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क्या आप भारत विभाजन का असली इतिहास जानना चाहेंगे आइए एक नजर डालें।

विभाजन की विभीषिका की चर्चा करने पर अक्सर कहा जाता है की 70 वर्ष पुरानी घटनाओं की चर्चा करने की आवश्यकता क्या है। अब इन गड़े मुर्दे को उखाड़ने का क्या औचित्य है। इससे तो भूतजीवी बनने की प्रवृत्ति समाज में पनपेगी। परंतु देश व समाज हित की कसौटी पर कसकर हम निष्कर्ष निकालेंगे तो यही उत्तर मिलेगा कि 70 साल बाद भी इस इतिहास को प्रकाश में लाना हर दृष्टि से उपयोगी है वांछनीय है। यह कोई सामान्य इतिहास नहीं है चिरप्रेरणा देने वाला इतिहास है। इसे वीर देशभक्त स्वयंसेवकों ने माता बहनों ने व हमारे सैनिकों ने अपने खून से लिखा है। इतिहास में हम आज तक पद्धिनि के जौहर को ही प्रेरणा के लिए वितरित करते आए हैं परंतु यह इतिहास तो असंख्या पद्विनियो की जौहर ज्वालाओं से आलोकित है। इस इतिहास में से एक दो नहीं असंख्य वीर हकीकत व अभिमन्यु झाँकते नजर आते हैं। अनेक बाजीप्रभु देशपांडे अवतरित हुए थे। विश्व में जो कभी भी और कहीं भी उदात्ततम और प्रेरणादाई होता है, उन सबके नमूने एक साथ देश-विभाजन के समय जीवित हो उठे थे। उसके विस्मरण से अपने अतिनिकट भूत में ही उपस्थित किए गए तेजस्वी उदाहरणों से प्रेरणा पाने से समाज वंचित रह जाता है और अपनी भूख मिटाने हेतु दूर के भूतकाल को टटोलता रह जाता है।

बड़े ही छलपूर्वक घोषणा की जाती है कि “दे दी हमें आजादी बिना खडक बिना ढाल” पर वास्तविकता अलग ही रही है। जहां एक ओर संपूर्णदेश में स्वतंत्रता का स्वागत हर्षोउल्लास के साथ किया जा रहा था वहीं दूसरी ओर पाकिस्तानी कब्जे वाले पंजाब, सिंध को बंगाल के हर शहर, हर गांव में मोहल्ले के मोहल्ले धू-धू कर जल रहे थे। हिंदुओं के मकान दुकानों को खुलेआम लूटा जा रहा था। मां बहनों पर जो गुजरी थी वह तो कल्पना से परे ही है। हर ओर लाशों के ढेर लगे थे परिणामस्वरूप अपनी जमीन जायदाद की ही नहीं बल्कि परिवार के सदस्यों को खोकर शरणार्थियों के काफिले आजाद भारत की ओर रोते-बिलखते हुए आए थे। उनके कष्टों का पारावार नहीं था। उसको आज भी कैसे भुला जा सकता है और क्यों कर भुलाना चाहिए?

“ भारत के विभाजन के बाद पैदा हुई परिस्थितियों में जिस प्रकार संघ ने समाजहित में आगे रहकर काम किया वह आसाधारण था। युद्धकाल में हो या प्राकृतिक आपदा में हो, स्वयंसेवक स्वत: स्फूर्त प्रेरणा से राष्ट्रकार्य में सबसे आगे रहे हैं। यही कारण है कि देश ही नहीं विश्वभर में आज संघ के प्रति श्रद्धा है। “

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक देश पर आए प्रत्येक संकट के समय कसौटी पर खरे उतरे। फिर चाहे वह संकट प्राकृतिक हो, दैवीय अथवा मानवीकृत।   ऐसा ही संकट देश पर उस समय आया था। जब स्वतंत्रता प्राप्ति को आतुर हमारे देश के तत्कालीन नेताओं ने देश का विभाजन स्वीकार कर लिया जबकि वह देशवासियों को आश्वासन देते रहे कि लोग निश्चिंत रहे किसी भी हालत में देश का विभाजन स्वीकार नहीं किया जाएगा। उनके वचनों पर विश्वास कर जनता आश्ववस्त थी। उसका पूर्व का अनुभव भी था कि राज्य बदलते हैं, राजा बदलते हैं पर प्रजा वही रहती है और वही रहती है। इसी कारण लोगों ने विभाजन से उत्पन्न होने वाली स्थिति की कोई तैयारी भी नहीं की थी। लेकिन अपने वचन से मुकर कर नेताओं ने देशवासियों को भीषण संकट में डाल दिया था।

स्वतंत्रता समर के बाद नागरिकों की रक्षार्थ आगे आए स्वयंसेवकों की अमिट गाथा।

देश का विभाजन स्वीकृत हुआ और नए बने पाकिस्तान में हिंदुओं के मकान, दुकान, व्यवसाय, खेतीवाडी ही नहीं प्राण तक संकट में पड़ गए। उनकी सहायता करना तो दूर, पुकार तक सुनने वाला कोई नहीं था। ऐसे समय देश समाज धर्म को समर्पित संघ के स्वयंसेवक उनकी सहायता के लिए आगे आए और जैसी, जितनी संभव थी, सहायता की। पहली आवश्यकता हिंदुओं को वहां से सुरक्षित निकालने की थी। दूसरी उनके लिए जिवनावश्यक वस्तुओं की आपूर्ति की थी और तीसरी, भारत पहुंचने पर उनको बसाने की थी। यह तीनों की काम स्वयंसेवकों ने बड़े साहस, बहादुरी व सूझबूझ से किये। अपनी स्वयं की, अपने परिवार की चिंता किए बिना ही प्राणपण से मोर्चे पर डटे रहे। हिंदुओं की रक्षा के लिए उन्हें दूर करना पड़ा, वह उन्होंने किया। एक आलेख में सबका वर्णन करना तो संभव नहीं है। पर बानगी के तौर पर कुछ उधारण प्रस्तुत है।

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पंजाब पश्चिमोत्तर प्रांत से लूट पीटकर लाहौर की ओर आ रहे शरणार्थियों की सहायता के लिए सहायता समिति का गठन किया गया था। इस सहायता समिति में कांग्रेस के लोग भी थे और स्वयंसेवक भी। लेकिन पहले ही दिन से दिक्कतें आने लगी कांग्रेस के नेता केवल बयानबाजी करते पीड़ितों की सहायता के लिए प्राप्त सामग्री व वाहनों का निसंकोच प्रयोग करते। स्वयंसेवक तो अपना काम प्रमाणिकता से कर रहे थे इस पर भी उनके काम में रोड़े अटकाये जाने लगे। तब स्वयंसेवकों ने पंजाब रिलीफ कमेटी का गठन कर अलग से काम प्रारंभ किया। स्वयंसेवकों के अलग होते ही कॉंग्रेसियो की सहायता समिति निष्प्राण हो गई। उनकी निस्वार्थ भाव से कार्य करने वाले कार्यकर्ता उनके पास कम ही थे। जम्मू कश्मीर सहायता समिति द्वारा 15 मार्च 1947 से 10 अक्टूबर 1947 तक 3, 00, 000 लाख लोगों को किसी ना किसी प्रकार की सहायता उपलब्ध कराई गई।

निराधार निराश्रित पीड़ितों को सब प्रकार की सहायता की आवश्यकता थी, क्योंकि अपने घरों से बिना कुछ सामान वह धन लिए उन्हें भागना पड़ा था। अधिकांश तो बस तीन वस्तुओं में ही भागने को मजबूर हुए थे। संघ की अपील पर केसधारी व सहजधारी दोनों ने सहयोग के दरवाजे मुक्त रूप से खोल दिए थे। स्वयंसेवक जहां भी जाते अपेक्षा से अधिक सहयोग मिलता यहां तक कोई फटे पुराने कपड़े सहायता में नहीं देता था लोग नए कपड़े ही देते थे। संघ द्वारा संचालित सहायता शिविर में नए कपड़ों, औषधियों की कभी कमी नहीं रही। स्वयंसेवक सहायता मांगने चादर लेकर निकलते और कुछ ही समय में वह रुपयों से भर जाती थी। इसमें संघ के प्रति लोगों का विश्वास ही कारणीभूत था कि उनके द्वारा दिए जा रहे सहयोग का दुरुप्रयोग नहीं होगा और स्वयंसेवक के हाथ में दिया जा रहा धन सही जगह पहुंचेगा।

प्रारंभ में समिति का कार्यालय लाहौर के रतन बाग में दीवान कृष्णकिशोर की कोठी में खोला गया। कमेटी द्वारा दो शिविर लगाए गए एक स्टेशन के सामने और दूसरा अरोड़ा वंश हॉल में जब काम बड़ा तो मोंटगोमरी रोड पर डॉक्टर गोकुलचंद नारंग की कोठी में कार्यालय ले जाया गया। उनकी कोठी में एक विशाल तहखाना था वह भी छत तक सहायता सामग्री से हट जाता। धीरे-धीरे आवश्यकता के अनुसार समिति का कार्यक्षेत्र बढ़ता गया निर्वासितों की सेवा के अलावा समिति को कई अन्य दायित्व निभाने पढ़ रहे थे तथा दंगों के दौरान संकटग्रस्त क्षेत्रों में फंसी महिलाओं बच्चों बूढ़ों को निकालकर शिविरों या सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया। दंगा ग्रस्त मोहल्लों में जाकर हिंदुओं को संरक्षण देना तथा हमलावरों को सबक सिखाना घायलों को अस्पताल ले जाकर उनके उपचार की व्यवस्था करना, मृतकों के सीमित सबो का अंतिम संस्कार करना, आग बुझाने का साधन उपलब्ध कराना सेना की सहायता से अपहत महिलाओं को अपहर्ताओं के कब्जे से छुड़ाकर लाना इत्यादि। दिनोंदिन विस्थापित संख्या बढ़ती जा रही थी। सब ओर से लोग आने लगे थे तब रिलीफ कमेटी की शाखाएं प्रांत के कस्बों व नगरों में भी खोली गई सभी स्थानों पर जनता का सहयोग लाहौर की भान्ति ही मिला। हालांकि यहां के लोगों को भी यह पता था कि शीघ्र ही उन्हें भी विस्थापित होना है।

लेखक श्रीधर पराडकर

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