असम, अरुणाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, बिहार, चंडीगढ़, छत्तीसगढ़, दिल्ली, गोवा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, हरयाणा, जम्मू और कश्मीरझारखण्ड, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, सिक्किम, त्रिपुरा, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तराँचल, वेस्ट बंगाल

लेखांकन सिद्धान्तों के आवश्यक लक्षण (Essential Features of Accounting Principles)

Essential Features of Accounting Principles all over india



लेखांकन सिद्धांत तभी स्वीकार किए जाते हैं जबकि उनमें निम्नलिखित लक्षण विधमान हों:

  1. प्रासंगिकता अथवा उपयोगिता (Relevance or Usefulness) – कोई सिद्धांत तभी प्रासंगिक होता है जबकि वह उन व्यक्तियों की आवश्यकताओं को संतुष्ट करता है जो उसका उपयोग करते हैं। लेखांकन सिद्धान्तों को उनके उपयोगकर्ताओं को उपयोगी सूचनाएँ प्रदान करने में समर्थ होना चाहिए अन्यथा इनसे किसी उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो सकेगी।
  2. वस्तुनिष्ठता (Objectivity) – कोई सिद्धांत उस समय वस्तुनिष्ठ या उद्देश्यपरक कहा जाता है जबकि वह तथ्यों और आँकड़ों पर आधारित हो। यह व्यक्तिपरक पूर्वाग्रह या पक्षपात से प्रभावित नहीं होना चाहिए। यदि कोई सिद्धांत उसके उपयोगकर्ताओं के व्यक्तिगत पक्षपात और सनक (whim) से प्रभावित होता है उसे उद्देश्यपरक सिद्धांत नहीं कहा जा सकता है और साथ ही उसकी उपयोगिता भी सीमित होती है जैसे लागतसिद्धांत (Cost Principles) मूल्य (Value Principles) की अपेक्षा अधिक उपयोगी होते हैं क्योंकि मूल्य बाजार पर आधारित होते हैं और कौन – सा मूल्य लिया जाए यह व्यक्तिगा निर्णय पर निर्भर करता है। अतः मूल्य सिद्धांत के अनुसार व्यक्तिगत निर्णयों के आधार पर अलग – अलग मूल्य लिए जा सकते हैं।
  3. व्यवहार्यता (Feasibility) – लेखांकन सिद्धान्तों में व्यवहारिकता का तत्व होना चाहिए। ये सिद्धांत ऐसे होने चाहिए कि उनका सुगमता के साथ प्रयोग किया जा सके, अन्यथा उनकी उपयोगिता बहुत सीमित हो जाती है। उदाहरणार्थ, आर्थिक चिट्ठा में स्थाई सम्पत्तियों को दर्शाने में ‘लागत में से हार्स घटा कर’ के सिद्धांत को अपनाना अधिक व्यावहारिक होता है। यदि इन्हें बाजार मूल्य (market value) या प्रतिस्थापन लागत (replacement cost) आधार पर प्रदर्शित किया जाता है तो इससे अनेक कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं। यही नहीं, विभिन्न व्यक्ति विभिन्न मूल्यों को आधार मान सकते हैं क्योंकि बाजार मूल्यों में हर क्षण परिवर्तन होते रहते हैं।

लेखांकन सिद्धान्तों में ऊपर वर्णित विशिष्टताएँ होनी चाहिए। किन्तु कुछ परिस्थितियों में इन विशिष्टताओं में एक अनुकूलतम संतुलन स्थापित किया जाता है जिससे कि किसी विशेष नियम को लेखांकन सिद्धांत के रूप में अपनाया जा सके। किसी नियम को सिद्धांत के रूप में अपनाने के लिए यह हो सकता है कि किसी एक लक्षण  लिए दूसरे लक्षण का बलिदान करना पड़े। जैसे, हम स्थायी सम्पत्तियों को प्रतिस्थापन लागत पर प्रदर्शित कर सकते हैं क्योंकि ऐसा करना व्यवहारिक दृष्टि से उचित है, जबकि वास्तविक लागत का सिद्धांत अपनाने पर ठीक परिणाम नहीं प्राप्त हो सकते हैं क्योंकि मूल्य सूचकांक में वृद्धि के कारण यह कम उपयोगी हो जाता है। इसी तरह, संदिग्ध ऋणों के लिए प्रावधान करने का सिद्धांत व्यवहार्यता और उपयोगिता आधार पर तय किया जाता है, यद्यपि इसमें वस्तुनिष्ठता या उदेश्यपरकता का लक्षण कम होता है। ऐसे प्रावधान किसी बहिया साक्ष्य द्धारा समर्थित नहीं होते हैं तथा इस सम्बन्ध में सदैव व्यक्तिगत पक्षपात की आशंका बनी रहती है।

लेखांकन सिद्धान्तों का वर्गीकरण (CLASSIFICATION OF ACCOUNTING PRINCIPLES)

लेखांकन सिद्धान्तों को दो वर्गों में वर्गीकरण किया जा सकता है :

(अ) लेखांकन अवधारणाएँ (Accounting Concepts),

(ब) लेखांकन परम्पराएँ (Accounting Conventions),

 लेखांकन अवधारणाएँ (ACCOUNTING CONCEPTS)

‘अवधारणा’ शब्द का प्रयोग स्वीकृत तथ्यों या पूर्वधारणयो के लिए किया जाता है जिन्हें स्वयं – सिद्धि भी कह सकते हैं। ये वे आवश्यक कल्पनाएँ एवं शर्तें होती हैं जिन पर लेखांकन आधारित होता है। यह उन लेखांकन उक्तियों का निरूपण करता है जिनके अधीन लेखा – विधि कार्य करता है। ये स्वंय – सिद्धियाँ आधारभूत परिकल्पनाऍ होती हैंजिन पर सिद्धांत आधारित होते हैं। इनकी आर्थिक एवं राजनैतिक वातावरण एवं व्यावसायिक समुदाय के सभी भागोंकी प्रथाओं तथा विचार के ढंगों से व्युत्पत्ति होती है।” (” Postulates are the basic assumptions on which principles rest. They are derived from the economic and political environment and from the modes of thought and customs of all segments of the business community.”)

अनेक लेखांकन अवधारणाओं का प्रयोग किया जाता है क्योंकि इस सम्बन्ध में लोगों में मतैक्य नहीं है. तथापिनिम्नलिखित अवधारणाओं के बारे में सामान्य सहमति पाई जाती है :

  1. व्यावसायिक अस्तित्व अवधारणा (Business Entity Concept)
  2. चालू व्यवसाय अवधारणा (Going Concern Concept)
  3. लागत अवधारणा (The Cost Concept )
  4. द्धि – पक्षीय अवधारणा (Dual Aspect Concept)
  5. मुद्रा मापन अवधारणा (Money Measurement Concept)
  6. लेखाविधि अवधारणा (Accounting Period Concept)
  7. वसूली अवधारणा (Realisation Concept)
  8. लागत व आगम की अनुरूपता अवधारणा (Matching of Costs and Revenues Concepts)

इन लेखांकन अवधारणाओं का आगे विवेचन किया जा रहा है:

  1. व्यावसायिक अस्तित्व अवधारणा (Business Entity Concept):- लेखा – शास्त्र में व्यवसाय का उसके स्वामियों से पृथक अस्तित्व माना जाता है। लेखे व्यवसाय के बारे में सूचनाएँ प्रदान करने के लिए तैयार किए जाते हैं, न कि उन लोगों के बारे में जो इसके स्वामी हैं। इस प्रकार व्यावसायिक लेन – देनो तथा व्यक्तिगत लेन – देनो में स्पष्ट विभेद किया जाता है। एक साईकिल विक्रेता अपने व्यवसाय के साथ – साथ स्वयं के प्रयोग के लिए साईकिल खरीद सकता है। व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए खरीदी गई साइकिलें व्यावसायिक लेन – देनो का एक भाग होंगी जबकि व्यक्तिगत उपयोग के लिए क्रय की गई साईकिल व्यावसायिक लेन – देन नहीं होगी, भले ही उसका भुगतान व्यवसाय के रोकड़ में से किया गया हो ; यह उस व्यवसाय के स्वामी का आहरण माना जाता है। इसी प्रकार स्वामी की निजी सम्पत्ति और उसकी व्यावसायिक सम्पत्ति, में भी अंतर किया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि अ के पास 5 लाख रुपए की सम्पदा हो और वह उसमें से 2 लाख रुपए व्यवसाय में विनियोजित कर दे तो 3 लाख रुपए उसकी व्यक्तिगत सम्पदा होगी तथा 2 लाख रुपए व्यावसायिक विनियोग कहलाएगा। ‘व्यवसाय’ एवं ‘स्वामी’ इन दोनों के पृथक अस्तित्व होते हैं। लेखापालक केवल व्यवसाय से सम्बंधित लेन – देनो के अभिलेखन में ही रूचि रखता है। व्यवसाय के स्वामी के निजी लेन – देनो का अलग से अभिलेखन किया जाता है और उनका व्यावसायिक लेन – देनो से कोई सम्बन्ध होता है। किन्तु, व्यवसाय से सम्बन्ध रखने वाले निजी लेन – देनो का लेखा रखा जाता है, क्योंकि वे व्यावसायिक लेन – देन हो जाते हैं;उदाहरण के रूप में व्यवसाय में लगाई गई पूँजी, व्यक्तिगत प्रयोग के लिए धन का आहरण, व्यक्तिगत करों का व्यवसाय से भुगतान, व्यक्तिगत उपयोग हेतु व्यवसाय से माल निकालना, आदि। इन सभी व्यवहारों का व्यवसाय में लेखा किया जाता है क्योंकि इनसे व्यवसाय किसी न किसी प्रकार से प्रभावित होता है। एक व्यक्ति द्धारा व्यवसाय में पूँजी लगाने पर पूँजी खाते को क्रेडिट तथा रोकड़ खाते को डेबिट किया जाता है। इसी तरह, निजी उपयोग हेतु आहरित रोकड़ या माल से स्वामी की व्यवसाय में लगी पूँजी में कमी होती है। यदयपि पूँजी पर व्यवसायी का स्वामित्व होता है और यह किसी अन्य व्यक्ति को देय नहीं होता है, फिर भी इसे व्यवसाय के लिए दायित्व माना जाता है क्योंकि समापन की स्थिति में ‘व्यवसाय’ द्धारा उसके ‘स्वामी’ को निवेशित पूँजी वापस करनी होगी। सम्पत्तियाँ सदैव समताओं के बराबर होती हैं। ये समताएँस्वामियों की समता (Owner Equity) अथवा /एवं बह्रिया लोगों की समता (Outsiders ‘Equity) हो सकती हैं। अतः इसका समीकरण इस प्रकार होता है :

पूँजी + दायित्व = संपत्तियाँ

व्यावसायिक अस्तित्व अवधारणा व्यावसायिक परिचालनों के परिणामों को निर्धारित करने के लिए आवश्यक माना जाता है। यदि व्यक्तिगत और व्यावसायिक लेन – देनो में विभेद करते हुए उन्हें अलग – अलग अभिलेखित नहीं किया जाएगा तो संस्था की लाभदायकता निर्धारित करना संभव नहीं हो पाएगा। अतः व्यवसाय को एक पृथक व्यक्ति माना जाता है। व्यवसाय के व्यवहारों को अलग से अभिलेखित किया जाता है तथा संस्था की कार्यक्षमता जानने के लिए लाभ – हानि खाता और आर्थिक चिट्ठा तैयार किये जाते हैं।

एकाकी स्वामित्व वाली संस्था तथा सांझेदारी संस्था के लेखा – शास्त्र एवं विधान की दृष्टियों से भिन्न – भिन्न अर्थ होते हैं। वैधानिक उद्देश्यों से व्यावसायिक और निजी सम्पदाएँ दोनों ही एक समान व एक ही वस्तु मानी जाती हैं क्योंकि व्यवसाय के स्वामी का असीमित दायित्व होता है। किन्तु लेखांकन की दृष्टि से, व्यवसाय का एक पृथक अस्तित्व माना जाता है और उसकी सम्पदाओं को स्वामी की निजी सम्पदाओं से अलग रखते हैं। इसी प्रकार, संयुक्त स्कंध कंपनी की दशा में व्यवसाय का कंपनी के अंशधारकों से एक पृथक वैधानिक अस्तित्व होता है। कंपनी में नए अंशधारकों के जाने से उसके व्यवसाय के अस्तित्व होता है। कंपनी में नए अंशधारकों के आने या पुराने अंशधारकों के जाने से उसके व्यवसाय के अस्तित्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

  1. चालू व्यवसाय अवधारणा (Going Concern Concept):- इस अवधारणा की यह मान्यता है कि व्यावसायिक संस्था अनंत काल तक चलती रहेगी अथवा निकट भविष्य में उसका समापन नहीं होने जा रहा है। संस्था की वर्तमान संसाधनों का व्यवसाय के उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु उपयोग किया जाता है। वित्तीय विवरणों के संदर्भ में यह अवधारणा अति महत्वपूर्ण मानी जाती है। संस्था के अंतिम खाते तैयार करते समय स्थाई सम्पत्तियों को घटते हुए शेष पदृति (Diminishing Balance Method) यानी व्यवसाय की चालू स्थिति मूल्य (Going Concern Value) पर दिखाया जाता है। इन सम्पत्तियों को उनके बाजार मूल्य पर प्रदर्शित करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है क्योंकि इन सम्पत्तियों को भविष्य में प्रयोग एवं आय अर्जन हेतु क्रय किया जाता है; न कि विक्रय हेतु इन्हें खरीदा जाता है। यदि व्यवसाय को आगे चालू नहीं रखना है या उसका समापन किया जाना है तब स्थायी सम्पत्तियों का बाजार मूल्य महत्वपूर्ण होता है। चूँकि व्यवसाय को आगे चालू रखना है, अतएव स्थायी सम्पत्तियों को उनकी लागतों में से हॉर्स घटाकर बची राशि के आधार पर दर्शाते हैं। व्यवसाय के चालू स्थिति की अवधारणा का यह भी आशय होता है कि विद्यमान दायित्वों का उनकेपरिपक्व (Maturities) होने पर भुगतान कर दिया जाएगा। साधारण कार्य – काल में किए गए क्रय तथा विक्रय को उसी वर्ष पूर्णतः अपलिखित कर देते हैं। केवल बिना बिके हुए माल (स्कंध) को अगले वर्ष ले जाते हैं इसी प्रकार उन सभी सम्पत्तियों को जिनका आय अर्जित करने हेतु अनेक वर्षों तक प्रयोग किया जाता है, अगले वर्ष ले जाते हैं। ऐसी सम्पत्तियों को उनके अनुमानित जीवन कल में वर्ष – प्रतिवर्ष अपलिखित करते हैं। ऐसा करना तभी संभव हो पाता है जबकि व्यवसाय को चालू स्थिति में बना रहना माना जाता है।

एक संस्था को विज्ञापन आदि पर भारी व्यय उठाना पड़ सकता है। ऐसे व्यय का एक से अधिक वर्षों, माना 5 वर्ष, तक लाभ उठाया जा सकता है। अतः इसे पाँच वर्षों में अपलिखित किया जाता है और पूर्ण रूप से अपलिखित न होने की स्थिति में प्रत्येक वर्ष के शेष को आर्थिक चिट्ठा में सम्पत्ति की तरह दिखाते हैं। लेखापालक ऐसे व्यय जिनका लाभ अल्प – काल (एक वर्ष) में ही मिलना है तथा व्यय जिनका दीर्ध – काल (अनेक वर्षों) तक लाभ मिलता रहेगा, में विभेद करके उनका अलग – अलग व्यवहार करता है। दूसरे वर्ग के व्ययों को सम्पत्ति की तरह दिखाया जाता है क्योंकि ये स्वामी के लिए एक से अधिक वर्षों तक उपयोगी होंगे, जबकि प्रथम वर्ग के अल्प – कालीन व्ययों को उसी वर्ष अपलिखित कर दिया जाता है जिस वर्ष में व्यय किए गए हैं। आयगत और पूँजीगत व्ययों में भेद करना ‘चालू व्यवसाय की अवधारणा’ के कारण संभव हो पता है। व्ययों के अग्रिम भुगतान का उसी वर्ष के लाभ – हानि खाते में लेखा नहीं किया जाता है, वरन इसे अगले वर्ष ले जाते हैं। इस तरह अग्रिम आय की प्राप्ति को भी उसके प्राप्ति वाले वर्ष में आय नहीं मानते हैं और इसे आगामी वर्ष ले जाया जाता है। ऐसा करना तभी संभव हो पाता है जब कि व्यवसाय को चालू स्थिति में बना रहना माना व्यय तथा आने वाले वर्षों में भी इसे चलते रहने की कल्पना की जाए। एक व्यक्ति किसी संस्था में अपने धन का निवेश तभी करना चाहेगा जबकि उसे यह मालूम हो कि व्यवसाय आगे भी चलता रहेगा।

कुछ दशाओं में संस्था का जीवन काल ज्ञात होता है। निर्माण कार्य हेतु लिए गए ठेके की अवधि सीमित होती है, इसलिए उसके लेखे भी केवल एक नियत अवधि के लिए तैयार किये जाते हैं। ठेका पर प्रयोग हेतु कार्य किये गए उपकरणों की पूरी राशि को खातों में डेबिट कर दिया जाता है जबकि इन उपकरणों का जीवन काल लम्बा हो सकता है। इसी प्रकार सयुंक्त उपक्रम (Joint Venture) और सीमित अवधि वाली सांझेदारी की स्थितियों में संस्था के जीवनविस्तार (life Span) को भी खाते तैयार करते समय ध्यान में रखा जाता है। संस्था के वित्तीय खाते प्रत्येक वर्ष तैयार किये जाते हैं, यद्यपि संस्था एक लम्बी अवधि तक चलती रहेगी। संस्था का नियमित अंतरालों पर परिचालनों की कार्य कुशलता की जानकारी करने के लिए ऐसा किया जाता है।

  1. लागत अवधारणा (The Cost Concept):- व्यवसाय में वस्तुओं और सेवाओं का विनिमय किया जाता है। ये विनिमय मुद्रा के माध्यम से सम्पन्न किए जाते हैं। किसी विनिमय के लिए दी गई मुद्रा या धन वस्तु की लागत बन जाती है। इस प्रकार व्यवसाय के लिए किसी भी मद को प्राप्त करने के लिए भुगतान किया गया धन उसकी लागत होती है। उसके लिए किए गए भुगतान के वास्तविक मूल्य को लेखा – पुस्तकों में लिपि – बद्ध करते हैं। जैसे, भूमि के किसी टुकड़े के क्रय के लिए भुगतान किए गए 50, 000 रूपये का उस भूमि के लागत के रूप में लेखा किया जाएगा, जबकि यह हो सकता है कि भूमि के उसी टुकड़े के लिए अन्य व्यक्ति 75, 000 रूपये देने के लिए तैयार हो सकता है।

इस अवधारणा के अंतर्गत लेखांकन अभिलेख ‘लागत अवधारणा’ पर आधारित होते हैं। इस अवधारणा का ‘चालू व्यवसाय अवधारणा’ से निकटता से सम्बन्ध होता है। इस व्यवसाय की सम्पत्तियों और दायित्वों का उस लागत पर दिखाया जाता है जिसका वास्तव में भुगतान किया गया है या जिसकी अदायगी के लिए सम्बंधित पक्षों के मध्य सहमति हुई हो। आंकड़ों को वस्तुनिष्ठता आधार (ovjectivity basic) पर लेखाबद्ध किया जाता है। इन आंकड़ों के सम्बन्ध में व्यक्तिगत पूर्वाग्रह या व्यक्तिगत आंकलन की कोई गुंजायश नहीं होती है। यदि लेखाबद्ध करने के लिएसापेक्षता आधार (subjectivity basic) का अनुसरण किया जाता है तो एक ही प्रकार की सम्पत्तियों का विभिन्न व्यक्तियों द्धारा भिन्न – भिन्न अंको पर मूल्यांकन किया जा सकता है। प्रत्येक व्यक्ति के विभिन्न सम्पत्तियों के बारे में अपने अलग विचार या धारणा होती है। अतः सच्चे ढंग से अभिलेखन हेतु लागत अवधारणा सहायक होती है। इस अवधारणा का अनुपालन करने से अभिलेख अधिक विश्वसनीय और तुलनीय बन जाते हैं।

यद्यपि सम्पत्तियों का लागत आधार पर मूल्य लगाया जाता है, परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि ये सदैव उसी अंक पर दर्शाये जांए। टूट – फूट (Wear and Tear) के कारण प्रत्येक वर्ष इन सम्पत्तियों के मूल्य घटते हैं, इसलिए इन्हें उनकी लागत में से हार्स घटाकर दिखाया जाता है। सम्पत्तियों का अनुमानित जीवन – काल ज्ञात किया जाता है और इस आधार पर हॉर्स लगाया जाता है।

  1. द्धि – पक्षीय अवधारणा (Dual Aspect Concept) :- यह अवधारणा सम्पूर्ण लेखांकन पदृति के हृदय में निवास करती है। आधुनिक लेखांकन पदृति द्धि – पक्षीय अवधारणा पर आधारित है। इस अवधारणा का सिद्धांत यह है कि प्रत्येक लेन – देन के दो पहलू होते हैं अर्थात प्रत्येक डेबिट पक्ष का सम्बंधित क्रेडिट पक्ष भी होता है। यदि लाभ का कोई दाता (giver) है तो अवश्य ही कोई दूसरा उसका प्राप्तकर्ता (taker) भी होगा। मान लीजिए, अ 20 ,000 रूपये में भवन खरीदता है तो उसे एक अऊर भवन मिलेगा और दूसरी ओर उतनी ही राशि के बराबर रोकड़ का त्याग करना पड़ेगा। इस प्रकार एक पक्ष डेबिट तथा दूसरी पक्ष क्रेडिट किया जाएगा और ये डेबिट बराबर होने चाहिए। इसी द्धि – पक्षीय अवधारणा ने दोहरा लेखा पुस्त – पालन प्रणाली (Double Entry book – keeping) को जन्म दिया है।

इसी अवधारणा के कारण ही बहिया पक्षों और स्वामियों का  कुल दावा सदैव संस्था की कुल सम्पत्तियों के बराबर अवश्य होना चाहिए।

लेखांकन या आर्थिक चिट्ठा के रूप में बाहिया दायित्व + पूँजी = कुल सम्पत्तियाँ, अथवा कुल दायित्व = कुलसम्पत्तियाँ या सम्पत्तियाँ – दायित्व = पूँजी होता है।

  1. मुद्रा मापन अवधारणा (Money Measurement Concept) :- इस अवधारणा के अनुसार लेखा – पुस्तकों में केवल उन्हीं लेन – देनो या व्यवहारों को लेखा – बद्ध किया जाता है जिन्हें मौद्रिक मूल्यों में अभिव्यक्त किया जा सके। मुद्रा एक ऐसी यांत्रिक प्रणाली (Mechanism) प्रस्तुत करती है जिसके माध्यम से वास्तविक संसाधनों को विभिन्न व्यक्तियों के बीच हस्तांतरित किया जा सकता है। लोग मुद्रा को वस्तुओं और सेवाओं के विनिमय के माध्यम के रूप में स्वीकार करते हैं। कोई भी अपनी सम्पदाओं को मुद्रा के बदले में बेचने के लिए तैयार हो सकता है। मुद्रा के इसी गुण के कारण देनदार तथा लेनदार निकट भविष्य में मुद्रा देने या लेने के लिए इच्छुक होते हैं। इस प्रकार, वस्तुओं और सेवाओं तुरंत विनिमय के माध्यम के रूप में मुद्रा की भूमिका होती है तथा यह विलम्बित भुगतानों (Deferred Payments) का भी आधार होती है। मुद्रा मापन अवधारणा से एक ऐसा मापदंड (Yardstick) उपलब्ध होता है जिससे धन के विभिन्न रूपों का मापन किया जा सकता है। विजातीय तथ्यों (Heterogeneous Factor) को आसानी से मौद्रिक मूल्यों में व्यक्त किया जा सकता है।

मुद्रा मापन अवधारणा की दो सीमाएँ हैं। प्रथम, इस अवधारणा में बहुत – सी बातों के गुणात्मक पक्ष पर ध्यान नहीं दिया जाता है। एक विपणन प्रबंधक के अच्छे स्वभाव और उत्पादन प्रबंधक के उग्र या संयमहीन स्वभाव का कहीं भी लेखा नहीं किया जाता है जबकि ये बातें संस्था के कार्य – प्रणाली पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती हैं। द्धितीय, मुद्रा प्रसार के कारण होने वाले परिवर्तनों का भी इस अवधारणा में किसी प्रकार का समायोजन नहीं होती है। इसमें भी ऐतिहासिक लागत के आधार पर लेखे किए जाते हैं।

  1. लेखाविधि अवधारणा (Accounting Period Concept) :- व्यवहारिक प्रयोजनों के लिए संस्था की वित्तीय स्थिति तथा लाभदायकता का एक नियमित अंतराल जिसे लेखांकन अवधि कहते हैं, के उपरांत मूल्यांकन किया जाता है। व्यवसाय के स्वामी, लेनदार, विनियोजक, सरकारी विभाग एक निदृष्ठ वित्तीय अवधि, यानी छः मास या एक वर्ष के अंत में उसकी लाभदायकता जानने के लिए उत्सुक रहते हैं। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु एक लेखापालक उक्त निदृष्ठ अवधि के लिए आगम खाता (Revenue Account) तैयार करता है। आगम खाता या लाभ – हानि खाता के डेबिट पक्ष में सभी व्ययों की मदों तथा क्रेडिट पक्ष में आय की सभी मदों को लिखा जाता है। निदृष्ठ अवधि से सम्बंधित सभी आयगत मदों को इस तथ्य को ध्यान में रखे बिना कि उनका भुगतान कर दिया गया है या वे देय हैं, लाभ – हानि खाता में ले जाते हैं। यह खाता उक्त अवधि के लिए लाभ या हानि प्रकट करता है। अवधि में हुए लाभ का अंशधारकों को लाभांश भुगतान करने और सरकार को करों का भुगतान करने के लिए उपयोग किया जाता है। इसी प्रकार निश्चित तिथि पर आर्थिक चिट्टा तैयार किया जाता है जो उकत तिथि को सम्पत्तियों और दायित्वों के आँकड़ों प्रदान करता है तथा संस्था की वित्तीय शक्ति का निर्धारण करने में सहायता पहुँचाता है।
  2. वसूली अवधारणा (Realisation Concept):- यह अवधारणा आगम (Revenue) की वसूली से सम्बंधित है। उत्पादों की बिक्री या सेवाएं अर्पित करके आगम की वसूली की जाती है। उत्पादों की बिक्री या सेवाएं अर्पित करके आगम की वसूली की जाती है। उत्पादों की बिक्री में कई सोपान (Stages) निहित होते हैं; यथा (i) आदेश की प्राप्ति, (ii) माल का उत्पादन, (iii) माल का प्रेषण, (iv) मुद्रा की प्राप्ति।

अब प्रश्न यह उठता है कि आगम कब हुआ माना जाए। सामान्य सिद्धांत यह है कि आगम तभी वसूल हुआ मन जाए जब माल की बिक्री संपन्न हो जाए अथवा सेवा ठेकों की स्थिति में सेवा का निष्पादन पूरा हो जाए। जब माल की सुपुर्दगी कर दी जाती है या माल का स्वत्व (Title) हस्तांतरित हो जाता है तब बिक्री हुई मानते हैं। कुछ लोगों की आगम की वसूली के सम्बन्ध में एक भिन्न धारणा होती है। एक विचारधारा यह है कि रोकड़ या रोकड़ के सन्निकट सम्पत्तियों को लिया जाए, जबकि दूसरे लोग इस विचारधारा के होते हैं कि बदले में किसी भी संपत्ति की प्राप्ति वसूली होती है। अधिकांश लोगों का विचार है कि वसूली का आशय रोकड़ या रोकड़ के सन्निकट सम्पत्तियों के लिए वस्तुओं का विनिमय (माल की वास्तविक सुपुर्दगी के साथ) से है जिसका उद्देश्य विक्रय की निष्पत्ति करना हो। यह एक सामान्य सिद्धांत है, न कि सार्वभौमिक (Universal) सिद्धांत

  1. लागत आगम की अनुरूपता अवधारणा (Matching of Costs and Revenues Concepts):- प्रत्येक व्यवसाय का उद्देश्य लाभ अर्जित करना होता है। लागतों को आगम के अनुरूप रखा जाता है। बिक्री से आय तथा माल के उत्पादन की लागत का अंतर लाभ होता है। व्ययों को आय के अनुरूप रखने की प्रक्रिया द्धारा लाभ की माप की जाती है। जब व्यवसाय को चालू स्थिति में बना रहना मान लिया जाता है तब इसके आवधिक निष्पादन का मूल्यांकन करना आवश्यक हो जाता है।

आय के सही विवरण के लिए वर्तमान, विगत तथा भावी व्ययों में भेद काना आवश्यक होता है। पूँजीगत तथा आयगत व्ययों में भेद करना आवश्यक होता है। उसी एक ही अवधि की आगमों तथा लागतों की अनुरूपता पर विचार करते हैं। जब किसी एक विशेष लेखांकन अवधि के आगमों को लाभ – हानि खाता में ले जाते हैं जब उस अवधि के सभी व्ययों चाहे उनका भुगतान किया जा चुका हो या नहीं, उसी लाभ – हानि खाते के डेबिट में दिखाते हैं। इसी प्रकार, यदि भावी अवधि के लिए व्यय का भुगतान किया गया है तो उस वर्ष के लाभ – हानि खाते में ले जाना चाहिए जिस वर्ष से वह सम्बंधित हो, न कि भुगतान किए जाने वाले वर्ष के लाभ – हानि खाता में इसे दिखाना चाहिए। ऐसे व्ययों को जिनकी उपयोगिता या सेवा कई वर्षों तक प्राप्त होनी है, आर्थिक चिट्ठा में विलम्बित व्यय (Deferred Expenditure) के रूप में दर्शाते हैं। पूँजीगत व्यय कई वर्षों के लागत का हिस्सा बन जाता है, जैसे हॉर्स लगाना।



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