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आयुर्वेदिक घरेलू इलाज

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(Ayurvedic Home Treatment) “जीवन बहुत अनमोल है” (All Over India Health Platform)

पढ़ो और करने का होंसला भी रखो और जिंदगी को बेहतर बनाओ।

“जीवन बहुत अनमोल है।” Life is too precious. (Health Tips)

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इसकी रक्षा का कार्य जो लोग नहीं करते वे स्वयं अपनी मृत्यु को निकट बुलाने का कार्य करते हैं। ऐसे लोग शायद जान बूझ कर यह काम नहीं करते। परन्तु उन्हें  दोषी कहना इसलिए सही है कि वे अपने स्वास्थ्य की रक्षा नहीं करते, जबकि खाने पीने के बारे में ऐसे लोग स्वदिष्ट से स्वदिष्ट भोजन खाना पसंद करते हैं, पहनने के लिए अच्छे से अच्छे कपडे उनको चाहिए, रहने के लिए बढ़िया मकान, जिसकी सजावट पर हर वर्ष वे लाखों हजारों रुपए खर्च कर लेते हैं।

अपने स्वास्थ्य की रक्षा के बारे में उन्होंने कभी नहीं सोचा। शायद उन्हें अभी तक किसी ने यह नहीं बताया कि स्वास्थ्य बिगड़ गया। तो फिर यह लाखों करोड़ो खर्च करने पर भी वापस नहीं मिलेगा। इसलिए आपको यह सोचना है कि आपको जीवन भर डॉक्टर की आवश्य्कता ही न पड़े।

आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति आपको क्या पूरी मानव जाति को यही सिखाती है, इस इलाज से आप सदा स्वस्थ रह सकते है, और आपकी आयु भी लम्बी होगी।

बस इस लेख को लिखने का एक मात्र मकसद यही है कि आप कभी बीमार न हो, हमने फलों, सब्जियों द्धारा निरोग और स्वस्थ रहने का मार्ग आपको दिखाया है। आप चाहें तो अपने डॉक्टर आप बन सकते हो, अपने डॉक्टर बनने के साथ – साथ दूसरे लोगों का भी ध्यान रखना आपका कर्तव्य है।

मानवता की सेवा ही अपना धर्म समझें यही हमारा आपका कर्म है।

जे एस ग्रुप ऑफ़ कॉन्सेप्ट्स

यही एक प्रश्न हर उस इन्सान के सामने मुँह फाड़े खड़ा है जो अंदर से रोगी है और ऊपर से हँसता खेलता नज़र आता है, सबसे पहले हमें देखना यह है कि रोग क्या है, और फिर उसका उपचार।

अब यह सोचने की बात है कि क्या हम रोग को पैदा होने से पहले रोक सकते हैं? मैं समझता हूँ कि जिस रोग को हम दवाओं से रोकने का, प्रयास करते हैं, यदि हम चाहें तो उसे होने से पहले ही रोका जा सकता है। भारतीय जड़ी बूटियों में इतनी शक्ति है कि वे रोगों की जड़ को काट सकती है।

सबसे पहले मैं आपको गुणकारी हरड़ के बारे में बताता हू। इसके संस्कृत नाम हैं- हरीतकी, अम्या, अमृता, हेमवती, चेतसीक, विजया, जीवंती और रोहिणी अब इसके भेद जानने का प्रयास करें। विजया, रोहिणी, पूतना, अमृता, अम्या, जीवंती, चेतसीक, सात प्रकार की होती हैं.

कहाँ पर होती है इन की पैदाइश। Where is The Creation of These.

विजया विन्ध्याचल पर्वत पर, चेतकी हिमालय पर्वत पर, पूतना सिन्धु नदी के किनारे, रोहिणी प्रतिस्थान में, अभया तथा अमृता पांच रेखायुक्त चम्पार में, जीवन्ती सौराष्ट्र में पैदा होती है।

कैसे पहचान करेंगे? How will Recognize?

तिमी के सदृश्य गोल हरड़ विजया साधारण, गोल, रोहिणी, बड़ी गुठली वाली छोटी हरड़, पूतना अधिक गुदे वाली, अमृता पांच रेखा युकत सुवर्ण के समान चमकीली, जीवन्ती तथा तीन रेखा वाली चेतकी हरड़ कहलाती है।

गुण क्या है? What Is Qualities? Ayurvedic Home Treatment.

विजय हरड़, सब रोगों के लिए उतम है, रोहिणी जख्मों को ठीक करने के लिए। अमृता जुबान रेचन में, अभया, नेत्ररोगों के लिए लाभदायक है। जीवन्ती! सारे रोगों के लिए शुभ है। चेतकी! चूर्ण के काम आने वाली है।

लवण! खारी रस के अतिरिक्त्त सारे रस है, विशेषकर कषैली है रूखी गरम आग दीपन करने वाली, बुद्धि के हितकारी, मधुर पाकवाली रासायन नेत्रों के लिए उतम, लम्बी आयु के लिए लाभकारी तथा वायु का उनूलन करने वाली है, श्वास खांसी, प्रमेह-कुष्ठ, शोथ, उदरकृमि, ग्रहणी, विषम जवर, ग्लम, बदहजमी, प्यास, वमन, हिचकी, खुजली, हृदयरोग, शूल, प्लीहा, यकृत, पत्थर और मूत्र घात को हरण करती है।

नवीन तथा भारी, पानी में डालने से डूबने वाली हरड उतम होती है। नमक के साथ खाने से खांसी कफ दूर हो जाती है। चीनी के साथ खाने से पित ठीक हो जाता है। घी के साथ खाने से सम्पूर्ण दोषो का दमन करती है। वर्षा के दिनों में सेंधा नमक के साथ, शरद ऋतु में चीनी के साथ, हेमन्त ऋतु में सोंठ के साथ, शिशिर ऋतु में पीपल के साथ, बसंत ऋतु में मधु के साथ, ग्रीष्म ऋतु में गुड़ के साथ हरड़ का प्रयोग करने वाले सब बीमारियों से बच जाते हैं। कमज़ोर शिथिल, रक्तहीन, गर्भवती तथा अधिक पित वाले लोगों को हरड़ का सेवन नहीं करना चाहिए।

बहेड़ा (Baheda)

बहेड़े के कई नाम हैं जिन में प्रसिद्ध, बहेड़ा, बेहरी, कल्पवृक्ष भूतवास,  तेलेफल का साधरण इत्यादि हैं।

आमला (Amla)

इनके अन्य नाम हैं अमृता छात्रीफल, आमलारी पंचरसा शिव। अमरा बहुफली, शांता, अमृतफल, रीचनी  तिष्या, श्रीफल यह सब के सब आमले के ही नाम हैं। लाभ: आमला रक्त पित्त, प्रमेह को नष्ट करता है तथा वीर्य को बढ़ाने वाला तथा रासायन है।

आमले के गुण (Properties of Amla)

आमले हृदय को शक्ति देने वाला, बलगम नाशक, खून बनाने, शरीर की ग़र्मी को दूर करके नया खून पैदा करता है, शारीरिक कमजोरी को दूर करने वाले आमले का जबाब नहीं। 

त्रिफला (Triphala)

हरड़, बहेड़ा और आमले को इकट्ठा करके उसी तरह बारीक पीस कर कपडे से छान कर रखें यदि चाहे तो इसमें काला नमक पीस कर मिला सकते हैं इससे इसका कड़वाहनपन  दूर हो जाता है, जो  लोग सुबह उठकर एक बड़ा चम्मच त्रिफला पानी के साथ सेवन करते है, उनके शरीर से सब से पहले कब्ज़ का अंत होता है। पेट के सारे  हो जाते है।   

रोग क्या है? (What is Disease?)

यह हमारा दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है कि हम अंपने शरीर को उस समय ही रोगी मानते हैं जब हम बिस्तेर पर गिर कर खटिया पकड़ लेते हैं।  हमारे देश की अधितकर आबादी बीमारी को उस समय तस्क बीमारी मानने के लिए तैयार ही नहीं जब तक बीमारी भयंकर रूप धारण करके उन्हें खोखला न कर दे।  

रोग को पहले से ही समाप्त करो (Firstly Finished the Diseases)

यदि आप रोगों से बचना चाहते हैं और आपकी हार्दिक इच्छा यही है कि आप की आयु लम्बी हो और शरीर स्वस्थ रहे तो इसके किये आप को कभी भी पूर्ण स्वस्थ नहीं मानना चाहिए। आप भले ही अपने को रोगी न समझें, परन्तु यह सब मत भूलें कि रोग न तो ख़रीदा जाता है न बुलाया जाता है, बहुत से रोगों को तो हम स्वयं  बुलाने का कारण बनते हैं, क्योंकि हम अपने स्वास्थ्य के बारे में नहीं सोचते। हमें पहनने के लिए अच्छे से अच्छे कपड़े चाहिए। खाने के लिए स्वादिष्ट भोजन चाहिए। रहने के लिए सुन्दर और सजा हुआ माकन चाहिए।  मेरे कहने का तातपर्य यह है कि हमें जीवन में पुरे सुख एशो, आराम तो चाहिए लकिन यह कोई भी सोचने का प्रयास नहीं करता कि – हमारा स्वास्थ्य भी अच्छा होना चाहिए। किसी ने ठीक कहा है –

जान है तो जहान है (If Life then has everything)

वास्तव में यह कथन गलत नहीं इसको अपने एक बार समझ लिया तो आपका स्वास्थ्य सदा ठीक रहेगा। इसे ठीक रखने के लिए, आपने जो उपाय करने हैं, उनमे सबसे पहले तो आपको अपना पेट साफ रखने का है यदि आपका पेट ठीक है तो आपको खाना खूब हज़म होगा, भूख लगेगी, नया खून बनेगा। पेट रोगों और पेट को सदा ठीक रखने में सबका योगदान त्रिफल का ही रहा है, और भविष्य में भी रहेगा। मैं समझता हूं  त्रिफला आप के स्वास्थ्य का सबसे बड़ा साथी है जो प्राणी इसका प्रयोग छोटी आयु से आरंभ कर देते हैं वे  हर प्रकार के रोगों से बचे रहते हैं।

काली मिर्च (Black Pepper)

कृष्णा मिर्च, कंकील, कटुम्, गोल मिर्च इसके नाम हैं, परन्तु इसका सबसे अधिक लोकप्रिय और प्रचलित नाम काली मिर्च ही है, यह खाने में तो मिर्च जैसी ही कड़वी होती है परन्तु स्वास्थ्य के लिए अति गुणकारी है, शरीर के अन्दर की बाई बाड़ी को समाप्त करके शरीर में चुस्ती लाती है। 

सोंठ (Dry Ginger)

गुणकारी सोंठ देखने में बहुत साधरण और  सफेद रंग की होती है।  इसे शुष्ठी शमनकर महुलकर, कटुभद्र भी के नाम हैं। इसके निरंतर पप्रयोग से वादी ( वात ) तथा मॉल के बन्धन को तोड़ती है।  वीर्य वर्धक गर्म, स्वर को साफ करने वाली, खांसी की शत्रु यहाँ सूंठ सूखे हुए अदरक को दूध में  पका कर तैयार की जाती है, इसके और अदरक के गुणों में भी विशेष अंतर नहीं होता क्यूंकि यह दोनों एक दूसरे  के पूरक कहे जाते हैं। 

अदरक (Ginger)

गुणों का खज़ाना है यहाँ अदरक, खांसी आने पर यदि शहद में मिलाकर इसे खाया जाये तो पुरानी से पुरानी खांसी भी कुछ दिनों में दूर हो जाएगी साथ ही कब्ज़ भी दूर हो जाएगी, भोज़न से पहले नमक के साथ अदरक  खाना बहुत गुणकारी और  स्वस्थ्य रक्षक मन जाता है। 

जीवन की रक्षा आपका धर्म है।  जीवन से बड़ा दंड और कोई नहीं हो सकता, हमारे देश में उपचार  ग्रंथो  को आर्युवेद के सांचे में ढाल कर हमने संसार को नव जीवन का जो सन्देश दिया था  उससे भारतीय पूरी तरह से लाभ नहीं उठा सके, इसका एक मात्र कारन यही था कि हमारे देश के लोग आर्यवेद उपचार को समझ नहीं सके।   ऐसा क्यों हुआ ? इस प्रशन का उत्तर तो स्वयं समय ही बटेगा।  मैं तो इस समय आपको केवल यही बताना चाहता हूँ कि आर्युवेद में जो गुण हैं, जीवन रक्षा और स्वस्थ्य रक्षा  हमने जो आर्युवेद से सीखा है वह क्या है ? इसको समझ जाते  आपका स्वस्थ्य कभी ख़राब नहीं होगा क्यूंकि यह सत्य तो वाही चीज़ें हैं  वही सब्ज़ियाँ  हैं, वही जड़ी बूटियां हैं  जिन्हे रात दिन आप देखते हैं, परन्तु उनके गुणों के वारे में नहीं जानते। 

इसलिए मैं आपको आर्युवेद के द्रिस्टीकोण से एक एक करके इन  सब चीज़ों के गुण बता रहा हूँ, जिन्हे जान कर आप प्रकृति के इन उपहारों का लाभ उठा सकेंगे, सर्वप्रथम एक छोटी सी वस्तु से अपना कार्य आरंभ  करते हैं, उसका नाम है, नींबू  जो देखने को जरा सी मगर गुणों में वह सबसे ऊँचा  हैं। 

नींबू (Lemon)

बहुत छोटी सी वस्तु जिनका रंग पीला आकार छोटा है तो क्या गुण तो बहुत बड़े – बड़े पाये जाते हैं।  नींबू का सबसे पहला काम यही है कि शरीर का विकार दूर करता है। 

शक्ति वर्धक (Enhancing)

उबले हुए एक गिलास पानी में नींबू निचोड़ कर निरंतर पिटे रहने से सारे शरीर में नई शक्ति की लहर दौड़ जाती है, नज़र भी तेज़ हो जाती है। मानसिक कमज़ोरी दूर जाती है। सिर दर्द दूर हो जाता है, अधिक काम करने से भी थकावट नहीं  आती। यदि चाहे तो शहद की चार बुँदे मिला लें। शकर और नमक का अधिक प्रयोग न करें।  

विटामिन सी का खज़ाना (Treasure of vitamin C)

कई प्रकार के रोगों से बचने के लिए, और शारीरिक शक्ति पाने के लिए नींबू का रस विटामिन सी का खज़ाना है, रक्त स्त्राव, दांतो के रोग पायरिया, काली खांसी, दमा आदि जैसे रोगों से बचने के लिए नींबू का बहुत बड़ा योगदान है। 

खून की कमी (Decrease of Blood)

जिन लोगों के शरीर में खून में कमी हो जाती है, शरीर दिन प्रतिदिन कमज़ोर होता जाता है , किसी काम को करने का मन नहीं करता, ऐसे लोगों को नींबू का रस और टमाटर का रस मिला कर देने से कमज़ोरी दूर हो जाती है। 

पाचन शक्ति बढ़ाएं (Increase Digestion)

पाचन शक्ति जब काम हो जाती है तो उसके साथ ही भूख लगनी भी काम हो जाती है, जिससे शरीर में अनेक प्रकार की कमज़ोरियाँ आ जाती है, रातों को नींद नहीं आती, ऐसे प्राणी को एक गिलास गर्म पानी में एक नींबू का रास दाल कर हर रोज़ सुबह शाम पिलानी से सब रोग दूर हो जाते हैं। 

पुरानी कब्ज़ (Chronic Constipation)

कब्ज़ सब बिमारियों की माँ है। इससे हर समय बचे रहना चाहिए। ऐसे रोगियों को यही सलाह दी जाती है कि वे दो नींबू का रस और चीनी दो चम्मच मिला कर पी जाएँ। शीघ्र ही आराम होगा। 

संग्रहणी वायु गोला पेचश (Diarrhea Air Ball Pecs)

संग्रहणी रोग, नींबू को काट कर मूंग के दाने  के बराबर इसमें अफीम डाल दें फिर उसका मुँह बांध कर हलकी आंच पर उसे गर्म करें, इसके पश्चात ठंडा होने पर उसे चूस लें। दिन में दो बार चूस लेने से यह सब रोग नष्ट हो जाते हैं।

प्रसिद्ध डॉक्टर अबर्ट का मत (Vote of  The Famous Doctor Abert)

स्वास्थ्य के विशेष और प्रसिद्ध डॉक्टर अब्बर्ट ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि आम लोग नींबू के रास को अम्लीय समजते हैं, बहुत कम लोगों को इसके गुणों का पता है।  उन्हें यह भी पता नहीं नींबू में पाया जाने वाला पोटाशियम अम्ल विष को नस्ट करता है। 

बवासीर (Hemorrhoids)

नींबू का रस किसी साफ कपडे से चन कर  उसमें जैतून का तेल मिला दें।  फिर उसमें 2 ग्राम मात्रा में गिल्सरीन मिला कर सिन्ध्रंज़ से रात के समय गुदाद में प्रवेश करवाते रहो, इसके बवासीर का रोग जाता रहेगा। 

हिचकी रोग (Hiccup Disease)

नींबू का रस, शहद दोनों एक -एक चम्मच थोड़ा सा क़ाला नमक इसमें मिलाकर रोज़ दिन में दो तीन बार पीने से हिचकी बंद हो जाएगी।

प्लू (Flue)

प्लू रोग से बढ़ते प्रभाव को देखते हुए इस समय ऐसी किसी सस्ती और आम दवाई की जरूरत है जो हर आदमी घर में ही ले सके।  जिन लोगों को प्लू रोग लगता है उन्हें चाहिए कि नींबू के रस में शहद मिला  तीन बार लें, इससे प्लू  का जोर कम होकर दो तीन में उत्तर जायेगा। 

मलेरिया (Swamp Fever)

मलेरिया बुखार काफी भयंकर होता है इसमें रोगी का सारा शरीर काम्पने लगता है और सर्दी के मारे उसका बुरा हाल हो जाता है। ऐसे रोगी को नमक और काली मिर्च नींबू में भरकर चूसने के लिए दें। चूसने से पहले नींबू को थोड़ा गर्म कर लें। पानी में नींबू का रस मिलाकर उसमे शकर मिलकर दिन में 3 बार चार चम्मच पीते रहने से मलेरिया रहता जाता है। 

पीलिया अथवा पीला ज्वर (Jaundice or Yellow Fever)

मैं समझता हूँ इस समय रोग सबसे भयंकर हैं ऐसे रोगों का उपचार भले ही आपके अथवा और डॉक्टरों के पास सरल नहीं परन्तु आर्युवेद में इसका सरल उपचार नींबू रस के उपयोग से किया जा सकता है। नींबू के गुणों को विदेशों में भी कम ही समझते है इसी को देखते हुए फ्रेंच डॉक्टर ने अपने परीक्षणों और अनुभव के आधार पर कहा  है कि नींबू को फीके पानी में मिलाकर पीलिया के रोगी को निरन्तर पिलाते रहने से पीलिया रोग दूर हो जाता  है। 

गला बैठना (Hoarseness)

गला बैठ जाए या पक जाए तो गर्म पानी में नींबू को निचोड़ कर उसमें नमक डालकर तीन चार बार गरारे करने से इस रोग से मुक्ति मिल जाती है।

मोटापा (Obesity)

मोटे लोगों से पूछो कि वे इसके कारण कितने दुःखी है। जो वे एक चार पग चलने से भी व्याकुल है। वे मोटापे से पीछा छुड़वाने के लिए कुछ भी करने को तैयार है। हजारों लाखों रूपये खर्च करके भी वे यदि दुःखी हैं। तो उनका सरल इलाज में उन्हें बताता हूं : – एक नींबू नमक पाव भर गुनगुने पानी में मिलाकर खाली पेट सुबह के समय पीने से मोटापा कम होता है। यदि इसमें नमक अथवा काला नमक भी मिला लें तो और भी अच्छा होगा।

दांतो के रोग (Dental Disease)

ताज़ा पानी लेकर उसमें नींबू निचोड़ कर कुल्ले करने से दांत रोगों को आराम मिलता हैं। मुंह की गंध, मसूड़ों का फूलना, ठंडा पानी लगना यह सब रोग दूर हो जाएंगे। गला भी साफ हो जाएगा।

दांत रोग पायोरिया (Tooth Disease Pyorrhea)

आम आदमी के लिए टी. बी. रोग और दांतो के लिए पायोरिया रोग बराबर ही होते हैं इसलिए मैं पयोरिया रोगियों को यह सलाह दूंगा कि  वह अपने दांतों का पूरा – पूरा ख्याल रखते हुए पायोरिया रोग में नींबू का रस शहद में मिलाकर मसूड़ों पर मलते रहें इससे काफी लाभ होगा।

दांतो की सफाई (Dental Cleaning) 

दांतो को साफ करने के लिए पहले नींबू के छिलकों को धूप में सुखा ले फिर इन्हें अच्छी तरह बारीक पीस लें। यह एक दंतमंजन तैयार हो जाएगा। इसे दिन में तीन चार बार दांतो पर मलने से एक मास के अंदर गंदे से गंदे दांत भी साफ हो जाएंगे और साथ ही दांतो के अन्य रोगों से भी मुक्ति मिलेगी। मुंह की गंध जाती रहेगी दांत मज़बूत हो जाएंगे।

कील मुहांसो का उपचार (Treatment of Nail Muhason)

नींबू के रस को चार गुना गिलसरीन में मिलाकर चेहरे पर रगड़ने से कील मुहासे मिट जाते हैं , चेहरे में प्राकृतिक निखार आ जाता है। एक चम्मच मलाई लेकर उसमें नींबू निचोड़ कर चेहरे पर लेप करें इससे चेहरे के सारे कील मुहासे नष्ट होकर चेहरे का रंग निखर आएगा।

चर्म रोग (Skin Disease)

नींबू चर्म को साफ करता है चर्म के सारे रोग फोड़े, फुंसियां, दाद, खाज,  खुजली जैसे रोगों में नींबू का रस उन स्थानों पर लगाने और उसी स्थान को नींबू पानी से धोने पर और हर रोज़ नींबू के रस से नहाने पर चरम रोग ठीक हो जाते हैं। ऐसे रोगी के गुड़, श्क्कर दालें, न खाएं तो अच्छा रहेगा।

ब्लड प्रैशर और दिल की कमजोरी (Blood Pressure and Heart Weakness)

दिल की कमजोरी को साधारण रोग न समझें। इस कमज़ोरी को दूर करने के लिए नींबू ,में विशेष गुण हैं इसके निरंतर प्रयोग से रक्त वाहनियों में लचक और कोमलता आ जाती है और उनकी कठोरता दूर हो जाती है, नींबू के उपयोग से बुढापे की आयु तक आदमी अपने आपको सुखद सशक्त और आनन्दमय महसूस करता है।

रोहिणी (Dipheriaphor)

डा. ई. पी. इंशूज ने अपनी पुस्तक थराप्यूटिक बाई ब्रेज में लिखा है कि जर्मन के एक डाक्टर ने नींबू के रस से 80 रोगियों को ठीक कर दिया। उनमें से केवल एक ही मरा था। वे अपने मरीजों को पानी में मिलाकर नींबू का रस पिलाते थे , उसे पानी में डालकर गरारे करवाते थे।

मोतियाबिन्द (Cataract)

छोटी मक्खी का शहद 9 भाग , अदरक का रस 1 भाग , नींबू का रस 1 भाग

यह सब मिलाकर एक बूंद हर रोज़ आंख में डालते रहने से मोतियाबिन्द ठीक हो जाता है।

बवासीर का एक और उपयोगी उपचार

250 ग्राम दूध में आधा नींबू निचोड़ कर मिलाकर उसे उसी समय पी जाएं यह दवा चालीस दिन तक करने से बवासीर का नाम तक मिट जाता है।

दांत दर्द का एक और नुसखा (Toothache and Formula)

एक नींबू चार टुकड़े करके उन पर नमक डाल कर एक के बाद एक गर्म करते जाएं और फिर एक एक टुकड़े को उठाकर दुःखते दांतों पर रखते जाएं इससे दांत दर्द को लाभ होगा।

तिल्ली (Spleen)

एक गिलास पानी में एक नींबू निचोड़ कर पानी 4 दिन तक पीते रहने से तिल्ली का रोग जाता रहता है।

नज़र को तेज़ करना (To Accelerate Eye)

नींबू रस में गुलाब जल डालकर हर रोज़ दो दो बूंद डालने से आंख की नज़र तेज़ हो जाती है यहां तक कि चश्मा भी उतर जाता है।

बच्चा जल्दी पैदा हो (Baby Born Early)

यदि चौथे मास से प्रसव कल तक गर्भणी एक नींबू की शिकंजवी हर रोज़ पिया करे तो बच्चा आसानी से हो जाता है।

नारंगी द्धारा अन्य रोगों का उपचार। (Orange Treat Other Diseases)

नारंगी को आम लोग संतरा भी कहते हैं इसे खाने से मन में ठंडक पहुंचती है जो लोग सुबह उठकर संतरे का प्रयोग करते हैं, यदि इसे खाना खाने के पांच घंटे के पश्चात खाया जाए तो और भी अधिक लाभकारी होता है इसमें विटामिन सी काफी मात्रा में पाए जाते हैं, एक आम आदमी की पूरे दिन के लिए जितने विटामिन सी की आवश्यकता होती है वे एक नारंगी में बड़े आराम से मिल जाते हैं।

होम्योपैथिक ई०  पी० एन्शुज में संतरे को अनेक रोगों का डॉक्टर बताया है जैसा कि –

गुर्दा रोग (Kidney Disease)

सुबह खाली पेट 1 या 2 संतरे खाकर गर्म पानी पीने या संतरे का जूस पिने से गुर्दे के हर प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं, गुर्दा के अनेक रोगों से बचाव भी होता है। जो लोग चिर आयु तक अपने गुर्दे को बचाकर रखना चाहते हैं उनको चाहिए कि वे दिन में तीन संतरे अवश्य लें।

इन्फ्लुएन्जा (Influenza)

यहां रोग पिछले कई वर्षों से सारे विश्व में अपने पांव तेज़ी से बढ़ा रहा है कई देशों में तो महामारी के रूप में भी फैल रहा है, इस रोग से बचने का सरल तरीका यही है कि संतरे का निरंतर प्रयोग करते रहें।

बच्चों के लिए एक टानिक (A Tonic For Children)

बच्चों को छोटी आयु से संतरे का रस पिलाते रहने से उनके शरीर में कमज़ोरी नहीं आती वे दांत निकालने में भी कोई कठिनाई महसूस नहीं करते बचपन से ही उनकी हड्डियां मजबूत हो जाती हैं वे चलने फिरने में बहुत खुशी महसूस करते हैं। मैं समझता हूं बच्चों के लिए वही संतरा अच्छा जिसके रस को पीने से बच्चे सदा चुस्त रहते हैं।

शराब छुड़वाना (Alcohol Weaning)

यदि आप किसी से यह कहेंगे की संतरे द्धारा शराब छुड़वाई जा सकती है तो वह आदमी आपको पागल कहेगा। क्योंकि शराब छुड़वाना इतनी सरल बात नहीं है परन्तु आयर्वेद औषधियों ने यह बात  सिद्ध कर दी है कि हमारे पास इस गंदी आदत को छुड़वाने का उपाय भी है।

यदि आप किसी भी शराबी की शराब छुड़वाना चाहते तो उसे हर रोज़ सुबह दो संतरे खाने को दें, फिर दोपहर, और तीसरी बार रात को आठ बजे। इस प्रकार से शराबी का शराब पीने का मन समाप्त हो जाएगा। धीरे – धीरे वह शराब से नफ़रत करने लगेगा। 

पायोरिया रोग (Payoriya Disease)

दांतो से रोगों में सब से गंदा रोग पायोरिया है। इसके रोगी अपने दांतो की सुरक्षा न करने से कारण एक दिन अपने अनमोल दांतो से भी वंचित हो जाते हैं, इसलिए सबसे पहले पायोरिया रोगी अपने दांतो की सफाई की ओर ध्यान दें। 

पहले संतरे के छिलके लेकर उन्हें धूप में सुखा लें फिर पीस कर छान के मंजन बना लें। इस मंजन को मसूड़ों और दांतो पर खूब मालिश करें, ऐसा हर रोज़ करते रहने से सारे दांत रोग दूर हो जाते हैं, पायोरिया भी दूर हो जाते हैं। 

शूगर (Sugar)

शूगर रोग के बारे में इतना ही कहना काफी है कि यह बहुत भयंकर रोग है यह रोग अंदर ही अंदर आदमी को खोखला कर देता है, कई लोग हजारों रूपए इस के उपचार पर लगाकर थक जाते हैं तो वे निराश हो कर बैठ जाते हैं। ऐसे लोगों के लिए मैं एक सरल उपाय बता रहा हूं। सुबह उठ कर नारंगी का आधा भाग खाली पेट 40 दिन तक खाते रहने से आपको काफी लाभ हो सकता है।

दिव्य चूर्ण Divya powder

मुख्य घटक:

गुलाब फूल, सौंठ, सैंधा नमक, सनाय पत्ती, छोटी हरड़, कालादाना, सौंफ आदि।

मुख्य गुणधर्म:

  1. यह चूर्ण कब्ज को दूर करता है तथा आंतो में जमे मल को साफ कर बाहर निकालता है। आंतो को क्रियाशील बनाता है, जिससे आंतो की अंदर की परत मल को पुनः जमने नहीं देती।
  2. यह चूर्ण उदर की पूर्ण सफाई करके नैराश्य को हटाकर शरीर में स्फूर्ति लाता है। पेट दर्द, अफारा, भारीपन व जी मिचलाना आदि में भी इससे लाभ होता है।

सेवनविधि तथा मात्रा: Sevnvidhi and Volume

1 चम्मच या आवश्यकता अनुसार रात को सोते समय गर्म पानी से लें।

दिव्य पेय (हर्बल टी) Divya Beverage (Herbal Tea)

मुख्य घटक:

एला (इलाइची), तेजपत्र, दालचीनी, लवंग, चन्दन, जावित्री, जायफल, काली मिर्च, गुलाब फूल, कमल फूल, अश्वगंधा, सोमलता, पुनर्नवा, वासा, चित्रक, अमृता, भूमि आँवला, आज्ञाघास, बनप्सा फूल, ब्राह्मी, शंखपुष्पी, तुलसी, छोटी पिप्पली, श्वेत चन्दन, चव्य, सौंठ, नागरमोथा, तेजपात, सौंफ, अर्जुन आदि।

मुख्य गुण – धर्म:

  1. यह मादकतारहित मधुर स्वादयुक्त चाय का उत्तम विकल्प आयुर्वेदिक पेय है।
  2. इस पेय के सेवन से शरीर में रोगप्रतिरोधक शक्ति का विकास होता है, जिससे कफ आदि रोग शरीर को आक्रांत नहीं कर पाते। किसी असावधानीवश रोग शरीर में आ भी गया हो तो शीघ्र छुटकारा मिल जाता है।
  3. इसके सेवन से मन्दाग्नि दूर होती है। मस्तिष्क को शांति प्राप्त होती है तथा शरीर की शक्ति में भी वृद्धि होती है। इस पेय का सेवन कॉलेस्टोरल का नियमन करता है तथा हृदय रोगों से बचाता है।
  4. यह दिव्य पेय लीवर को शक्ति प्रदान करता है। सबसे उत्तम बात तो यह है कि यह दूध में उपस्थित स्नेहत्व को समाप्त नहीं करती तथा निकोटिन रहित है, जबकि बाजार में उपलब्ध चाय में निकोटिन होती है तथा उसके सेवन से गैस, कब्ज व एसीडिटी जैसे रोग सहज ही पैदा हो जाते हैं।

सेवनविधि तथा मात्रा: Sevnvidhi and Volume

इस पेय की उपयोग – विधि सामान्य चाय की तरह है। मात्रा रूप में भी सामान्य चाय की तरह ही, बल्कि उससे भी कम मात्रा में डालना उचित है। इसे दूध में डालकर सामान्य चाय की अपेक्षा अधिक देर तक पकाएँ। इससे जड़ी – बूटियों का अधिक लाभ मिलेगा। आवश्यकतानुसार चीनी मिलाकर पीये। 

दिव्य धारा Divya Section

मुख्य घटक:

पीपरमेन्ट, कपूर, सत अजवायन, लौंग तैल आदि।

गुण – धर्म व सेवनविधि:

  1. 5 से 10 बूँद तक सौंफ आदि के अर्क से हैजे में 15 – 15 मिनट में दें। जब रोग के लाभ होने लगे तो समय भी उसी तरह बढ़ा दें अर्थात आधे – आधे घंटे, एक – एक घंटे, दो – दो घंटे पश्चात देने लगें। इससे हैजे में निश्चित लाभ हो जाता है।
  2. यह सर दर्द, दाँत दर्द, कान का रोग, नकसीर रोग, चोट, शीतपित्त, खाँसी, अजीर्ण, मंदाग्नि आदि में लाभदायक है।
  3. सिर दर्द में माथे पर इसकी 3 – 4 बूँद लगाकर मालिश करने तथा 1 – 2 बूँद सूँघने से सिर दर्द में तुरंत राहत मिल जाती है। दाँत दर्द होने पर रुई में लगाकर पीड़ायुक्त दाँत लगा दें।
  4. पेट दर्द, गैस या अफारा व दमा होने पर खाण्ड, बताशा या गर्म जल में 3 – 4 बूँदे डालकर सेवन करें। दमा व श्वास रोग में सूँघने व छाती पर लगाने से विशेष लाभ होता है। श्वास रोग बढ़ने की वजह से यदि श्वास न ले पा रहे हो तो आधे से एक लीटर गर्म जल में 4 – 5 बूँद दिव्य धारा डालकर वाष्प लेने से तुरंत लाभ मिलेगा।

दिव्य दंतमंजन Divya Tooth Powder

मुख्य घटक:

बबूल, नीम, मौलसरी, तुम्बरू, माजूफल, छोटी पीपल, अकरकरा मूल, लवंग, काला नमक, समुद्र फेन, सैंधा नमक, स्फटिका भस्म, कपूर देसी, पीपरमेंट आदि।

मुख्य गुण – धर्म:

  1. इस मंजन के प्रयोग करने से मसूड़े मजबूत होते हैं, जिसके फलस्वरूप मसूड़ों से निकलने वाला रक्त – पस (पायरिया) दूर होता है तथा दाँतों में फँसे अन्न कण निकल जाते हैं।
  2. मुख से बदबू आनी दूर होती है। लार ग्रंथि अपना कार्य अच्छी तरह करने लगती है। दाँतो को स्वस्थ व चमकीला बनाता है।

सेवनविधि: Sevnvidhi

इस मंजन को मध्य की अंगुली से मसूड़ों तथा दाँतो पर अच्छी तरह मालिश करें या टूथ ब्रश से भी इस मंजन को कर सकते हैं।  पश्चात पानी से अच्छी तरह सफाई करें। रात को भी खाने के बाद मंजन को प्रातः काल की तरह ही प्रयोग करें। इस प्रकार दिव्य दंतमंजन के प्रयोग से दाँतो के सभी रोग दूर होते हैं।

दिव्य पीडान्तक रस Peedantk Divya Juice

मुख्य घटक:

अजवायन, निर्गुण्डी, सुरंजान मीठी, अश्वगंधा, रास्ना, मोथा, महावातविधवंसं रस, प्रवाल पिष्टी, शिलाजीत, मोती पिष्टी, शुद्ध कपीलु, हीरक भस्म, दशमूल, अमृता, योगराज, गुग्गुलु, मन्डूर भस्म, स्वर्णमाक्षिक भस्म आदि।

मुख्य गुण – धर्म:

जोड़ों का दर्द, गठिया, कमर दर्द, सर्वाइकल स्पोंडलाइटिस, सियाटिका आदि दर्दों में अत्यंत लाभप्रद है। यह समस्त शारीरिक पीड़ाओं में शीघ्र तथा स्थाई लाभ देता है।

सेवनविधि व मात्रा: Sevnvidhi and Volume

1 – 1 या 2 – 2 गोली दो बार दूध या उष्ण जल के साथ भोजन उपरांत लें।

दिव्य पीडान्तक क्वाथ Divya Peedantak Decoction

मुख्य घटक:

पीपलमूल, निर्गुण्डी, अश्वगंधा, रास्ना, नागरमोथा, एरण्डमूल, सौंठ, अजवायन, नागकेशर, गजपीपल, पारिजात आदि वातनाशक औषधियाँ।

मुख्य गुण – धर्म:

जोड़ों का दर्द, गृध्रसी (सियाटिका), गठिया आदि सभी प्रकार  दर्द व शोध में लाभप्रद है।

योगविधि एवं मात्रा: Yog Method and Quantity

5 से 10 ग्राम क्वाथ को लगभग 400 मिलीo पानी में पकाएँ। जब लगभग 100 मिलीo शेष रह जाये तब छानकर सुबह खाली पेट व रात को सोते समय पीयें। विशेष लाभ के लिए किसी भी वातशामक औषध को काढ़े के साथ पीने से शीघ्र लाभ होता है। अतिशोध व पीड़ा  क्वाथ स्नान व सिकाई  भी विशेष लाभ होता है।

क्वाथ स्नान विधि: Decoction Bath Method

  1. रोगानुसार दिये क्वाथ यदि वाष्प (भाप) लेनी हो तो निद्रिष्ट औषध को 1 – 1.5 लीटर पानी में प्रेशर कुकर में डालकर पकाएँ। जब सीटी से वाष्प निकलने लगे, तब सीटी को हटाकर उसके स्थान पर गैस वाला रबड़ का पाइप लगा दें तथा पाइप के दूसरे सिरे से निकलती हुई वाष्प से रोगयुक्त स्थान पर वाष्प दें। पाइप सिरे से वाष्प निकलती है वहाँ कपड़ा लगाकर रखें, अन्यथा तेज उष्ण जल के छींटे शरीर को जला सकते हैं। उचित समय तक वाष्प लेने के बाद शेष बचे जल से पीड़ायुक्त स्थान पर मध्यम उष्ण पानी डालते हुए सिकाई करें।
  2. यदि वाष्प न लेना हो तो औषध को आवश्यकतानुसार 3 – 4 लीटर पानी में पकाएँ। जब उबलते हुए लगभग आधा पानी शेष रह जाए तो उचित गर्म जल ली कपड़े आदि के माध्यम लेकर रोगयुक्त स्थान की सिकाई करें।

दिव्य पीडान्तक तैल Divya Peedantk Oil

मुख्य घटक:

वतसनाभ, मधुयष्टि, पीपलामूल, सैंधा नमक, बचा, गजपीपल, जटामांसी, नागकेशर, हल्दी, दारुहल्दी, तेजपात, भृंगराज, मंजीठ, पलाशमूल, पुष्करमूल, सुगन्धबाला, शतावर, सौंठ, सोयाबीज, चित्रकमूल, सौंफ, एरण्डमूल, अक्रमुल, धतूरा, अजवायन, कपीलु, मालकांगनी, गन्धप्रसारणी, रास्ना, निर्गुण्डी, लहसुन, गोदूध, दही, गोमूत्र, दशमूल, जीवक, मेदा, वृद्धि, कालोली, क्षीर कालोली, तिलतैल आदि।

मुख्य गुण – धर्म:

जोड़ों का दर्द, कमर दर्द, घुटनों का दर्द, सर्वाइकल स्पोंडलाइटिस, स्लिपडिस्क, चोट आदि सभी प्रकार के दर्द, शोध व पीड़ा में शीघ्र ही लाभप्रद है।

उपयोग विधि: Use Method

पीड़ायुक्त स्थान पर धीरे – धीरे मालिश करे। यह तेल केवल बहिया प्रयोगार्थ ही (For External Use Only) है। मालिश सदा ही हृदय की ओर उचित बल का प्रयोग करते हुए धीरे – धीरे करनी चाहिए।

दिव्य यौवनामृत वटी Divya Yauvanamrit Equity

मुख्य घटक:

जावित्री, जायफल, केशर, सफ़ेद मूसली, स्वर्ण भस्म, कौंच के बीज, अकरकरा, बलाबीज, शतावर, मकरध्वज आदि।

मुख्य गुणधर्म:

  1. ढलती आयु या थके कमजोर शरीर वालों के लिए यह अत्यंत बलवर्धक और पुष्टिकारक है।
  2. यह वटी दिल और दिमाग को शक्ति देने वाली, शुक्राणु अल्पता तथा शरीर में स्फूर्ति बढ़ाने वाली और वाजीकारक है।
  3. नशीली वस्तु का सेवन किए बिना शुक्राणुवर्धक, अत्यंत बलवर्धक, पुष्टिकारक, वाजीकरण, ओज, तेज, कांतिवर्धक, नपुंसकतानाशक व शक्ति देने वाली सर्वोत्तम औषध है।

सेवनविधि तथा मात्रा: Sevnvidhi and Volume

1 या 2 गोली सुबह तथा सायः या रात को गर्म दूध से लें।

दिव्य मधुनाशिनी वटी Divya Madhunashini Equity

मुख्य घटक:

अमृता, जामुन, कुटकी, निम्ब, चिरायता, गुड़मार, करेला, कुटज, गोक्षुर, कचूर, हल्दी, कालमेघ, बबूलफली, काली जीरी, अतीस कड़वा, अश्वगंधा, बिल्व, त्रिफला, वटजटा आदि का घनसत् (एक्सट्रैक्ट), शिलाजीत, मेथी आदि।

मुख्य गुणधर्म:

  1. यह अग्न्याशय (पेन्क्रियाज) को क्रियाशील कर अग्न्याशय से उसका रस (इन्सुलिन) सही मात्रा में स्त्रावित कराती है तथा उसके माध्यम से अतिरिक्त ग्लूकोज को ग्लाइकोजन में परिवर्तित कराती है।
  2. यह कमजोरी व चिड़चिड़ापन दूर करती है तथा मस्तिष्क को ताकत प्रदान कर कार्यक्षमता बढ़ाती है। हाथ – पैरों में आई शून्यता बको दूर कर स्नायुतंत्र को बलिष्ठ बनाती है।
  3. यह डायबिटीज की वजह से होने वाली थकान, कमजोरी और तनाव जैसी समस्याओं से निजात दिलाती है।
  4. बहुत प्यास लगना, बार – बार मूत्र की इच्छा, वजन घटना, धुंधली दृष्टि सनसनाहट, थकान, त्वचा, मसूड़ों व मूत्राशय का इन्फेक्शन आदि विकारों से आपकी रक्षा करती है।
  5. मधुनाशिनी से आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता होगा और नई आशा व आत्मविश्वास बढ़ेगा।

उपयोग विधि मात्रा: Use Method and Quantity

2 – 2 गोली प्रातः नाश्ते व सांयकाल भोजन से एक घंटा पहले पानी के साथ लें या प्रातः नाश्ता व रात्रि में भोजन के पश्चात गुनगुने पानी या दूध के साथ सेवन करें। आदि आप शुगर के लिए इन्सुलिन या एलोपैथिक दवा लेते हैं तो मधुनाशिनी प्रारम्भ करने के दो सप्ताह बाद शुगर परीक्षण कर लें, जैसे – जैसे शुगर का स्तर सामान्य आता जाए वैसे – वैसे अंग्रेजी दवा धीरे – धीरे कम कर दें। मधुनाशिनी की मात्रा भी जैसे – जैसे शुगर कम होती जाए, वैसे – वैसे पहले एलोपैथिक बंद होने के पश्चात यदि शुगर सामान्य रहती है, फिर कम करते जाएँ।

दिव्य मधुकल्प वटी Divya Madhukalp Vati

मुख्य घटक:

दिव्य मधुनाशिनी वाले द्रव्यों को ही बिना घनसत् निकाले सूक्ष्म चूर्ण करके वटी बनाई गई है।

मुख्य गुणधर्म सेवनविधि: मधुनाशिनी की तरह

दिव्य मुक्तावटी Divya Mukta Vati

मुख्य घटक:

हिमालय की पवित्र जड़ी – बूटियों जैसे – ब्राह्मी, शंखपुष्पी, उस्तेखदूश, अर्जुन, पुष्करमूल, जटामांसी, सर्पगन्धा, ज्योतिष्मती, वचा, अश्वगंधा आदि वनौषधियों एवं मोतीपिष्टी आदि सौम्य द्रव्यों से निर्मित दिव्य औषध है।

मुख्य गुणधर्म:

  1. यह मुक्तावटी पूर्णरूप से दुष्प्रभावरहित है।
  2. उच्च रक्तचाप चाहे गुर्दो के विकार या हृदय रोग के कारण से हो अथवा कोलस्ट्रॉल, चिंता, तनाव या वंशानुगत आदि किसी भी अन्य कारण से हो तथा बीo पी o के साथ यदि अनिद्रा, घबराहट, छाती व सिर में दर्द भी हो तो मात्र इस एक ही दवा के प्रयोग से इन सब समस्याओं से छुटकारा मिल जाता है।
  3. यदि आप को उच्च रक्तचाप के कारण अनिद्रा, बेचैनी हो तो उसके लिए अलग से औषधि लेने की आवश्यकता नहीं है। जिन्हें नींद पूरी आती हो, उनकी नींद नहीं बढ़ेगी।
  4. किसी भी प्रकार की कोई भी एलोपैथिक आदि अन्य औषध सेवन कर रहे हों तो ‘मुक्तावटी’ सेवन प्रारम्भ करने के बाद उसे आप तुरंत बंद कर सकते हैं। यदि आप बहुत लम्बे समय से अन्य औषध सेवन कर रहे हों या भयग्रस्त हों तो दूसरी दवा की मात्रा धीरे – धीरे कम करते हुए बंद कर दें।
  5. यदि किसी एलोपैथिक आदि दवा लेने पर भी आपका रक्तचाप सामान्य न हो पाता हो तथा साथ ही नींद न आना या घबराहट रहती हो तो भी मुक्तावटी से तुरंत लाभ मिलेगा।
  6. एलोपैथिक दवाएं आपको रक्तचाप से कॉवेल राहत दिला सकती हैं; रोग को समूल नष्ट नहीं कर सकती। जबकि ‘मुक्तावटी’ लगभग एक – डेढ़ वर्ष में ही उच्च रक्तचाप को सदा के लिए सामान्य कर देती है एवं सभी औषधियों छूट जाती हैं। यदि अपवादरूप में किसी को हमारी औषध लम्बे समय तक भी खानी पड़े तो इसका कोई दुष्प्रभाव नहीं होता।

सेवनविधि मात्रा: Intake Method and Quantity

एलोपैथिक दवाइयों लेते हुए भी रक्तचाप 160 – 100  या इससे अधिक होने पर दो – दो गोली सुबह नाश्ते से पहले दोपहर को भोजन से पहले और शाम को खाने से एक घंटा पहले दिन में तीन बार ताजे पानी से लें। गोली चबा कर ऊपर से पानी पीना अधिक लाभप्रद है। जब रक्तचाप सामान्य होने लगे तो धीरे – धीरे एलोपैथिक दवा बंद करके मुक्तावटी की दो – दो गोली दो बार लेते रहें। यदि एलोपैथिक औषधि का सेवन करते हुए रक्तचाप 140 – 90 रहता हो तब मुक्तावटी की दो – दो गोली सुबह – शाम प्रारम्भ कर दें। रक्तचाप सामान्य होने पर एलोपैथिक दवाइयाँ बंद कर दें।

विशेष: Important

यदि आप बीo पीo के लिए एलोपैथिक दवा ले रहें हो तो आप मुक्तावटी प्रारम्भ करने के बाद बीo पीo मापते रहें, जब बिना अंग्रेजी दवा के ही बीo पीo सामान्य हो जाये तो अंग्रेजी दवा बंद कर दें। यदि आप लम्बे समय से अंग्रेजी दवा ले रहे हों तो उसकी मात्रा धीरे – धीरे कम करते हुए बंद कर दें। मुक्तावटी भी दो – दो गोली कुछ समय खाने के बाद लेते रहें। रक्तचाप जब सामान्य रहने लगे तो मुक्तावटी पहले दो – दो, फिर एक – एक गोली कुछ समय लेने के बाद, केवल सुबह एक गोली खाने मात्र से बीo पीo नियंत्रित रहने लगेगा। कुछ समय के बाद एक गोली खाने से भी जब बीo पीo 120 – 80 से भी कम होने लगे तब सप्ताह में दो बार एक – एक गोली लें। फिर सात दिन में, और फिर इस मुक्तावटी को बंद कर देंगे, तब भी आपका बीo पीo बढ़ेगा नहीं अर्थात आप पूर्ण स्वस्थ हो जाएंगे।

पथ्य – अपथ्य (खान – पान): Pathy – Apthey (Khan – Paan)

हल्का और सुपाच्य भोजन लें। प्रातः काल उठकर दो से चार गिलास पानी पीएं। नमक कम मात्रा में लें। 

दिव्य मेधा क्वाथ Divya Intellect Decoction

मुख्य घटक:

ब्राह्मी, शंखपुष्पी, अश्वगंधा, जटामांसी, उस्तेखदूस, मालकांगनी, सौंफ, गाजवा आदि।

मुख्य गुणधर्म:

जीर्ण सिरदर्द, माइग्रेन, निद्राल्पता, अवसाद(डिप्रेशन) में अत्यंत लाभप्रद है। इसके सेवन से घबराहट दूर होती है तथा यह स्फूर्तिवर्धक है।

सेवनविधि मात्रा: Intake Method and Quantity

इसका काढ़ा बनाकर सुबह व शाम पीयें। साथ में मेधावटी का सेवन करने से शीघ्र लाभ मिलता है।

दिव्य मेधावटी Divya Medha Vati

मुख्य घटक:

ब्राह्मी, शंखपुष्पी, वचा, ज्योतिष्मती, अश्वगंधा, जटामांसी, उस्तेखद्दूस, पुष्करमूल आदि का घनसत् (एक्सट्रैक्ट) तथा प्रवाल पिष्टी, मोती पिष्टी, व चाँदी भस्म आदि।

मुख्य गुणधर्म:

  1. यह वटी मस्तिष्कीय शिकायतों जैसे स्मरणशक्ति की कमजोरी, सिर दर्द रहना, निद्रा न आना, चिड़चिड़ा स्वभाव होना, दौरे (एपिलेप्सी) आदि को दूर करती है तथा मस्तिष्क को शीतल रखती है।
  2. स्वप्न अधिक आना व निरंतर नकारात्मक विचारों के कारण अवसाद (डिप्रेशन), घबराहट आदि इसके सेवन से दूर होता है तथा आत्मविश्वास व उत्साह बढ़ता है।
  3. विद्यार्थियों तथा मानसिक कार्य करने वालों के लिए यह अत्यंत हितकारी प्रतिदिन सेवन करने योग्य, बुद्धि व स्मृतिवर्धक उत्तम टॉनिक है।
  4. वृद्धावस्था में स्मृतिभ्र्ंशः होना अर्थात स्मरण शक्ति का अभाव व किसी भी पदार्थ आदि को सहसा ही भूल जाना आदि में भी यह एक सफल व निरापद औषध है।

सेवनविधि मात्रा: Intake Method and Quantity

1 से 2 गोली सुबह खाली पेट दूध से या नाश्ते के बाद पानी से और सायकालः खाना खाने के बाद पानी या दूध से सेवन करें।

दिव्य अमृत रसायन (अवलेह) Divya Amrit Rasayan

मुख्य घटक:

आँवला पिष्टी, गोघृत, केशर, ब्राह्मी, शंखपुष्पी, बादाम, वंशलोचन, एला, दालचीनी, शतावर, कोंच बीज, प्रवाल पिष्टी आदि।

मुख्य गुणधर्म:

  1. यह मस्तिष्क को पूर्ण पोषण देने वाला अत्यंत लाभप्रद रसायन है। यह मेधावर्धक (वृद्धिवर्धक), शीतल, शरीर के सम्पूर्ण अंगो को शक्ति, पुष्टि व आरोग्य प्रदान करता है।
  2. शरीर को पुष्ट करके बल, क्रांति को बढ़ाने वाला, नेत्रों के लिए हितकारी, शीतल रसायन जो गर्मी की ऋतु में विशेष रूप से सेवनीय है।
  3. यह विधार्थियों व बुद्धिजीवियों के लिए एक उत्तम टॉनिक है।

सेवनविधि मात्रा: Intake Method and Quantity

1 से 2 चमम्च अर्थात 10 से 20 ग्राम सुबह – शाम दूध के साथ या रोटी आदि के साथ चटनी की तरह भी प्रयोग कर सकते हैं।

दिव्य मेदोहर वटी (वेटलैस) Divya Medohar Vati (Vetlas)

मुख्य घटक:

शुद्ध गुग्गुलु, शिलाजीत सत् तथा हरड़, बेहड़ा, आँवला, कुटकी, पुनर्नवामूल, निशोथ, वायविडंग आदि का घनसत्।

मुख्य गुणधर्म:

  1. यह पाचन तंत्र में आई विकृति को दूर कर शरीर के अतिरिक्त बढ़े हुए मेद (फैट) को कम करके शरीर को सुंदर, सुडौल, कांतिमय व स्फूर्तिमय बनाती है।
  2. यह थाइराइड की विकृति, सन्धिवात, जोडों का दर्द, कमर दर्द, घुटनों के दर्द में भी विशेष लाभप्रद है।
  3. यह शरीर के मेद को पाचन करके हड्डी, मज्जा व शुक्रादि धातुओं को पुष्ट करती है अर्थात मेद को रूपांतरित करके शरीर को गठीला बनाती है। इसके सेवन से शरीर पर कोई भी दुष्प्रभाव नहीं होता।

सेवनविधि मात्रा: Intake Method and Quantity

1 – 1 या 2 – 2 गोली शरीर के वजन के अनुसार दिन में दो या तीन बार खाने से आधा घंटा पहले या भोजन के एक घंटे बाद गर्म पानी से सेवन करें। मीठा व घी बंद करके सुबह उठकर तथा दिन में भी गर्म पानी का अधिक मात्रा में उपयोग करें। तली हुई व मैदे की चीजें तथा मेद को बढ़ाने वाले पदार्थोँ का सेवन न करें।

दिव्य श्वसारि रस Swasari Divya Juice

मुख्य घटक: प्रवाल पिष्टी, अभ्रक भस्म, मुक्ताशक्ति भस्म, टंकण भस्म, स्फटिका, भस्म, गोदन्ती भस्म, कर्पदक भस्म, अकरकरा मूल, लबंग, दालचीनी, त्रिकुटा चूर्ण, काकड़ा सिंगी, मधुयष्टि, रुदन्ती फल आदि।

मुख्य गुणधर्म:

  1. श्वसारि रस का सेवन करने से फेफड़ों के ऊतकों में अधिक क्रियाशीलता आती है। श्वशन नलिकाओं व फुफ्फुस (फेफड़ों) पर आया शोध दूर होता है, जिससे 1. अधिक मात्रा में ऑक्सीजन फेफड़ों को मिलती है और ब्रोन्कायटिक जैसी समस्याओं से छुटकारा मिलता है।
  2. फेफड़ों में जमा हुआ कफ इसके सेवन से सरलता से बाहर हो जाता है तथा नया कफ बनना बंद हो जाता है।
  3. इसके सेवन से फेफड़ों की रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास होता है तथा कफ, नजला, जुकाम, दमा, बार – बार छीकें आना, सिर में भारीपन, साइनस आदि रोगों में विशेष लाभ होता है। यह फेफड़ों को पोषण देने वाला एक उत्तम टॉनिक है।

सेवनविधि मात्राIntake Method and Quantity

500 मिग्राम से 1 ग्राम तक दिन में 2 या तीन बार खाने से पहले शहद से या गर्म पानी से लें। इसको खाने के बाद भी लिया जा सकता है। यदि श्वास की तीव्रता अधिक हो तो 50 ग्राम श्वासारि रस में अभ्रक 10 ग्राम, प्रवालपिष्टी 10 ग्राम मिलाकर सबकी 60 पुड़िया बनाकर 1 – 1 पुड़िया दिन में 2 या 3 बार शहद से ले।

दिव्य स्त्री रसायन वटी Divya Stri Rasayan Vati

मुख्य घटक:

पुत्रजीवक, श्वेत चन्दन, कमल, दारुहल्दी, वंशलोचन, प्रवाल पिष्टी, शिलाजीत, शतावर, शिवलिंगी बीज, पारस पीपल, मुलैठी, त्रिफला, अम्बरधान, बीजबन्द, आँवला, अशोक, नागकेशर, अश्वगंधा, देवदारु, शुद्ध गुग्गुलु आदि।

मुख्य गुणधर्म:

  1. सम्पूर्ण स्त्री रोगों जैसे श्वेतप्रदर, रक्तप्रदर, मासिकधर्म की अनियमितता या काँटे – पेडू की पीड़ा आदि में विशेष लाभप्रद है।
  2. अतिमासिकस्राव में विशेष उपयोगी है। कुछ समय सेवन करने में समस्त स्त्री रोग दूर हो जाते हैं।
  3. चेहरे पर झुर्रियां पड़ना, आँखों के नीचे कालिमा, हर समय शरीर में थकान व आलस्य जैसे विकारों को दूर करने में स्त्री रसायन अत्यधिक सहायक है।

सेवनविधि मात्राIntake Method and Quantity

1 से 2 गोली दिन में दो बार खाने के बाद दूध या पानी से लें।

दिव्य हृदयामृत वटी Divya Hridyamrit Vati

मुख्य घटक:

अर्जुन छाल, अमृता, अश्वगंधा रास्ना, निर्गुंडी, पुनर्नवा, चित्रक, नागरमोथा आदि का घनसत् (एक्सट्रैक्ट), हीरक भस्म, अकीक पिष्टी, संगेयशव पिष्टी, मोती पिष्टी, चाँदी भस्म, शिलाजीत सत व शुद्ध गुग्गुलु आदि।

मुख्य गुणधर्म:

  1. इसके सेवन से हृदय को ताकत मिलती है। इससे हृदय की धमनियों के अवरोध (ब्लॉकेज) दूर होते हैं। बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल का नियमन होता है।
  2. बार – बार उठने वाले हृदय शूल (एन्जाना) में भी यह तुरंत प्रभावशाली है।
  3. हृद्य की कोशिकाओं बना देती है। बेचैनी, घबराहट को दूर कर हृद्य की कार्यक्षमता बढ़ाती है।
  4. यह हृदय के अंदर आई हुई अवरुद्धता (ब्लॉकेज) को दूर करने में सहयोग करके हृदय को स्वस्थ रखने में अत्यंत सहयोगी है।
  5. यदि आप हृदय का ऑपेरशन करा चुके हैं तो भी हृदय को स्वस्थ बनाए रखने के लिए आप दिव्य हृदयामृत का सेवन कर सकते हैं।

मात्रा अनुपात: The Amount and Ratio

1 से 2 गोली प्रातः व सायः दूध या गुनगुने पानी अथवा अर्जुन छाल के क्वाथ के साथ लें। अर्जुन छाल 2 से 3 ग्राम लेकर उसको एक कप दूध व एक कप पानी में पकाना और जब एक कप शेष रहे तक छानकर पानी या अर्जुन का क्वाथ (काढ़ा) बिना दूध के भी पानी में अर्जुन छाल को पकाकर पिया जा सकता है। यदि आप हृदय के लिए एलोपैथिक दवाइयाँ प्रयोग कार रहे हैं तो जैसे – जैसे हृदयामृत के सेवन से आपका हृदय स्वस्थ होता जाए वैसे – वैसे अंग्रेजी दवाइयाँ को डॉक्टर के परामर्श से कम कर दें।   

दिव्य वातारि चूर्ण Divya Vatari Churna

मुख्य घटक:

सौंठ, अश्वगंधा, सुरंजान मीठी, कुटकी, मेथी आदि।

मुख्य गुणधर्म:

  1. इस चूर्ण के सेवन से सब प्रकार के वातरोग, आमवात अर्थात पेट में आम संचित होकर वात प्रकुपित हो, शरीर जोड़ों में दर्द उत्पन्न करता है, उसमें यह अतीव लाभकारी है।
  2. यह शूलनाशक तथा प्रकुपित वायु को शांत कर आमवात, गृध्रसी, पीठ व कमर दर्द आदि को दूर करता है।

सेवनविधि मात्राIntake Method and Quantity

2 से 4 ग्राम तक गर्म जल या दूध के साथ दोपहर – सायं के भोजन के बाद दो बार सेवन करें।

दिव्य शिलाजीत रसायन वटी Divya Shilajeet Rasayan Vati

मुख्य घटक:

शिलाजीत, अश्वगंधा, भूमि आँवला, त्रिफला आदि।

मुख्य गुणधर्म:

  1. इस वटी का प्रभाव वातवाहिनी नाड़ी तथा वृक्क (मूत्र – पिंड) एवं वीर्यवाहिनी शिराओं पर विशेष होता है।
  2. यह वातशामक, बल वीर्यवर्धक है। इसके सेवन से स्वपनदोष, प्रमेह श्वेतपदर आदि में विशेष लाभ होता है।

सेवनविधि मात्राIntake Method and Quantity

2 – 2 गोली दूध अथवा गुनगुने जल के साथ भोजनपरान्त लें।

दिव्य सर्वकल्प क्वाथ Divya Srwkalp Decoction

मुख्य घटक:

पुर्ननवा, भूमि आँवला, अमलतास, मकोय आदि।

मुख्य गुणधर्म:

  1. इस क्वाथ के सेवन का प्रभाव हमारे यकृत को सबल बनाता है। जिससे यकृत अपना कार्य सुचारू रूप से करने लगता है।
  2. आजकल के दूषित खाने तथा दूषित पेयों (कोल्ड ड्रिंक्स, चाय, कॉफी) आदि के माध्यम से शरीर के अंदर जहरीले रसायन एकत्र होकर यकृत की क्रियाशीलता को नष्ट कर देते हैं। फलतः शरीर बीमारियों का घर हो जाता है और पीलिया उसकी अत्यन्त जटिल स्थिति Hepatitis B तथा C जैसी असाध्य अवस्था में पहुँच जाता है। सर्वकल्प क्वाथ यकृत से सम्बन्धित उपरोक्त Hepatitis B तथा C जैसी जीर्ण अवस्थाओं से बचाकर यकृत को क्रियाशील बनाता है।
  3. इसके सेवन से पीलिया (पाण्डु), यकृत की वृद्धि, सूजन, मूत्राल्पता सर्वाङ्ग – शोध तथा पेट व पेडू में दर्द होना, भोजन का पाचन न होना, भूख न लगना आदि समस्त विकार दूर होते हैं।

सेवनविधि मात्राIntake Method and Quantity

1 चम्मच [लगभग 5 ग्राम] को एक गिलास पानी [लगभग 300 ग्राम] में पकाकर 1/4 जल बचने पर छानकर खाली पेट पीयें। इसी प्रकार सांयकाल खाने से एक घंटा पहले या रात्रि को सोते समय लें। यदि पेट साफ नहीं होता हो तो पकाते समय उसमें 8 – 10 मुन्नका भी डाल लें।

दिव्य कांतिलेप Divya Kantilep

मुख्य घटक:

मेहंदी बीज (पत्र), आमा हल्दी, मंजीठ, जायफल, सफ़ेद चन्दन, सुगन्धबाला, स्फटिक भस्म, समुद्र फेन, कत्था, कपूर आदि।

मुख्य गुणधर्म:

  1. यह लेप त्वचा पर आई हुई सभी समस्याओं जैसे – कील – मुँहासे, चेहरे पर झुर्रियां का पड़ना, निस्तेजता, कान्तिहीनता, कालापन आदि विकारों में शीघ्र लाभकारी है।
  2. इसका चेहरे पर निरंतर लेप करने पर यह लेप त्वचागत सभी विकारों को अवशोषित कर लेता है, जिससे रोगग्रस्त त्वचा पुनः स्वस्थ हो जाती है, चेहरे प्राकृतिक सौंदर्य फिर से निखरता है और मुख पर ओज, तेज व कान्ति आती है।

सेवनविधि मात्रा: Intake Method and Quantity

लगभग एक चम्मच पाउडर लेकर पानी, गुलाब जल या कच्चा दूध मिलाकर लेप(पेस्ट) बना लें। इस लेप को चेहरे पर 3 – 4 घंटे तक लगा रहने दें, बाद में गुनगुने पानी से धो लें। 

दिव्य वृक्कदोषहर वटी Divya Vrikkdoshhar Vati

मुख्य घटक:

ढाक फूल, पित्त पापड़ा, पुनर्नवामूल, पाषाण भेद, वरुण छाल,  कुलथी, अपामार्ग, कासनी, पीपल छाल, नीम छाल, मकोयदाना, गोखरू दाना, अमलतास गूदा, वालमूल आदि।

मुख्य गुणधर्म:

  1. इसका सेवन वृक्कदोष, शोथ, मूत्राश्मरी आदि में लाभदायक होता है।
  2. वृक्क निष्क्रियता (Chronic Renal failure) में इसका सेवन करने से अत्यंत लाभ मिलता है।

सेवनविधि मात्रा: Intake Method and Quantity

आवश्यकतानुसार एक से दो गोली दिन में दो बार वृक्कदोषहर क्वाथ लेने से विशेष लाभ मिलता है।

नोट: इसका सेवन चिकित्सक के परामर्शानुसार करना उचित रहेगा।

घृत कुमारी रस (एलो वेरा जूस) Aloe Vera Juice

पाचन तंत्र को सदा स्वस्थ रखने, गैस, कब्ज, एसिडिटी, जोड़ों का दर्द, कैंसर, कोलाइटिस, यौनरोग, धातुरोग, श्वेतप्रदर व रक्तप्रदर आदि समस्त स्त्री रोगों के लिए यह अत्यंत लाभकारी है। एलोवेरा एवं आँवला का जूस यदि प्रतिदिन ब्रह्मामुहूर्त में खाली पेट व सांयकाल खाने के बाद पीया जाये तो व्यक्ति सौ वर्ष तक निरोग जीवन जी सकता है।

सेवनविधि मात्रा: Intake Method and Quantity

सुबह खाली पेट उठते ही 25 से ५० मिलीo पीकर ऊपर  गुनगुना पानी पी लें। शाम को भी खाने के बाद जल में मिलाकर सेवन कर सकते हैं। घृत कुमारी रस को आँवला रस को आँवला रस व ज्वारे के रस के साथ भी लिया जा सकता है।

दृष्टि आई ड्रॉप Vision Eye Drops

नियमित रूप से 2 – 2 बूँद दवा आँखों में डालने से मोतियाबिंद कट जाता है। ग्लूकोमा के रोगी  आँख का दबाब कम हो जाने से धीरे – धीरे ठीक हो जाता है। कम उम्र में आँखों दूर या नजदीक का चश्मा, आँखों की एलर्जी, काला या सफ़ेद मोतियाबिंद (ग्लूकोमा व कैटरैक्ट), डबल विजन, कलर विजन, रेटिनाइटिस पिग्मेंटोसा, रतौंधी व यूवीआइटस (uveitis) आदि समस्त नेत्र रोगों से बचने व इन समस्त नेत्र रोगों से छुटकारा पाने के लिए यह एक उत्तम अनुभूत औषध है।

सेवनविधि मात्रा: Intake Method and Quantity

1 से 2 बूँद सुबह – शाम आँख में डालें। बच्चों को गुलाब जल में मिलाकर डाल सकते हैं। 5 मिलीo गुलाब जल में 5 बूँद दृष्टि आई ड्रॉप की डालकर रख लें और इसे बच्चों एवं कोमल प्रकृति के व्यक्ति प्रयोग कर सकते हैं।

आँवला रस Amla Juice

बालों का असमय सफ़ेद होना, ग्रोथ कम होना, झड़ना व गंजापन आदि समस्त केश रोगों के लिए साथ ही आँखों का चश्मा हटाने व समस्त नेत्र रोगों के लिए यह रस सर्वोतम है। इसके नित्य प्रयोग से पाचन तंत्र, श्वसन तंत्र, उत्सर्जन तंत्र एवं प्रजनन तंत्र संतुलित एवं स्वस्थ होता है। यह रोग एवं बुढ़ापे से बचाता है। आँवला रस उत्तम रसायन तथा वृष्य (वीर्यवर्धक) है। इसका प्रयोग स्वस्थ पुरुष के स्वास्थ्य को बनाये रखने तथा रोगी के रोग के निवारण हेतु किया जाता है। आयुर्वेद में आँवला फल को अमृत तुल्य कहा गया है। आँवला रस वयःस्थापक है। अतः मानव शरीर को रोगों  मुक्त रखता है। आँवला शीतवीर्य होने से पित्त के विकारों में शीघ्र ही लाभ पहुँचाता है। यह तीनों (वात, पित्त, कफ) दोषों को सम करके रोगों का निवारण करता है। इसके लगातार सेवन करते रहने से चेहरे की कान्ति तथा वर्ण कि वृद्धि होती है।

सेवनविधि मात्रा: Intake Method and Quantity

प्रातः उठते ही 25 से 50 मिलीo रस गुनगुने या सामान्य जल में मिलाकर सेवन करें। आँवला  या एलोवेरा रस का एक साथ मिलाकर सेवन करने से गैस कब्ज व इंडाइजेशन आदि रोगों में विशेष लाभ होता है। आँवला रस शाम खाने के बाद भी सेवन कर सकते हैं।

शास्त्रीय योग

दिव्य शिलाजीत सत् Divya Shilaajeet Sat

मुख्य द्रव्य स्त्रोत: यह हिमालय की ऊँची पर्वतमालाओं से स्त्रावित होने वाला एक द्रव्य रस है, जिसमें प्राकृतिक रूप में ही सोना, चाँदी, लोहा आदि सप्त धातुओं का सूक्ष्म मिश्रण होता है।

मुख्य गुणधर्म:

शिलाजीत की प्रशंसा करते हुये शास्त्रों में लिखा है-

सोयस्ति रोगो भुवि साध्यरूपः शिलाहयं यत्न जयते प्रस्ह”

अर्थात इस संसार में रस, धातु आदि की विकृति से पैदा हुआ ऐसा एक रोग नहीं है, जो शिलाजीत के सेवन से नष्ट न हो सके।

  1. देह को निरोग और सुदृढ़ बनाने के लिए शिलाजीत सर्वोत्तम रसायन है। यह सर्व प्रकार के जीर्ण, दुःखदायी रोग, मेदवृद्धि, मधुमेह व उससे आयी हुई अशक्तता को दूर करके शरीर को शक्तिसम्पन्न व कान्तियुक्त बनाता है।
  2. यह गठिया, सर्वाइकल स्पोंडलाइटिस, सियाटिका, कमर दर्द, घुटनों का दर्द, कम्पवात, शोध, जोड़ों का दर्द आदि सभी प्रकार के दर्दों को दूर करता है।
  3. सर्दी, कफ, नजला, जुकाम, एलर्जी, श्वास, कास, दमा, फेफड़ों की कमजोरी, टीo बीo (यक्ष्मा), हड्डियों की कमजोरी, शारीरिक दुर्बलता, धातुरोग, योन शक्ति की कमी, डायबिटीज आदि अनेक रोगों की एक प्रभावशाली औषध है।
  4. सभी स्त्री – पुरुष तथा रोग होने पर बच्चे भी इस औषध का सेवन कर सकते हैं। इससे शरीर के रोग प्रतिरोधक शक्ति (Resistance Power) की वृद्धि होती है।

सेवनविधि मात्रा: Sevnvidhi Volume

1 से 2 बूँद दूध से सुबह शाम लें। गर्मी की ऋतु में इसकी मात्रा मूँग के दाने के बराबर लें क्योंकि आश्रम की शिलाजीत पूर्णतः शुद्ध होती है, अतः अत्यधिक प्रभवशाली है। सर्दी के समय एक या दो चने के बराबर ले सकते हैं। जो दूध नहीं पीते, वे गर्म जल के साथ ही शिलाजीत ले सकते हैं।

दिव्य मुक्ता पिष्टी (o साo o) Divya Mukta Pishti

सेवनविधि मात्रा: Sevnvidhi Volume

1 से 2 रत्ती तक, मक्खन, मलाई, शहद, च्यवनप्राश, गुलकंद आँवले का मुरब्बा, ब्राह्मी शरवत आदि के साथ सेवन करें।

मुख्य गुण धर्म:

  1. मुक्ता पिष्टी रक्तपित्त, कमजोरी, सिर दर्द, पित्त की वृद्धि, दाह, प्रमेह और मूत्रकृच्छु आदि को दूर करती है। मोती शीतवीर्य है।
  2. इसके सेवन से पित्त की तीव्रता और अम्लता तुरंत कम हो जाती है तथा नेत्रों की ज्योति बढ़ती है। मूत्रमार्ग एवं सर्वांग के दाह और पित्त वृद्धि को रोकती है। ह्रदय की बढ़ी हुई धड़कन एवं अनिद्रा रोग में मोतीपिष्टी से विशेष लाभ होता है। अति क्रोध, अति जागरण, ज्यादा पढ़ने, विशेष रूप से धूप में घूमने, पैत्तिक पदार्थों के सेवन से मस्तिष्क की शिराओं में आघात पहुँचकर सिर घूमने लगता है। निद्रा का अभाव, बोलने में कठोरता, चिड़चिड़ापन, दिमाग में गर्मी बढ़ जाना, कुछ अच्छा न लगना आदि में मुक्तापिष्टी के सेवन से शीघ्र लाभ मिलता है।
  3. गर्मी के दिनों में कड़ी धूप में घूमने – फिरने या अग्नि के पास ज्यादा देर काम करने से, नाक, मुँह तथा गुदामार्ग से रक्त गिरने लगता है। साथ ही कपाल, नेत्र तथा सर्वांग में दाह होने लगता है। रोगी बेचें हो जाता है। ऐसे लक्षणों में मुक्तापिष्टी का सेवन अतिलाभकारी है।
  4. पित्तजन्य क्षय में जब दाह, ज्यादा प्यास, बुखार, बेचैनी आदि लक्षण हों तो मुक्तापिष्टी का सेवन लाभदायक है। अम्लपित्त में जब कंठ में जलन हो, गर्मी के साथ खट्टी डकारें आती हों तो मुक्तापिष्ठी तुरंत लाभ पहुँचाती है।

दिव्य स्वर्ण भस्म (o o) Divya Swran Bhasm

मुख्य गुणधर्म:

  1. सोना एक श्रेष्ठतम धातु है। अतः उससे प्राप्त भस्म भी शारीरिक और मानसिक विकृतियों का शमन करने में बहुत महत्वपूर्ण है। इसके सेवन से प्रायः सभी रोगों में चमत्कारिक लाभ होता है। परन्तु राजयक्ष्मा, संग्रहणी, जीर्णज्वर, स्नायु दौबर्ल्य, नपुसंकता आदि व्याधियाँ स्वर्ण भस्म के बिना ठीक होनी मुश्किल होती है।
  2. स्वर्णघटित औषधियों विषविकार, निर्बलता, धातुक्षीणता, अत्यंत विकृत गठिया, काला ज्वर, मलेरिया आदि से पीड़ित व अत्यंत क्षीण अवस्था को प्राप्त रोगी, जो अन्य किसी औषधि से ठीक न हो रहा हो, स्वर्णघटित औषधियों के प्रयोग से ठीक हो जाता है।
  3. स्वर्ण भस्म तेजस्वी होते हुए भी सौम्य पदार्थ है। यह दूषित रक्त को शुद्ध कर हृदय को पुष्ट करते हुए मस्तिष्क, स्नायु मंडल, मुत्रपिंड और शरीर के अन्य अंगो पर एक प्रकार का स्फूर्तिदायक प्रभाव डालता है, जिससे शरीर की अोज कांति बढ़ती है। शरीर में नूतन चेतना व मन में उमंग पैदा होती है। यह शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता की वृद्धि कर, बढ़े हुए विजातीय तत्व को समाप्त करती है।

दिव्य च्यवनप्राश (भैo o) Divya Chywanprash

सेवनविधि मात्रा: Sevnvidhi Volume

एक से दो चम्मच अर्थात डेढ़ से ढाई तोला, दिन में दो बार खाएँ। दूध आधे घंटे बाद पीये।

मुख्य गुणधर्म:

  1. च्यवनप्राश केवल रोगियों के लिए ही नहीं बल्कि स्वस्थ मनुष्य के लिए भी उत्तम रसायन है।
  2. किसी भी कारण से उत्पन्न शारीरिक और मानसिक दुर्बलता को दूर कर फेफड़ों को मजबूत करता है, व दिल को ताकत देता है। खाँसी, कफ को दूर कर शरीर को हृष्ट – पुष्ट बना देता है।
  3. यह रस रक्तादि सातो धातुओं को पुष्ट करके बल, वीर्य, कांति, शक्ति और बुद्धि को बढ़ाता है।
  4. इसका सेवन बच्चे, स्त्री – पुरुष व वृद्धजन सभी समान रूप से कर सकते हैं।

दिव्य चंद्रप्रभा वटी (भैo o) Divya Chandraprabha Vati

सेवनविधि मात्रा: Sevnvidhi Volume

1 – 1 या 2 – 2 गोली दिन में दो या तीन बार गर्म जल या गर्म दूध  खाने के बाद अथवा रोगी की आवश्यकता के अनुसार अन्य औषधियों के साथ सेवन करें।

मुख्य गुणधर्म:

  1. यह मूत्रनिद्रय व गर्भाशयगत दोष और वीर्य विकारों की सुप्रसिद्ध औषध है।
  2. चंद्रप्रभा वटी मूत्रकृच्छु (प्रोस्टेट), मूत्राघात, जोड़ों का दर्द, गठिया सर्वाइकल स्पोंडलाइटिस, सियाटिका, कमजोरी, पथरी, सर्वप्रमेह, भगंदर, अण्डवृद्धि, पीलिया, कामला, अर्श, कटिशूल आदि विकारों को नष्ट करके शरीर के जल को बढाती तथा पोषण करती है।
  3. यह बलवर्धक, पोषण तथा कांतिवर्धक है। प्रमेह और उससे पैदा हुये उपद्रवों पर इसका धीरे – धीरे स्थायी प्रभाव होता है। सुजाक, आतशक आदि के कारण वीर्य में जो विकार उत्पन्न होते हैं, उन्हें यह नष्ट कर देती है। अधिक शुक्र क्षरण या रजः स्त्राव हो जाने से पुरुष – स्त्री दोनों की शारीरिक कांति नष्ट हो जाती है। शरीर कमजोर होना, शरीर का रंग पीला पड़ जाना, मंदाग्नि, थोड़े परिश्रम से हाँफना, आँखे अंदर धंस जाना, भूख खुलकर न लगना आदि विकारों में चंद्रप्रभावटी के सेवन से रक्तादि धातुओं की पुष्टि होती है, वायु का शमन होता है तथा शरीर पुष्ट होकर कांतिवान एवं ओजपूर्ण हो जाता है।

दिव्य वसंतकुसुमाकर रस(भैo o) Vsntkusumakr Divya Juice

सेवनविधि मात्रा: Sevnvidhi Volume

1 से 2 रत्ती तक मक्खन, मलाई, शहद या दूध के साथ सुबह – शाम सेवन करें।

मुख्य गुणधर्म:

  1. यह हृदय को बल देने वाला शक्तिवर्धक, बहुमूत्र, हर प्रकार के प्रमेह, सोमरोग, श्वेतप्रदर, योनि तथा गर्भाशय की शराबी, वीर्य का पतला होना या गिरना तथा वीर्य सम्बन्धी सभी शिकायतों को दूर करने वाला उत्तम तथा अदभूत रसायन है। वीर्य की कमी से उत्पन्न क्षय रोग की यह बहुमूल्य दवा है।
  2. इसके सेवन से हृदय एवं फेफड़ों की कमजोरी, शूल तथा दिमागी कमजोरी, भ्र्म, यादाश्त की कमी, नींद न आना, जीर्ण, रक्तपित्त, कफ, खाँसी, श्वास, संग्रहणी, रक्तप्रदर, श्वेतप्रदर, खून की कमी और बुढ़ापे में रोग निवृत्ति के बाद की कमजोरी दूर होती है।
  3. मधुमेह रोग की यह प्रसिद्ध औषधि है।

दिव्य बादाम पाक (o o साo सिo प्रo संo) Divya Badam Paak

सेवनविधि मात्रा: Sevnvidhi Volume

1 से 2 तोला तक गोदुग्ध या जल के साथ प्रातः व सायं सेवन करें।

मुख्य गुणधर्म:

  1. बादाम पाक एक पौष्टिक रसायन है। इसके सेवन दिमाग एवं हृदय की दुबर्लता, पित्त – विकार, नेत्र रोग दूर होते हैं।
  2. सिर दर्द के लिये यह चमत्कारिक औषधि है। दिमागी काम करने वालों को इसका सेवन अवश्य करना चाहिये।
  3. इसके सेवन से शरीर पुष्ट होता है। यह बल वीर्य और अोज की वृद्धि करता है। ध्वजभंग, नपुंसकता, स्नायु दौर्बल्य में इसका सेवन अतीव लाभकारी है।
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