर चार गुने पानी में हल्की आंच पर धीरे – धीरे पकाएं जब चौथाई भाग रह जाए तो उसे नीचे उतार कर छान लें और छने हुए जल में उससे चार गुना दूध मिला कर फिर आग पर रख कर गर्म करें, जब उबलते दूध मिला कर फिर आग पर रख कर गर्म करें, जब उबलते उबलते दूध पूरी तरह से जल जाएँ तो उसे निचोड़कर ठंडा होने पर पत्ती में लपेट दें, बस यह रसौंत तैयार है। क्षराष्टकपलाश बुहर, आपमवमार्ग, इमली, आक, तिल, इनका क्षार तथा यवक्षार, सज्जी, सबकी क्षार, इन आठ क्षारों को मिलाकर क्षराष्टक बनता है। शर्बत बनाना यदि किसी वस्तु का शर्बत बनाना हो तो उस औषधि को लेकर पानी में मिला दें। फिर उसे हल्की आंच पर रख कर पकाना आरम्भ करें। जब पानी आधा रह जाये तो उसमें चीनी डाल दें, चाशनी दो तार भी या एक तार की होने पर समझ लें कि वह पक चुकी है, यदि कोई औषधि सुखी हो तो उसे बारह घंटे तक पानी में भिगो कर रखें, इससे शरबत जल्दी तैयार हो जाता है।

धातुशोधन तथा मारण सुवर्णशोधन सोने के छोटे छोटे टुकड़े पतले पतले बनाकर आग पर सुरख गर्म कर तेल, छाछ कांजी तथा कुल्फी के बर्तन में गर्म करके तीन – तीन बार खुर्चे और साफ करें  सफ शुद्ध हो जाएगा सुवर्ण मारण 1 किलो कचनार पत्ते की लुगुड़ी बनाकर शुद्ध सोने के पतरे उसके बीच में गोला बनाकर सुखा लें और सात बार कपर मिटटी कर दें 3 बार बजपुट में फुकें तो उसकी भस्म तैयार होती है। चाँदी मारना एक भाग हरताल नीबूं के रस के रस में, प्रहर घोटें, इसके पश्चात तीन भाग चाँदी के पतरे लेकर ऊपर हरताल का लेप करें, और मिटटी भूसा बनाकर उसके बीच में पतरी की राख गोला बना कर 7 बार कपर मिटटी 3 बार गजपुट में फुकें तो उससे चाँदी की भस्म तैयार हो जाएगी।      

एक और महाबली भस्म सोना 1 भाग, शुद्ध पारा 2 भाग, नीबूं के रस में घोल कर गोली बनाएं, शुद्ध गंधक 15 ग्राम, को पीस कर सूखे में रख मध्य में गोली रखें और 4 बार सराख सम्पुट कर गजपुट में फुकें तो यह भस्म तैयार होती है। तांबा मारने की विधि शुद्ध ताँबे के पतले पतले टुकड़े काट कर उसके पतरे बनाएं 1 किलो बंद गोभी को भुगही के मध में, रख  गोला बनाएं इस गोले पर सात कपरो को रख कर दो किलो आरने के उपलों की गुजपुट में फुकें तो यह भस्म तैयार होती है। लोहा शोधन लोहे बारीक़ चूर्ण लोहे का बारीक़ चूर्ण आग पर लाल कर तेल, छाछ, कांजी, कुलची गौ का पेशाब तीन तीन बार बुझाएं तो शुद्ध होगा।  कांसे तथा पीतल

 पहले इनमें छोटे टुकड़े करके आग पर रखकर गर्म करके शुद्ध करें फिर कांसे तथा पीतल के पतरो को नीबूं के रस में छोड़े और उन्हें साफ करें। इसके पश्चात गंधक उनके बराबर की लेकर आम के दूध में घोंटकर पतरों में फुकें।

इसी प्रकार से सात बार यही क्रम किया जाए। 7 बार राजपुट में जलाने से उत्तम भस्म तैयार होगा।

कीट शोधन पुराने लोहे का बारीक़ बुरादा गौ मूत्र, त्रिफला, नीँबू के रस में सात बार घोट कर बराबर का गंधक मिला कर घुटाई कर गोला बना कर राजपुट में फुकें तो यह उत्तम भस्म तैयार होगी। हरताल शुद्धि 1. शुद्ध हरताल दो दिन तक घी कंवार के रस में घोटकर सनई के बीजों की लुगदी बना मध्य में रखकर गोला बना कर सुखा लें और कपड़पिट कर गजपुट में फूँक दें तो अति उत्तम भस्म तैयार होगा। 2. शुद्ध हरताल 3 दिन तक की कंवार में घोट कर सराव स्रम्पुट कर फिर कपरोटी कर लघुपुट में 16 घंटे तक की आग दें तो यह भी उत्तम भस्म बनेगी।  

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