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FINANCIAL STATEMENTS ANALYSIS Meaning and Concept of Financial Analysis

Concept of Financial Analysis all over india

वित्तीय विवरण विश्लेषण (FINANCIAL STATEMENTS ANALYSISपरिचय (Introduction) FINANCIAL STATEMENTS ANALYSIS Meaning And Concept Of Financial Analysis. वित्तीय विवरण प्राथमिक रूप से निर्णय करने के प्रयोजन से तैयार किये जाते हैं । ये विवरण प्रबंधकीय  निर्णय के ढांचे को निर्धारित करने में प्रभावपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते हैं । किन्तु वित्तीय विवरणों  में उपलब्ध  की गयी सुचना स्वयं  में एक साध्य नहीं  होती हैं क्योकि  केवल वित्तीय विवरणों से कोई  अर्थपूर्ण व  सार्थक निष्कर्ष  नही  निकाले  जा सकते हैं । फिर भी, वित्तीय विवरणों  में उपलब्ध  सूचना  की  इन  वित्तीय विवरणों के विश्लेषण एवं निर्वचन के माध्यम  से निर्णय लेने में असीम  महत्त्व  होता है । वित्तीय विश्लेषण “आर्थिक चिट्टा  एवं लाभ -हानि  खाता  के मदों  के बीच मदों  उचित संबन्ध  स्थापित करके एक संस्था की वित्तीय शकितयों  एवं दुर्बलताओं  की पहचान करने की प्रक्रिया हैं।”

(Financial analysis is the process of identifying the financial strengths and weaknesses of the firm by properly establishing relationship between the item of the balance sheet and the profit and loss account’)

FINANCIAL STATEMENTS ANALYSIS Meaning And Concept Of Financial Analysis

वित्तीय विवरणो  का  विश्लेषण करने में विभिन्न विधियों अथवा तकनीको  का प्रयोग किया  जाता है, जैसे तुलनात्मक  विवरण, (Comparative statements)  प्रवृति  विश्लेषण (trend analysis), सामान्य -आकार  के विवरण (common-size statements), कार्यशील पूँजी  में परिवर्तनों  का विवरण (statement of change in working analysis), कोष प्रवाह  विश्लेषण (fund flow analysis) एवं रोकड़ प्रवाह  विश्लेषण (cash analysis) , लागत -मात्रा -लाभ विश्लेषण  (Cost – volume-profit analysis) एवं अनुपात विश्लेषण  (Ratio Analysis)।

वित्तीय विश्लेषण का अर्थ एवं अवधारणा (Meaning and Concept of Financial Analysis)

वित्तीय विश्लेषण पद जिसे वित्तीय विवरणों  का विश्लेषण एवं निर्वचन भी कहा जाता है, का आशय  आर्थिक चिट्टा, लाभ हानि एवं अन्य खाता  परिचालन  समंको  के पदों  के मध्य महत्त्वपूर्ण  अंतर्सबंन्ध स्थापित  करके फर्म की वित्तीय शक्तियों और दुर्बलताओं  का निर्धारण करने की प्रक्रिया से है । मेटकॉफ एवं टिटार्ड के अनुसार ” वित्तीय विवरणों का विश्लेषण किसी संस्था की स्थिति और निष्पादन का श्रेष्ठ  बोध प्राप्त करने केलिए एक वित्तीय विवरण के आंगिक भागों  के बीच संबंध का मूल्यांकन करने की प्रक्रिया है।” मायर्स (Myers) के शब्दों में वित्तीय विवरण विश्लेषण विवरणों के किसी एक सेट द्वारा प्रदर्शित एक व्यवसाय के विभिन्न वित्तीय घटकों  के मध्य संबंध  केक व्यापक अध्ययन  है और साथ ही विवरणों की एक श्रृखला  में प्रदर्शित  इन  घटको की प्रवृति  का अध्ययन है।”

वित्तीय विश्लेषण का प्रयोजन वित्तीय विवरणों में दी गई  जानकारी या सूचना  का इस प्रकार लक्षण  -निदान करना है ताकि  संस्था की लाभप्रदता एवं वित्तीय सुदृढ़ता  का  आकलन किया जा सके । जिस प्रकार एक डॉक्टर अपने रोगी के रोग के बारे में अपना कोई  निष्कर्ष निकालने  और उसका प्रारम्भ  करने के पूर्व उस रोगी के शरीर का तापक्रम, रक्त चाप आदि की जानकारी करके परीक्षण करता है, उसी भाँति  एक विश्लेषणकर्त्ता किसी उपक्रम के वित्तीय स्वास्थ्य या दुर्बलताओं  पर टीका-टिप्पणी  या समीक्षा करने के पूर्ण विश्लेषण के विभिन्न उपकरणों  की सहायता से वित्तीय विवरणों का विश्लेषण करता है। वित्तीय विवरणों के संमको  के पीछे छिपे  रहस्य को प्रकाश  में लाने के लिए इन वित्तीय विवरणों का विश्लेषण एवं निर्वचन करना आवश्यक होता है। ‘विस्तृत   रूप से वित्तीय विवरण विश्लेषण विभिन्न विवरणों में प्रदर्शित विभिन्न वित्तीय घटको के मध्य संबन्धों का एक अध्ययन होता है। वित्तीय विवरण विश्लेषण वित्तीय विवरणों के संमको  का अर्थ और महत्त्व निर्धारित करने का एक ऐसा प्रयास है जिससे कि  भावी  अर्जन, परिपक्क्ता  तिथि  पर ब्याज और ऋण के भुगतान की क्षमता एवं सृदृढ़  लाभांश  नीति की लाभदायकता के बारे में पूर्वानुमान  लगाया  जा सके।”

वित्तीय विवरण विश्लेषण (Financial Statement Analysis) पद में विश्लेषण एवं निर्वचन दोनों ही सम्मिलित हैं। अतः  दोनों पदों  में अन्तर जानना चाहिए। यदि ‘विश्लेषण पद का वित्तीय ‘निर्वचन  आशय इस प्रकार से सरलीकृत  समंको के अर्थ और महत्त्व की व्याख्या करना है।’ फिर भी ‘विश्लेषण तथा निर्वचन दोनों ही एक दूसरे से जुड़े हुए  होते हैं तथा  एक दूसरे का पूरक होता है। निर्वचन के बिना विश्लेषण  अनुयोगी है। और विश्लेषण के बिना निर्वचन करना कठिन ही  नहीं, असम्भव भी है। अधिकांश  लेखकों ने विश्लेषण और  निर्वचन  दोनों  के अर्थो का समावेश करने के लिए केवल ‘विश्लेषण पद का ही प्रयोग किया है क्योंकि  विश्लेषण का उद्देश्य  निर्वचन के द्वारा वित्तीय विवरणों के विभिन्न मदों  के बीच संबंधो  का अध्ययन करना है। हमने भी विश्लेषण और निर्वचन के आशयों के समावेश करने की दृष्टि से वित्तीय विवरण विश्लेषण अथवा केवल ‘वित्तीय विश्लेषण  पद का ही प्रयोग  किया है।

वित्तीय विवरण विश्लेषण के उद्देश्य और महत्त्व (Objective and Importance of Financial statement analysis)

वित्तीय विवरण विश्लेषण का प्राथमिक उद्देश्य फर्म की वित्तीय सुदृढ़ता और लाभदायकता के बारे में धारणा  बनाने के उद्देश्य से वित्तीय विवरणों में सम्मिलित सुचना का बोध करना तथा जाँच करना और  फर्म के भविष्य में सम्भावनाओ  के बारे में पूर्वानुमान  लगाना है। इस विश्लेषण का प्रयोजन इस प्रकार के विश्लेषण में रूचि रखने वाले तथा इसके उद्देश्य पर निर्भर करता है।

हालांकि, ऐसे विश्लेषण के महत्त्व को दर्शाने के लिए वित्तीय विवरण विश्लेषण के निम्नलिखित उद्देश्य या प्रयोजन निर्दिष्ट किये जा सकते  हैं –

1 फर्म की अर्जन क्षमता या लाभदायकता को आँकना।

2 परिचालन कुशलता और प्रबंधकीय प्रभावशीलता को आँकना।

3 फर्म की अल्पकालीन और दीर्घकालीन ऋण की शोधन क्षमता को आँकना।

4 फर्म की वित्तीय स्थिति और लाभदायकता में परिवर्तन के कारणों को पहचानना।

5 अन्तर- फर्म तुलना करना।

6 फर्म की भविष्य में सम्भावनाओं के बारे में पूर्वानुमान लगाना।

7 एक समयविधि में फर्म की प्रगति को आँकना।

8 निर्णयन और नियंत्रण में सहायता करना।

9 लाभांश कार्य (dividend action) को नियत करना     या मार्ग – दर्शन  करना।

10 साख स्वीकृत करने के लिए महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रदान करना।

वित्तीय विश्लेषण में रूचि लेने वाले पक्ष (Parties Interested in Financial Analysis)

वित्तीय विवरणों में निम्निलिखित पक्ष रूचि रखते हैं –

1 निवेशक और संभावित निवेशक (Investors or Potential investors)

2 प्रबंधतंत्र सभा (Management)

3 लेनदार या पूर्तिकर्त्ता (Creditors or Suppliers)

4 बैंकर और वित्तीय संस्थाएँ (Banking and financial Institutions)

5 कर्मचारी (Employees)

6 सरकार (Government)

7 व्यवसायिक संस्थाएँ (Traded association)

8 स्टॉक एक्सचैंजेस (Stock Exchanges)

9 अर्थशास्त्री  और शोधनकर्ता  (Economists & Researcher)

10 कराधान अधिकारी (Taxation Authorities)

उपर्युक्त  रूचि रखने  वाले पक्षों  के लिए वित्तीय विश्लेषण की उपयोगिता  पर  चर्चा ‘वित्तीय  विवरण  के अध्याय साथ  ही साथ ‘ अनुपात विश्लेषण के अध्याय  में की गई  है।

वित्तीय विश्लेषण के प्रकार  (Types of Financial Analysis)

हम लोगों  ने पिछले अध्याय  में अध्ययन किया है कि  वित्तीय विवरणों  के विभिन्न उपयोगकर्ता  भिन्न- भिन्न उद्देश्यों  के लिए भिन्न -भिन्न कोणों  से इनका अध्ययन करते है। तथापि  हम वित्तीय विश्लेषण  के विभिन्न प्रकारों को ई i  प्रयुक्त सामग्री  एवं ii  विश्लेषण में प्रयुक्त परिचालन विधि या विश्लेषण की कार्य  -विधि पर आधारित विभिन्न वर्गो  में विभाजित कर सकते हैं।

1 प्रयुक्त सामग्री के आधार पर (On the basis of material used) – प्रयुक्त सामग्री के आधार पर वित्तीय विश्लेषण दो प्रकार का हो सकता है: (अ) बाह्रा  विश्लेषण एवं  (ब) आंतरिक विश्लेषण

(अ) बाह्रा  विश्लेषण (External Analysis) – यह  विश्लेषण ऐसे बाहरी  लोंगों  द्धारा  सम्पत्र  किता जाता है जिनकी व्यावसायिक संस्था के विस्तृत  आंतरिक लेखांकन  तक पहुँच  नहीं  होती है।

इन बाहरी लोगो  में वर्तमान निवेशक, संभावित निवेशक, वर्तमान लेनदार, भावी लेनदार, सरकारी एंजेसियों, साख  देने वाली एजेंसियां  जन -सामान्य  सम्मिलित  हैं। वित्तीय विश्लेषण के लिए, संस्था के ये बाह्रा पक्ष लगभग  पूर्ण रूप से इन प्रकाशित वित्तीय विवरणों पर आश्रित होते हैं। बाह्रा  विश्लेषण इस प्रकार केवल सीमित  उद्देश्य की पूर्ति करना है। फिर भी, व्यावसायिक संस्थाओं  को अंकेक्षित प्रकाशित खातों  के द्धारा  जन-सामान्य के लिए  अधिक विस्तृत सूचना  उपलब्ध  करना आवश्यक बनाने की दृष्टि  से सरकारी विनियमों  में हाल  ने ही किये  गये  परिवर्तनों ने बाह्रा  विश्लेषण  स्थिति में महत्त्वपूर्ण सुधार  किया है।

(ब) आंतरिक विश्लेषण (Internal Analysis) – ऐसे व्यक्तियों द्धारा  संपादित किया जाने वाला विश्लेषण ‘आंतरिक विश्लेषण कहलाता है, जिनकी एक व्यावसायिक संस्था के आंतरिक लेखांकन  तक पहुंच  होती है। इसलिए, इस प्रकार का विश्लेषण संगठन के अधिकारियो  और कर्मचारियों के साथ – साथ  ऐसी सरकारी एजेंसियों  के द्धारा भी संपादित किया जाता है जिनका इन वित्तीय विवरणों में वैधानिक अधिकार निहित होते हैं। प्रबंधकीय उद्देश्यों  के लिए किया जाने वाला वित्तीय विश्लेषण ‘आंतरिक विश्लेषण’ होता है जिसे प्राप्त किये जाने वाले उद्देश्य  के अनुसार मूर्त्तरूप  प्रदान किया जाता है।

II कार्य प्रणाली के आधार  पर (On The basis of modus operandi) – विश्लेषण  अपनायी जाने वाली परिचालन की विधि के अनुसार  भी वित्तीय विश्लेषण के दो प्रक़र  हो सकते हैं: (अ) क्षैतिज  या समतल विश्लेषण एवं  (ब) लंबवत  या उदग्र विश्लेषण।

(अ) क्षैतिज  विश्लेषण (Horizontal Analysis) – क्षैतिज  विश्लेषण का अभिप्राय किसी कम्पनी  के अनेक वर्षो  के लिए वित्तीय संमको  की तुलना से है। इस प्रकार  के विश्लेषण के लिए आंकड़ों  को अनेक खानों  में क्षैतिज  या समतल रूप में प्रस्तुत  किया जाता है।  विभिन्न वर्षो के आंकड़ों की प्रमाप  या आधार तुलना की जाती है। आधार वर्ष है जिसे प्रारम्भिक बिन्दु  के रूप में चुना जाता है। इस प्रकार के विश्लेषण को ‘गत्यात्मक  विश्लेषण भी कहा  जाता है क्योंकि यह किसी एक वर्ष के आंकड़ों की अपेक्षा वर्ष- प्रतिवर्ष के आंकड़ों  पर आधारित  होता है। क्षैतिज विश्लेषण ऐसी मदों  पर ध्यान केंद्रित  करना  सम्भव बनता है जिनमे समीक्षाधीन अवधि के दौरान महत्त्वपूर्ण  व  सार्थक परिवर्तन हुए  हैं। अनेक समयवधियो में किसी  मद की आधार वर्ष से की जाने वाली  तुलना एक वर्द्धमान  प्रवृति   प्रदर्शित  कर सकती है। तुलनात्मक  विवरण एवं ‘ प्रवृति  प्रतिशत  क्षैतिज  विश्लेषण में प्रयुक्त किये जानेवाले महत्त्वपूर्ण औजार  हैं।

लंबवत  विश्लेषण (Vertical Analysis) – लंबवत  या उदग्र  विश्लेषण  का अभिप्राय  एक ही लेखांकन अवधि के वित्तीय विवरणों में प्रस्तुत विभिन्न मदों  के अंतर्संबंध  के अध्ययन से है। इस प्रकार के विश्लेषण में किसी एक वर्ष के वित्तीय विवरण के आंकड़ों की उसी वर्ष से चुने गये  एक आधार के साथ तुलना का जाता है। इसे  ‘स्थैतिक विश्लेषण भी कहा जाता है।  ‘सामान्य -आकार  वाले विवरण (common size involved) एवं ‘वित्तीय अनुपात (Financial ratio) लंबवत  विश्लेषण में प्रयुक्त  किये जाने वाले दो औज़ार  हैं। चूँकि  लंबवत  विश्लेषण में केवल एक समयवधि  से संबंधित समंको पर विचार किया जाता है, अतः  यह वित्तीय विवरणों के एक उचित विश्लेषण के लिए कोई  बहुत सहायक नहीं  होता है। फिर भी, इसे  अधिक प्रभावी  और अर्थपूर्ण बनाने के लिए इसका क्षैतिज  विश्लेषण  के साथ प्रयोग  किया जा सकता है।

वित्तीय विश्लेषण के उपरिलिखित प्राथमिक वर्गीकरण के अतिरिक्त   वित्तीय विश्लेषण के कुछ अन्य प्रकारों का विवेचन निमुवत् है 

3 सन्निहित सत्ता के आधार पर (On the basis of entities involved) – विश्लेषण में सन्निहित  सत्ताओं  के आधार पर भी वित्तीय विश्लेषण  दो प्रकार का हो सकता है-

(अ) तिर्यक विभागीय या अन्तर – फर्म विश्लेषण और (Cross sectional or inter-firm analysis)

(ब) काल-श्रेणी या अभन्यन्तर- फर्म विश्लेषण (Time series or intra firm analysis)

(अ) तिर्यक विभागीय   अथवा अन्तर- फर्म विश्लेषण (Cross sectional or inter-firm analysis) – तिर्यक  विभागीय  विश्लेषण में एक फर्म  के वित्तीय आंकड़ों  की अन्य फर्मों  या समान सन्यावधि  उघोग  औसत के साथ तुलना की जानी है।

(ब) काल -श्रेणी अथवा अभन्यन्तर- फर्म विश्लेषण (Time series or intra firm analysis) – काल  -श्रेणी  विश्लेषण के अंतर्गत  उसी एक फर्म एक समयावधि में के निष्पादन या प्रदर्शन का अध्ययन निहित होता है।

4 समय क्षितिज अथवा विश्लेषण के उद्देश्य के आधार पर (On the basis of time horizon or objective of analysis) – समय क्षितिज के आधार पर वित्तीय विश्लेषण का दो श्रेणियों  में वर्गीकरण किया जा सकता है। (अ) अल्प – कालीन विश्लेषण और  (ब) दीर्घ-कालीन विश्लेषण

अल्प-कालीन   विश्लेषण (Short–term analysis) अल्प -कालीन विश्लेषण   एक फर्म की तरलता स्थिति या एक फर्म की अल्प -कालीन भुगतान   क्षमता  या एक फर्म की वर्तमान देयताओं  को पूरा करने की योग्यता का माप  करता है।

(ब) दीर्घ -कालीन विश्लेषण (Long-term analysis) – दीर्घ – कालीन देयताओं की भुगतान   कार्यक्रम और फर्म की ब्याज लागतो को चुकाने की योग्यता का अध्ययन सम्मिलित है। ऋण चुकाने की क्षमता, स्थिरता और लाभदायकता का माप   इस प्रकार के विश्लेषण के अंतर्गत किया जाता है।

वित्तीयविवरणों के विश्लेषण   एवं निर्वचन की क्रिया – विधि (Procedure of Financial Statement Analysis and Interpretation)

व्यापक रूप से कहा जाय  तो वित्तीय विवरणों के विश्लेषण में तीन चरण निहित  होते है। ये हैं: i  चयन (Selection)  वर्गीकरण (Classification)  एवं निर्वचन (Interpretation)। प्रथम चरण में वित्तीय विवरणों के विश्लेषण के उद्देश्य से संबद्ध  सूचनाओ का चयन करना सम्मिलित होता है। द्धितीय  चरण  संमको   विधिवत वर्गीकरण, एवं तृतीय चरण में परिणाम एवं निष्कर्ष  निकालने  का कार्य निहित होता है।

वित्तीय विवरणों के विश्लेषण एवं निर्वचन के लिए निम्नलिखित क्रिया -विधि अपनायी  जाती है:

  • विश्लेषण कर्त्ता को लेखांकन के सिद्धांतो  और प्रथाओ  से पूर्ण परिचित  होना चाहिए। उसे प्रबन्ध -तन्त्र  की योजनाओं और नीतियों  की जानकारी होनी चाहिए जिससे  कि वह यह ज्ञात करने में समर्थ  हो उसे विश्लेषण के उद्देश्य  की सीमा का निर्धारण  कर लेना चाहिए ताकि कार्य का  क्षेत्र  निश्चित किया जा सके कि इन  योजनाओं  का उचित  प्रकार  से क्रियान्वयन  किया गया है अथवा नहीं|
  • यदि संस्था के अर्जन क्षमता के बारे में जानकारी प्राप्त करना उद्देश्य  है तो आय  विवरण  का विश्लेषण करना पड़ेगा। दूसरा  ओर यदि संस्था की वित्तीय स्थिति का अध्ययन करना उद्देश्य है तो आर्थिक चिट्टे  का विश्लेषण करना  आवश्यक  होगा।
  • विवरणों में दिये गये वित्तीय संमको  को पुनर्गठित तथा पुनः विन्यसित कर लेना चाहिए। इसमें समान प्रकृति  वाले संमको  को समूहीकृत  करके एक ही शीर्षक  में प्रस्तुत  किया जाता है तथा विवरणों के व्यकितगत  संघटकों  को प्रकृति  के अनुसार खण्डो में बाँट  दिया जाता है। इस प्रकार संमको  को एक प्रमापित  स्वरूप  प्रदान किया जाता है।
  • वित्तीय विवरणों में प्रदत्त सूचनाओं  में विश्लेषण के उपकरणों  और तकनीकों, जैसे अनुपात, प्रवृति ,सामान्य आकार, कोष प्रवाह , आदि  की सहायता से अंतर्संबंध  स्थापित  किया जाता है।
  • सूचनाओं का निर्वचन सरल और बोधगम्य ढंग  जाता है। वित्तीय संमको के महत्त्व तथा उपयोगिता  की व्याख्या  निर्णयन  – कार्य  में सहायता  के लिए की  जाती है।
  • निर्वचन से प्राप्त निष्कर्षो  को प्रबंध – तंत्र  के उपयोग  हेतु प्रतिवेदन   रूप   प्रस्तुत  किया जाता है।

वित्तीय विश्लेषण एवं निर्वचन की विधियाँ अथवा युक्तियाँ (Methods or devices of Financial Analysis and Interpretation)

वित्तीय विवरणों का विश्लेषण एवं निर्वचन का संस्था की स्थिति तथा इसके साथ उसके परिचालनों  के परिणामो  को निर्धारित करने  प्रयोग किया जाता है। विभिन्न विवरणों में अंतर्संबंध का अध्ययन करने के लिए अनेक विधियों  या युक्तियों का प्रयोग किया जाता है। उन्हीं  युक्तियों  या विधियों के प्रयोग का प्रयास करना चाहिए जो उपक्रम की स्थिति का स्पष्ट विश्लेषण प्रस्तुत कर सकें।

सामान्यतया निम्नलिखित विधियों का प्रयोग किया जाता है:

1 तुलनात्मक विवरण (Comparative Statements)

2 प्रवृति विश्लेषण (Trend Analysis)

3 सामान्य -आकार   वाले विवरण (Common-size Statement)

4 कोष प्रवाह विश्लेषण (Fund Flow Analysis)

5 रोकड़ प्रवाह   विश्लेषण (Cash Flow Analysis)

6 अनुपात विश्लेषण (Ratio Analysis)

7 लागत -मात्रा-लाभ विश्लेषण (Cost-volume-profit Analysis)

प्रथम तीन विधियों या तुलनात्मक विवरण, प्रवृति  विश्लेषण एवं सामान्य -आकार वाले विवरण का विवेचन इस अध्याय के आगामी पृष्ठों  पर प्रस्तुत  किया गया है। कोष प्रवाह विश्लेषण, रोकड़ प्रवाह विश्लेषण, अनुपात विश्लेषण, और लागत -मात्रा- लाभ विश्लेषण का वर्णन पृथक -पृथक अध्यायों  में प्रस्तुत किया गया है।

तुलनात्मक विवरण (Comparative statement)

तुलनात्मक वित्तीय विवरण किसी व्यावसायिक संस्था की  विभिन्न समयवधियो की वित्तीय स्थिति को प्रदर्शित करने वाले विवरण होते हैं। संस्था की वित्तीय स्थिति के विभिन्न तत्त्वों  को तुलनात्मक प्रारूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है कि वह दो या अधिक अवधियों की वित्तीय स्थिति के बारे में धारणा  बनाने में सहायक हो। तुलनात्मक  प्रारूप में प्रस्तुत किया जाने वाला कोई भी विवरण तुलनात्मक विवरण कहलाता है। व्यावहारिक  दृष्टि  से, सामान्यतया दो विवरण वित्तीय विश्लेषण के उद्देश्य  से तुलनात्मक प्रारूप में तैयार  किये जाते हैं। दो अवधियों के संमको का केवल तुलना ही नहीं, वरन्  आर्थिक चिट्टा और आय विवरण का अंतर्संबध  भी एक विश्लेषणकर्त्ता को संस्था की वित्तीय स्थिति और परिचालन परिणामो की गहराई  के साथ अध्ययन करने के योग्य बनता है।

ये तुलनात्मक विवरण निम्नांकित दर्शाते हैं:

  1. i) निरपेक्ष संमको के मूल्य (Absolute figers in rupess amounts)
  2. ii) निरपेक्ष संमको में परिवर्तन अर्थात् निरपेक्ष मूल्यों में वृदि या कमी (Changes in figures, i.e., increase or decrease in absolute figures)

iii) प्रतिशत रूप में निरपेक्ष   समंक   (Absolute data in terms of percentages)

  1. iv) प्रतिशतों वृद्धि  या कमी (Increase of decrease in terms of percentages)

समंको को तुलनात्मक प्रारूप में प्रस्तुत किये जाने पर विश्लेषणकर्त्ता उनसे उपयोगी  निष्कर्ष  प्राप्त  सकता है। एक तिमाही, छमाही या एक वर्ष के ब्रिकी  के आंकड़े  विक्रय  प्रयासों  की केवल वर्तमान स्थिति को अभिव्यक्त कर सकते हैं, किन्तु यदि वर्तमान  अवधि की साथ-साथ पिछली  अवधियों के भी आंकड़े  प्रस्तुत किये जाते तो एक विश्लेषण कर्त्ता  विभिन्न समयवधियो की ब्रिकी  की प्रवृति  का अध्ययन करने में सश्रम हो सकेगा। इसी प्रकार, विभिन्न तुलनात्मक समंक संस्थ वित्तीय स्थिति और परिचालन की दिशा की ओर  संकेत  करते हैं।

विश्लेषण की इस विधि के प्रयोग के समंक तभी  तुलनीय  हो सकते हैं जब संबंधित  वित्तीय विवरणों को तैयार करने में एक बात यह ध्यान में रखनी चाहिए कि  यदि लेखांकन  सिद्धांतो का उपयोग में कोई  विचलन हो तो वित्तीय विवरणों  के अन्त में नीचे टिप्पणी के रूप में इस तथ्य का उल्लेख कर  देना चाहिए  और विश्लेषणकर्त्ता  को इन विवरणों का विश्लेषण व निर्वचन  करते समय सावधानी  बरतनी चाहिए।

विश्लेषण एवं निर्वचन   के लिए प्रयोगकी जाने वाली इस विधि के अंतर्गत दो तुलनात्मक विवरण (i) आर्थिक चिट्टा और (ii) आय विवरण तैयार किये जाते हैं।

तुलनात्मक आर्थिक चिट्टा (COMPARATIVE BALANCE SHEET)

तुलनात्मक आर्थिक चिट्टा विश्लेषण एक ही व्यावसायिक उपक्रम की विभिन्न तिथियों  की दो या अधिक आर्थिक चिट्टा  के एक ही प्रकार के मदों, मदों के समूह  एवं संगणित  मदों  की प्रवृति  का अध्ययन होता है।  इन आवधिक  आर्थिक चिट्ठों  मदों  में परिवर्तन व्यवसाय के सम्पादन को प्रतिबिम्बित  करते हैं। अवधि अन्त  और प्रारम्भ   चिट्ठों  के तुलनात्मक अध्ययन द्धारा  उनमे हुए  परिवर्तनों  की जानकारी प्राप्त  की जाती है। इस प्रकार ये परिवर्तन  संस्था  प्रगति के बारे में कोई धारणा निरूपित  करने में सहायक हो सकते हैं। तुलनात्मक  आर्थिक चिट्टा  में मूल आर्थिक चिट्ठों  के समंको को प्रस्तुत  करने के लिए दो खाने बनाये जाते हैं। वृद्धि  या कमी के प्रतिशत को दर्शाने के लिए एक चौथा खाना भी बनाया जा सकता है।

तुलनात्मक आर्थिक चिट्टा के निर्वचन हेतु दिशा – निर्देश (GUIDELINES FOR INTERPRETATION OF COMPARATIVE BALANCE SHEET)

तुलनात्मक आर्थिक चिट्टे का निर्वचन करते समय निर्वचनकर्त्ता को निम्नलिखित पहलुओं के बारे में अध्ययन करना चाहिए:

1 चालू वित्तीय स्थिति एवं तरलता स्थिति (Current financial position and position)

2 दीर्घ -कालीन वित्तीय स्थिति (Long-term financial position)

3 संस्था की लाभदायकता (Profitability of the concern)

1 एक संस्था की चालू वित्तीय स्थिति या अल्प -कालीन वित्तीय स्थिति का अध्ययन करने  के लिए निर्वचनकर्त्ता  दोनों वर्षों की कार्य – कुशलता की समीक्षा करनी चाहिए। चालू सम्पतियों का चालू दायित्वों  पर आधिक्य  कार्यशील पूँजी  की राशि  होती है। कार्यशील पूंजी  में वृद्धि  का आशय  व्यवसाय की चालू वित्तीय स्थिति में सुधार  होता है  चालू सम्पत्तियो में वृद्धि  के साथ-साथ यदि उतनी राशि  की वृद्धि  चालू दायित्वों  में होती है तो  यह  संस्था  की अल्प-कालीन वित्तीय स्थिति में किसी सुधार का परिचायक नही होती है। एक विघार्थी   चालू दायित्वों  में वृद्धि  या कमी का ध्यानपूर्वक  अध्ययन  करना चाहिए। यह उसे चालू  वित्तीय स्थिति का विश्लेषण  करने में सहायक  होगा।

चालू वित्तीय स्थिति के अध्ययन का एक दूसरा पहलू  यह है कि संस्था की तरलता स्थिति का अध्ययन किया जाय। यदि प्रथम वर्ष की अपेक्षा  द्धितीय वर्ष में तरल सम्पत्तियाँ जैसे हस्तस्थ रोकड़, बैंक में रोकड़, प्राप्य विपत्र, लेनदार आदि में वृद्धि  हुई  तो यह संस्था की तरलता स्थिति में सुधार का सूचक होती है। यदि स्कन्धों  में वृद्धि हुई है  तो वह वृद्धि ग्राहकों के अभाव, माँग  में कमी या अपर्याप्त  विक्रय  संवर्धन प्रयासों के कारण हो सकती है। स्कंध  में वृद्धि  से व्यवसाय  के कार्यशील पूंजी में वृद्धि   होती है परन्तु  यह संस्था  के लिए अच्छी  स्थिति  नहीं  होती है।

2  एक संस्था की दीर्घ – कालीन  वित्तीय स्थिति का विश्लेषण  स्थायीएक संस्था की दीर्घ -कालीन  वित्तीय स्थिति का विश्लेषण  स्थायी  सम्पत्तियों, दीर्घ – कालीन दायित्वों  और पूँजी  में होने वाले परिवर्तनों  का अध्ययन केकर किया जाता सकता है जिसके अनुसार स्थायी सम्पतियों का वित्त -पोषण या तो ऋणपत्र, बॉण्ड जैसी दीर्घ – कालीन प्रतिभूतियों, वित्तीय संस्थानों से ऋणों या नयी अंश  पूँजी  के निर्गमन  द्धारा  किया जाय। स्थायी सम्पतियों  में हुई वृद्धि  की तुलना दीर्घ – कालीन ऋण एवं पूँजी में वृद्धि  के साथ करनी  चाहिए। यदि स्थायी सम्पतियों में होने वाली वृद्धि दीर्घ -कालीन ऋण व पूँजी  में वृद्धि से अधिक है तो इसका यह आशय होता है कि स्थायी सम्पतियों के वित्त  – पोषण के एक हिस्से की पूर्ति कार्यशील पूँजी  से कि  गयी है।

दूसरी  ओर, यदि दीर्घ – कालीन प्रतिभूतियों  अर्थात् ऋण व पूँजी   होने वाली  वृद्धि  स्थायी सम्पतियों  में हुई  वृद्धि से अधिक है तो इसका यह अभिप्राय है कि  न  केवल स्थायी सम्पतियों  का वित्त- पोषण दीर्घ – कालीन स्त्रोतों  से किया गया है वरन् कार्यशील पूँजी के एक एक हिस्से का वित्तीय प्रबंध  इन्हीं  दीर्घ – कालीन  साधनो  से किया  गया है। एक बुद्धिमत्तापूर्ण  नीति यह होनी  चाहिए कि  स्थायी सम्पतियों के लिए वित्त  का प्रबंध  दीर्घ – कालीन कोषों  के सृजन  द्धारा  ही किया जाय।

सम्पतियों में हुई  वृद्धि या कमी का अध्ययन इन सम्पतियों  की प्रकृति  के अनुसार  किया जाना चाहिए  ताकि  भावी  उत्पादन संभावनाओं  के बारे में कोई  धारणा  बनायी  जा सके।  संयन्त्र  एवं मशीनरी में होने वाली  वृद्धि  से यह  आकलन  किया जा सकता है कि संस्था की उत्पादन क्षमता में वृद्धि  होगी। इस प्रकार दायित्व  पक्ष  का विश्लेषण  क्ररने पर भी महत्त्वपूर्ण निष्कर्षो  का पता चलता है। जैसे ऋण कोष में होने वृद्धि का यह अर्थ  कि  संस्था के ब्याज दायित्वों  में वृद्धि होगी जबकि  अंश  में ऐसी  किसी वृद्धि से ब्याज की अदायगी  के लिए किसी दायित्व  में वृद्धि नहीं होगी। अतएव, दीर्घ -कालीन वित्तीय स्थिति के बारे  में कोई  अभिमत  बनाते समय उपर्युक्त  वर्णित तथ्यों  पर ध्यान देना चाहिए।

3 तुलनात्मक आर्थिक चिट्टा  विश्लेषण का अगला  पहलू  संस्था की लाभदायकता का अध्ययन करना होता है। प्रतिधारित अर्जनों  विभिन्न संचयो एवं आधिक्य  में हुई  वृद्धि अथवा कमी के अध्ययन द्धारा  एक निर्वचनकर्ता  यह ज्ञात  करने में समर्थ  हो पता है कि  संस्था की लाभदायकता में क्या सुधार  हुआ  है या नही। लाभ -हानि  खाते  के शेष  तथा लाभो में से सृजित अन्य संचितियों  में हुई  वृद्धि का अर्थ संस्था की लाभदायकता में वृद्धि है। इन खातों/ संचयो में हुई कमी का आशय  लाभांश  का विवरण, अभिलाभांश  अंशो  का निर्गमन  अथवा  संस्था की लाभदायकता में गिरावट हो सकती है।

4  विभिन्न सम्पतियों और दायित्वों  का अध्ययन करने के उपरान्त  संस्था की वित्तीय स्थिति  के बारे में कोई  अभिमत  निरूपित  किया जाना चाहिए। कोई  भी यह नहीं  कह सकता है कि  यदि की अल्प-कालीन वित्तीय स्थिति अच्छी  है तो उसकी दीघ -कालीन स्थिति भी अच्छी  होगी, इसके विपरीत  स्थिति  भी देखने को मिल सकती है । एक निर्वचनकर्त्ता को संस्था की समग्र  वित्तीय स्थिति(overall financial position) के बारे में सबसे अंत में निष्कर्ष रूप में कुछ शब्द  अवश्य  लिखना  चाहिए।

(ii) तुलनात्मक आय विवरण (Comparative Income Statement)

आय विवरण  व्यवसाय के परिचालनों  का परिणाम प्रस्तुत करता है। तुलनात्मक  आय विवरण  एक समयवधि  किसी व्यवसाय की प्रगति  के बारे  में एक रूप -रेखा प्रस्तुत करता है। व्यवसाय की लाभदायकता  का विश्लेषण करने के लिए मौद्रिक मूल्यों के निरपेक्ष  समंको  में हुए  परिवर्तनों  एवं प्रतिशतों  का निर्धारण किया जा सकता है। तुलनात्मक  आर्थिक चिट्टा  की भाँति  आय विवरण ने भी मदों के अतिरिक्त  चार खाने होते है। प्रथम दो खानो में दो वर्षो  के विभिन्न मदों  के आंकड़ों  दिखाये  जाते हैं। तीसरे  और चौथे  खाने का उपयोग  क्रमशः  आँकड़ो में वृद्धि या कमी की निरपेक्ष राशि  प्रतिशत  दर्शाये जाते हैं।

आय विवरण के निर्वचन हेतू  दिशा–निर्देश (Guidelines for interpretation of income statement)

आय विवरण के विश्लेषण और निर्वचन में निम्नलिखित   कदम उठाये जाते हैं:

1  ब्रिकी  में हुई  वृद्धि  या कमी की तुलना बिके हुए  माल  की लागत  में वृद्धि या कमी  से की जानी चाहिए। ब्रिकी  में किसी वृद्धि का अर्थ  सदैव  लाभ में वृद्धि नहीं होता है। यदि ब्रिकी  में वृद्धि  बिके  माल की लागत  में वृद्धि  से अधिक  है तो इसका अर्थ लाभयकता में  सुधार  या प्रगति  से होता हैं।  प्रथम  कदम के रूप में सकल लाभ  की राशि  का अध्ययन करना चाहिए।

2 विश्लेषण का  द्धितीय  कदम परिचालन  लाभों का अध्ययन होना चाहिए। परिचालन  लाभ ज्ञात करने के लिए सकल लाभ में से परिचालन  व्ययों  जैसे कार्यालय  व  प्रशासनिक व्ययों, विक्रय  व  विवरण  व्ययों को घटा देना चाहिए। ब्रिकी  में वृद्धि और  परिचालन  व्ययों पर नियंत्रण  का परिणाम लाभ के रूप में वृद्धि होता है। परिचालन  लाभ में कमी परिचालन व्ययों में वृद्धि या ब्रिकी  ने कमी  के कारण हो सकती है। एकाकी  व्ययों में परिवर्तन  का भी  अध्ययन करना चाहिए। व्यावसायिक  क्रिया – कलापो   विस्तार  के कारण कुछ व्ययों में वृद्धि होने की संभावना होती है जबकि  कुछ प्रबंधकीय अक्षमता के करना भी बढ़  सकते हैं।

3  शुद्ध  लाभ में वृद्धि या कमी से संस्था की समग्र  लाभदायकता के बारे में धारणा बनती है। गैर -परिचालन  व्यय, जैसे भुगतान किया गया ब्याज, सम्पत्तियों  की ब्रिकी  से हानि, आस्थगित  व्ययों को अपलिखित  करना, आय -कर की अदायगी, आदि  परिचालन  लाभ की राशि को घटाते हैं। परिचालन लाभ में से समस्त  गैर -परिचालन  व्ययों को घटा देने पर शुद्ध  लाभ राशि  ज्ञात  हो जाती है। इसी प्रकार  कुछ ऐसी गैर -परिचालन  आय भी होती हैं, जिनसे शुद्ध  लाभ में वृद्धि होती है। शुद्ध   लाभ  में वृद्धि से संस्था की प्रगति  के बारे   में एक चित्र का आभास  होता है।

4 संस्था की  लाभदायकता के बारे में एक अभिमत निरूपित  करना चहिए  और इसका अन्त  में उल्लेख  करना चाहिए। यह भी व्यक्त  चाहिए  कि  संस्था की समग्र  लाभदायकता  उत्तम है या निकृष्ट  है।

प्रवृति विश्लेषण (Trend Analysis)

वित्तीय विवरणों  का विश्लेषण सूचनाओं  की श्रृंखला  का प्रवृतियों  की गणना  करके भी किया जा सकता है। विश्लेषण की यह विधि ऊध्र्वमुखी  या ऊपर  ओर  जाने अधोमुखी  या निचे की ओर  जाने की दिशा निर्धारित  करती है। इस विधि वित्तीय विवरण के प्रत्येक मद  का उसी मद के आधार  वर्ष   प्रतिशत  संबन्ध  की संगणना की जाती है। एक से अधिक वर्षो  के लिए सूचनाओं  को गणना  हेतु लिया जाता है और किसी एक वर्ष को जो सामान्यतया प्रथम वर्ष होता है, आधार  वर्ष मान  लेते हैं। आधार  वर्ष की संख्या  को 100 मानते  हुए अन्य वर्षो  के लिए प्रवृति अनुपातों की गणना की जाती है। इस  प्रकार  इन ज्ञात किये गये प्रवृति प्रतिशतों  या अनुपातों का अवलोकन करके विश्लेषणकर्त्ता समंको की प्रवृति के बारे में धारणा बना सकता है कि उनमे ऊपर जाने या नीचे की ओर  जाने का रुख है। उदारहण  के लिए यदि वर्ष 2000 से 2005  तक के वर्षो  की ब्रिकी  के आंकड़ों  का अध्ययन करना हो तो 2000 की ब्रिकी आधार माना जायेगा और इस आधार  वर्ष यानी 2000  संदर्भ में अन्य वर्षो की ब्रिकी  के प्रतिशत  ज्ञात किये जायेंगे, जैसा इस प्रकार दिखाया गया है:

2000      100

2001      120

2002      110

2003      125

2004      135

2005      140

ब्रिकी की प्रवृति  से यह परिलक्षित होता है कि वर्ष  2000 की अपेक्षा आगामी  सभी  वर्षो में अधिक ब्रिकी हुयी है। 2002 को छोड़कर  जिसमे पिछले वर्ष अर्थात् 2001 से कम ब्रिकी हुयी थी, अन्य वर्षों में ब्रिकी  बढ़ने  की प्रवृति रही है। इन प्रवृतियों का सूक्ष्म  अध्ययन यह दर्शाता है कि वर्ष 2004 व 2003 ब्रिकी  के वृद्धि की दर कम रही है। वर्ष 2002 की तुलना में 2003 में ब्रिकी में 15% की वृद्धि रही है जबकि  2003 की अपेक्षा  2004 में 10 % तथा 1999 की तुलना में 2005 में 5 % की वृद्धि रही है। यघपि आधार वर्ष की तुलना में अन्य वर्षो  की ब्रिकी में वर्षो की बिक्री में वृद्धि  हुयी है परन्तु वृद्धि की दर में सुस्थिरता नहीं रही है। अतएव यह आवश्यक है कि इन प्रवृतियों का अन्य मदों जैसे उत्पादन  की लागत, आदि से तुलनात्मक अध्ययन करके निष्कर्ष निकाले जायें।

प्रवृतियों की गणना करने की क्रिया–विधि (Procedure for Calculating Trends)

1 किसी एक वर्ष को आधार वर्ष मान लिया जाता है। सामान्यतया,प्रथम वर्ष अथवा  अंतिम वर्ष को आधार वर्ष मान  लेते हैं।

2 आधार वर्ष की संख्या को 100 के बराबर मान लेते हैं।

3 आधार वर्ष के संदर्भ में प्रवृति प्रतिशतों की गणना की जाती है। प्रत्येक वर्ष की संख्या में आधार  वर्ष की संख्या से भाग देते हैं। यदि आधार  वर्ष की संख्या कम है तो प्रवृति प्रतिशत 100 से कम होगा और यह 100 से अधिक होगा यदि आधार वर्ष से अन्य वर्षों की संख्या अधिक है।

प्रवृति विश्लेषण का निर्वचन  करने  में सावधानीपूर्वक अध्ययन की आवश्यकता  होती है। यदि प्रवृति का एकाकी  अध्ययन किया जाय तो प्रवृति प्रतिशत में मात्र वृद्धि  या वृद्धि या कमी  को देखने से भरमात्मक  परिणाम  मिल सकते हैं। जैसे चालू सम्पतियों में 20 % की वृद्धि अनुकूल मानी जा  सकती है। यदि चालू  सम्पतियों में इस वृद्धि  के साथ-साथ  चालू  दायित्वों  में भी उतनी ही वृद्धि हुई तो यह वृद्धि संतोषजनक  नहीं कही जा सकती है। इसी  प्रकार, यदि  उत्पादन की लागत  भी बढ़ गयी हो तो ब्रिकी में वृद्धि से सदैव  लाभ में भी वृद्धि नहीं हो सकती है।

आधार वर्ष का सावधानी के साथ चुनाव करना चाहिए। आधार के लिए किसी सामान्य वर्ष को चुना जा सकता है। आधार वर्ष की तुलना में आगामी  वर्षो में हुए  मूल्य स्तर  में परिवर्तन इन प्रवृति  अनुपातों  की उपयोगिता को कम कर देते हैं, अतः इसके लिए समुचित  समायोजन करना उपयोगी होता है। यदि आधार  वर्ष की संख्या अपेक्षाकृत  छोटी है तो इसके आधार  पर ज्ञात किये गए प्रवृति अनुपात वित्तीय  समंको के बारे में वास्तविक चित्र प्रस्तुत  नहीं करते हैं। इसी  प्रकार लेखांकन  क्रिया -विधि और परम्पराओं  में भी समरूपता होनी चाहिए अन्यथा समंक तुलनीय नहीं होंगे।

सामान्य – आकार का विवरण (COMMON-SIZE STATEMENT)

वित्तीय विश्लेषण की एक विधि सामान्य- आकार वाले विवरण तैयार करना है। इसमे आर्थिक चिट्टा और आय विवरण को विश्लेषणात्मक प्रतिशतों के रूप  प्रदर्शित किया जाता है। इन विवरणों में दिए आंकड़ों को कुल सम्पत्तियो कुल दायित्वों और कुल ब्रिकी के प्रतिशत के रूप में दिखाते हैं। सम्पतियों के योग को 100  मान लेते हैं और विभिन्न सम्पतियों का इस योग  से प्रतिशत  निकालते हैं। इसी  प्रकार विभिन्न दायित्वों का भी कुल दायित्वों से प्रतिशत  ज्ञात करते है इस प्रकार  तैयार किये गये विवरणों को अवयव प्रतिशत या 100 प्रतिशत विवरण  हैं। क्योकि  प्रत्येक व्यक्तिगत  मद का कुल  100 के प्रतिशत  के रूप में उल्लेख  करते हैं। सामान्य- आकार के विवरण  तुलनात्मक  विवरण  एवं प्रवृति प्रतिशत विश्लेषण विधियों के उस दोष को दूर कर देते हैं, जो योग  के सन्दर्भ में मदों में क्या परिवर्तन हुए हैं, इन्हें बतलाने में असमर्थ होते हैं। इस  प्रकार विश्लेषण की इस विधि के प्रयोग द्धारा  एक विश्लेषणकर्त्ता  मूल्यों के योग के संदर्भ  में आंकड़ों का मूल्यांकन करने में समर्थ  हो पाता हैं।

सामान्य आकार के विवरण निम्न प्रकार तैयार किये जा सकते हैं:

1 सम्पतियों या दायित्वों के योग को 100 के बराबर मान लेते है।

2 व्यक्तिगत सम्पतियों को कुल सम्पतियों यानी 100 के प्रतिशत के रूप में व्यक्त करते हैं। इसी प्रकार विभिन्न दायित्वों की भी कुल दायित्वों के सन्दर्भ में गणनाएँ की जाती है। उदाहरणार्थ,  यदि कुल सम्पत्तियाँ  5 लाख  रु. क हैं और स्कंध का मूल्य 50,000 रु. है तो स्कंध कुल सम्पतियों का (50,000/500000 *100) = 10% होगा।

सामान्य -आकार का आर्थिक चिट्टा (COMMON-SIZE BALANCE SHEET)

सामान्य -आकार  का आर्थिक  चिट्टे  के मदों  के योग को प्रतिशत रूप में प्रकट किया जाता है, सामान्य -आकार  का आर्थिक चिट्टा  कहलाता है। संके अंतर्गत विश्लेषण के उद्देश्य से कई  वर्षो  के आथिक चिट्ठों  को समान  आकार का बनाने के लिए विभिन्न मदों  के सापेक्षिक मूल्य ज्ञात किए  जाते हैं। जैसे, प्रत्येक सम्पति  का अनुपात के  रूप में प्रतिशत ज्ञात किए  जाते हैं। उदाहरण के लिए, किसी सामान्य आकार  के आर्थिक चिट्टा में निम्नांकित  सम्पत्तियाँ  प्रदर्शित  की गयी है:

उपरोक्त उदाहरण में कुल सम्पतियों का मूल्य 2000000रु. है जिसे 100 मानकर अन्य प्रत्येक सम्पति का इस योग से प्रतिशत दिखाया जाता है। कुल सम्पतियों से प्रत्येक सम्पतियों से प्रत्येक सम्पति के आनुपातिक संबंध को सामान्य आकार वाले विवरण में दर्शाते हैं। इसी प्रकार कुल दायित्वों से प्रत्येक दायित्व के संबन्ध  को भी दिखाते हैं।

विभिन्न आकार  वाली कम्पनियों की तुलना करने के लिए सामान्य-आकार वाले आर्थिक चिट्टे  का प्रयोग किया जा सकता है। किन्तु, विभिन्न अवधियों के आंकड़ों  की तुलना उपयोगी  नहीं  होती है क्योंकि  आंकड़ों  के योग अनेक तत्वों  से प्रभावित हो सकते हैं। विभिन्न सम्पतियों  के लिए प्रमाप प्रतिमानों  का निर्धारण  करना भी सम्भव नहीं है। एक वर्ष से दूसरे वर्ष के आंकड़ों  की प्रवृति का अध्ययन नहीं  किया जा सकता है और साथ ही ये उचित परिणाम भी प्रदान नहीं कर सकते हैं।

(i) सामान्य – आकार का आय विवरण (COMMON-SIZE INCOME STATEMENT)

आर्थिक चिट्टे  की भाँति  विश्लेषणकर्त्ता  कभी कभी आय विवरण  को भी समान आकार  में रूपांतरित कर सकता है, जिसे सामान्य आकार  का आय विवरण कहते है। इसमें  आय विवरण के विभिन्न मदों  को विक्रय के प्रतिशत केरूप में प्रदर्शित किया जा सकता है ताकि  प्रत्येक मद का विक्रय से आनुपातिक संबंध प्रकट हो सके। आय विवरण के विभिन्न मदों  और ब्रिकी की मात्रा के मध्य महत्त्वपूर्ण संबंध स्थापित किये जा सकते हैं। विक्रय में वृद्धि  होने पर निश्चित रूप से विक्रय व  वितरण व्ययों में वृद्धि होगी; न कि प्रशासनिक या वित्तीय व्ययों में वृद्धि होगी। उस स्थिति में जबकि ब्रिकी की मात्रा  में पर्याप्त सीमा तक वृद्धि होती है तो प्रशासनिक और वित्तीय व्यय बढ़  सकते हैं। यदि ब्रिकी में गिरावट हो रही हो तो विक्रय व्यय में तुरंत कमी आनी  चाहिए। इस प्रकार ब्रिकी और आय विवरण के अन्य मदों में संबंध  स्थापित किया जाता है और यह संबन्ध  उपक्रम के परिचालन क्रिया – कलापों  का मूल्यांकन करने में अत्यंत सहायक होता है।

वित्तीय विश्लेषण की सीमाएँ (Limitations of Financial Analysis)

वित्तीय विश्लेषण किसी संस्था की वित्तीय शकितयों और दुर्बलताओं का निर्धारण करने की एक शक्तिशाली क्रिया- विधि  है। किन्तु यह विश्लेषण वित्तीय विवरणों में उपलब्ध की गई सूचनाओं  पर आधारित होता है। इस प्रकार, वित्तीय विश्लेषण वित्तीय विवरणों की अंतर्निहित गंभीर  सीमाओं से मुक्त नहीं है, जैसाकि पिछले अध्ययन किया गया है। वित्तीय विश्लेषक को मूल्य स्तर में परिवर्तन, वित्तीय विवरणों के वातायन -प्रदर्शन, फर्म की लेखांकन  नीतियों में परिवर्तन, लेखांकन  की अवधारणों  एवं परम्पराओं  व्यक्तिगत  निर्णय, आदि के प्रभाव के बारे में भी सावधान रहना चाहिए। पाठकों  को जैसा कि पिछले अध्याय में उल्लेख किया गया है, वित्तीय विवरणों की सीमाओं और वित्तीय विश्लेषण के औजार के रूप में अनुपातों की सीमाओं को भी अपने विश्लेषण के साथ संबद्ध चाहिए। फिर भी, वित्तीय विश्लेषण की कुछ महत्त्वपूर्ण सीमाओ को संक्षेप में नीचे दिया जा रहा है:

1 यह अंतरिम प्रतिवेदनों का केवल एक अध्ययन है।

2 वित्तीय विश्लेषण मौद्रिक सूचना पर आधरित होता है और अमौद्रिक सूचनाओं पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है।

3 इसमें मूल्य स्तर में परिवर्तनों पर कोई विचार नहीं किया जाता है।

4 चूँकि वित्तीय विवरणों को एक चालू व्यवसाय के आधार पर तैयार किया जाता है, अतः ये ठीक -ठीक स्थिति नहीं प्रदान करते है। इस प्रकार लेखांकन अवधारणाएँ एवं परम्पराएँ वित्तीय विश्लेषण की एक गंभीर सीमा का कर होती है।

5 एक संस्था द्धारा लेखांकन क्रिया – विधि में किये जाने वाले परिवर्तन वित्तीय विश्लेषण को प्रायः भरमात्मक बना देते हैं।

6 विश्लेषण केवल एक साधन होता है; न कि स्वंय में कोई साध्य। विश्लेषक को निर्वचन करना पड़ता है और उसे अपने निष्कर्ष निकालने होते हैं। भिन्न -भिन्न व्यक्ति उसी एक विश्लेषण का अलग -अलग ढंग से निर्वचन कर सकते हैं।



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