जब दिल टूटते हैं। प्रेम, नफ़रत, वासना और आनंद यह सब मानव जीवन के ऐसे साथी हैं।

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जब दिल टूटते हैं

प्रेम, नफ़रत, वासना और आनंद यह सब मानव जीवन के ऐसे साथी हैं जिन्हें हज़ार प्रयत्न करने पर भी हम अपने जीवन से अलग नहीं कर सकते। इस विषय में आपको पिछले पृष्ठों में काफ़ी विस्तार से बताया जा चुका है।

जब दिल टूट जाता है तो मानव अपने टूटे हुए दिल के टुकड़ों को लोगों के आगे रखना चाहता है। अपने दुःखों को लोगों के सामने रखना चाहता है। वह लोगों से यह कहना चाहता है – “देखो ! मैं कितना दुःखी इंसान हूँ। कितना मजबूर और बेसहारा हूँ।”

“अब प्रश्न यह उठता है कि क्या ऐसा करने से लोगों की सहानुभूति प्राप्त हो जाती है? क्या यह सब कहने से लोग उससे प्रेम करने लगेंगे?”

यह याद रखें कि अक्सर लोगों की सहानुभूति केवल शब्दों और बातों तक ही सीमित होती है।

वैसे टूटे दिल वाला मानव इस दिखावे की सहानुभूति की आशा नहीं रखता। वह तो चाहता है कि लोग उससे एक मासूम बच्चे की भाँति प्रेम करें। कई लोग तो इसके लिए जान – बूझकर रोगी बन जाते हैं ताकि लोग उससे सहानुभूति रखें और प्रेम करें।

इस विषय मेँ डॉo फ्राइड (Dr. Fried) एक घटना को इस प्रकार से सुनाते हैं – एक बार एक आदमी ने हिप्नोटिज्म के डॉक्टर को बताया कि उसकी पत्नी लम्बे समय से फालिज रोग का शिकार है। उसके उपचार में कहीं कोई कमी नहीं रखी गई परन्तु उसका रोग ठीक नहीं हो सका। मुझे तो ऐसा लगता है कि उसकी टाँगे पूरी तरह से ठीक हैं। परन्तु जैसे ही वह अपनी टाँगो पर बोझ डालने का प्रयास करती है तो उससे एक कदम भी नहीं चला जाता।

“फिर आप दूसरी शादी क्यों नहीं कर लेते?” डॉक्टर ने उसे सलाह दी। इस बात के पीछे उस आदमी के मन की बात जानने की भावना काम कर रही थी।

“नहीं, डॉक्टर साहब! इस हालत में उसे छोड़कर दूसरी शादी करना अन्याय होगा।”

“अच्छा …. अच्छा। यदि वह ठीक होती तो आप दूसरी शादी कर ही लेते।” डॉ ने फिर एक तीर फेंका।

“हो सकता है।” उसने ठंडे मन से उत्तर दिया।

“वाह, वाह क्या मजे की बात है। जब आपको एक साथी की आवश्यकता है तो आपको अपनी पत्नी से सहनुभूति पैदा हो गई और यदि वह ठीक हो जाएगी गो आप दूसरी शादी करने को तैयार हो जाएँगे।” डॉक्टर ने उसे और कुरेदा।

“डॉक्टर साहब! असल में बात यह है कि मेरी सदी को दस वर्ष हो गए। दो साल पहले मैंने संतान प्राप्ति के लिए दूसरी शादी की इच्छा प्रकट की और इस बारे में अपनी पत्नी से भी बात की थी। उसने बड़ी खुशी से मुझे शादी करने की अनुमति दे दी क्योंकि वह इस बात को अच्छी तरह से जान चुकी थी कि वह अब माँ नहीं बन सकती। यह भी भाग्य की एक विडम्बना थी कि इसके एक सप्ताह के पश्चात उसे बुखार आने लगा था। बुखार के पश्चात उस पर फ़ाज़िल गिर गया। उसकी यह हालत देखकर मैं दूसरी शादी की बात सोच भी नहीं सकता। हालाँकि वह बराबर मुझसे कह रही है कि तुम मेरी चिंता मत करो। तुम दूसरी शादी कर लो। प्रकृति ने जो किया है वह अच्छा है। तुम अपना जीवन क्यों ख़राब कर रहे हो? बस हर समय वह सही कहती रहती है।

इस कहानी से असली रोग तो समझ में आ गया था। अब देखना चाहता था। डॉक्टर ने उस औरत के रोग की पूरी तरह से जाँच पड़ताल की तो इससे पता चला कि फ़ाज़िल का प्रभाव इतना अधिक नहीं है। अभी तो इसको ठीक किया जा सकता है।

डॉक्टर ने उस औरत का उपचार शुरू किया तो कुछ दिन के पश्चात उसका रोग ठीक हो गया। डॉक्टर के सामने जो केस था उसे पता था कि यह झूठ और हेरा – फेरी का ही एक नमूना है। वह सब कुछ जानते हुए भी खामोश रहा। उन दोनों पति – पत्नी से वह क्या कह सकता था। डॉक्टर ने अपने मन में विचार बना लिया कि इस औरत पर हिप्नोटिज्म किया जाए। इसके लिए डॉक्टर ने उस औरत पूछा तो उसने हँसी -ख़ुशी इस बात की अनुमति दे दी।

डॉक्टर ने उस रोगी  को हिप्नोटाइज (Hypnotism) किया तो उसने डॉक्टर को भी धोखा देने की तैयारी करके झूठ मूठ ही अपने आपके रंग में रंग लिया क्योंकि उसने हिप्नोटिज्म (Hypnotism) विद्या पर कई पुस्तकें पढ़ी थी। उसे इस बात का पता था कि डॉक्टर उसके मन का भेद ले लेगा। इसलिए उसने झूठ – मूठ का नाटक किया  डॉक्टर के सामने हिप्नोटाइज (Hypnotism) होने का नाटक करने लगी।

डॉक्टर भी कोई गुरु नहीं था। उसने उस औरत के अंदर की बात जान ली थी। उसके इस षड्यंत्र का भाँडा फोड़ करने के लिए वह माचिस की एक तिल्ली जलाकर उसके शरीर के निकट ले गया। कुछ देर तक उस औरत ने आग को सहन करने का प्रयास किया लेकिन कब तक ……? आखिर आग तो आग है। अंत में उसने चीख मारकर आग को दूर फ़ेंक दिया।

डॉक्टर हँस रहा था। उसका नाटक समाप्त हो गया था। वह वहाँ से चुपचाप उठकर चला आया और उसके पति से कहा कि –“मैं आपकी पत्नी से एकांत में कुछ बातें करना चाहता हूँ।”

“ठीक है। आप ऐसा कर सकते हैं।”

दूसरे दिन जब डॉक्टर उस औरत के पास एकांत में गया तो वह उसे देखते ही फूट – फूटकर रोने लगी। डॉक्टर चुपचाप उसे देखता रहा। जब वह अपना रोना समाप्त कर चुकी तो डॉक्टर ने उससे कहा – “देखो श्रीमती जी इस रोने से कहीं अच्छा यह नहीं कि आप अपने पति से तलाक लेकर दूसरी शादी कर लें।”

“डॉक्टर साहब! इस आयु में क्या मुझे कोई अच्छा पति मिल सकता है?”

“आप जो फाजिल रोग का नाटक कर रही हैं इसके क्या लाभ होने वाला है? क्या आपको इस बात से नहीं लगता कि एक दिन आपके इस नाटक का अंत हो जाएगा।”

“नहीं, मुझे ऐसा कोई डर नहीं। मैं इस पहियों वाली कुर्सी पर बैठकर अपनी कोठी के बगीचे में घूमकर अपने मन का बोझ हल्का कर लिया करती हूँ। इस बीमारी के धोखे के कारण मुझे बहुत बड़ा लाभ हुआ है।”

“क्या लाभ हुआ है?”

“यही कि मेरा पति अब मुझसे बहुत प्रेम करने लगा है। उसने दूसरी शादी का ख्याल ही अपने मन से निकाल दिया है।”

“श्रीमती जी! असल में आपके पति को आपसे प्रेम नहीं हुआ बल्कि हमदर्दी हो गई है।”

चलो हमदर्दी ही सही। अब मेरा मन तो प्रसन्न रहता है।” वह यह कहती हुई वह एक बार फिर रोने लगी। डॉक्टर ने उसे रोते हुए देखकर बड़े प्यार से समझाया  – “देखो, आप किसी प्रकार की चिंता न करो। मैं आपके पति से कुछ भी नहीं कहूँगा। मैं आपके सुखी जीवन को दुःखी नहीं करना चाहता। मैं आप दोनों को खुश देखने के लिए आपका उपचार करता रहूँगा बस।

“धन्यवाद डॉक्टर साहब! आपका बहुत – बहुत धन्यवाद।” यह कहकर वह हँस पड़ी।

“श्रीमती जी! यदि बुरा न माने तो मैं आपसे एक बात पूँछू कि आपको यह सुझा कैसे?”

यह सब था एक टूटे हुए दिल का सच्चा किस्सा जिसने अपने मन की भावना के सहारे अपने गृहस्थी के संसार को उजड़ने से बचा लिया। जब टूटे हुए दिल प्रेम को पाने के लिए मन की गहराइयों से प्रयास करते हैं तो फिर बीमारियाँ भी दूर हो जाती हैं।

असल रोग तो दिल के दर्द के कारण ही शुरू होते हैं। पेट दर्द, पेट में रसोली, पाचन शक्ति का ख़राब होना इनमें से तो अधिकतर रोगी टूटे दिल वाले ही होते हैं। यदि इन टूटे हुए दिल वाले लोगों को कोई सहारा दे दें तो वे इन रोगों से बच सकते हैं। डॉo आरनोल्ड (Dr. Arnold) लिखते हैं कि -एक बुजुर्ग आदमी मेरे पास पेट के अंदर रसोली के रोग का उपचार करवाने आए। पिछले तीस वर्षो से उसके पेट में दर्द होता चला आ रहा था। यानि उसकी पूरी जवानी ही इस पेट के दर्द में गुजर गई थी। मैंने उस रोगी से पूछा

“भाई! अब तुम अच्छे होकर क्या करोगे?”

“कैसी ख़ुशी की आशा रखते हो तुम?”

“जो एक लम्बे दुःख सहन करने के बाद प्राप्त होती है।”

उसने अपने जीवन के बारे में कुछ विशेष नहीं बताया। उसके पास अपने भविष्य के लिए कुछ भी तो नहीं था। वह नहीं जानता था कि उसे क्या करना है। वह तीस साल तक नौकरी करता रहा। अपने दफ्तर में वह परिश्रमी होने के प्रसिद्ध था। वह तो बीमारी में भी कभी छुट्टी नहीं करता था। यही कारण था के सारे दफ़्तर के लोग उसके काम की प्रशंसा किया करते थे।

वह अपनी इस प्रशंसा को खोना नहीं चाहता था इसलिए उसने अपने पेट के रोग को दबाए रखा।

“यह कल्पना कैसी है?”

हम लोग केवल अपनी प्रशंसा को प्राप्त करने के लिए अपने दुःखों को भी अंदर ही अंदर दबाए रखते हैं। मन की खुशियाँ हमारे जीवन की खुराक का काम करती हैं।