स्वदेशी की प्रांसिगकता स्वदेशी का मतलब है देश को आत्मनिर्भर बनाने की प्रबल भावना।

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All Over India Strong Sense of Making The Self Country

वर्तमान समय में चकाचौन्ध वाले विज्ञापनों एवम आपसी होड़ तथा विभिन्न बड़ी विदेशी कंपनियों के पैसों के परिणाम स्वरूप टीवी चैनलों के माध्यम से दिखाए जा रहे प्रायोजित नाटकों के चलते हम वैश्विक उपभोक्तावाद के चंगुल में फंसतें जा रहे हैं। भारतीयों की सरल प्रवृति इन माध्यमों से परोसे जा रहे मीठे जहर से हमारी स्वदेशी संस्कृति व सामाजिक ताने-बाने को नुक्सान पहुंचा रही है। यह अपने ही पैर पर कुलहाड़ी मारने वाली कहावत को चरितार्थ कर रहे है। सबसे बड़ी बात यह है कि ऐसा सब कुछ करते हुए हमें इसका आभास तक नही हो रहा है। टी.वी. के विज्ञापन अबोध बचपन को माता-पिता के आदर की शिक्षा देने के स्थान पर उनका सम्मान कम करने जैसे कार्यों की ओर अग्रसर कर रहे हैं। बच्चों में स्वतन्त्रता की प्रवृति ऐसे डाली जा रही है कि अब बच्चे अपने बड़ों को यह कहने में भी शर्म महसूस नही करते कि आप अपना काम करो, मेरे कामों में दखल मत दो। यदि बच्चों से यह पूछा जाए कि तुम्हारे कितने अंक आये हैं तो वह अपने परिजनो से यह भी पूछ सकते हैं कि आपके कितने आये थे? इस प्रकार का माहौल भी बनाया जा रहा है। 

अलग-अलग कमरों में टी.वी. एवम प्राइवेट कमरे और प्राइवेसी के नाम पर बच्चों के स्टडी-रूम व उस स्टडी रूम में विकसित इलेक्ट्रॉनिक्स माध्यमों जैसे टी.वी. कंप्यूटर, लैपटॉप, टेबलेट, स्मार्टफोन व इन्टरनेट के माध्यम से अश्लीलता सहजता व सरलता से परोसी जा रही है। ऐसे समय में हमारे सांस्कृतिक व सामाजिक मूल्यों को बचाने के लिए परिवार ही सशक्त है और संत्जिक विघटन से बचने के लिए स्वदेशी सांस्कृतिक मूल्य प्रांसगिक हैं।

स्वदेशी की प्रासंगिकता इसीलिए और बढ़ जाती है कि हमें युवा भारत को विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था आधारित प्रारूप की ओर बढ़ाना होगा जिससे भारत के घरेलु उद्योग, कुटीर उद्योग व लघु उद्योगों को बढ़ावा, मिले। जिसका मूल्य ढांचा स्वदेशी आधारित हो और इनसे रोजगार का सृजन हो इसमें श्रम भी अपना होगा, सामान भी अपना होगा और स्वामित्व भी अपना होगा और इस तरह जो उत्पादन होगा वह भारत का भारतोयन द्धारा होगा। ऑनलाइन शॉपिंग के माध्यम से युआवों में बड़ी-बड़ी कंपनियां ब्रांडेड का नया शौक व स्टेटस सिम्बल बना हमारे खुदरा व्यापार को नुकसान पहुंचा रही है। यही कारण है कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य से सामाजिक, सांस्कृतिक व आर्थिक क्षेत्र में स्वदेशी की प्रांसगिकता है।

“स्वदेशी वह भावना है जो हमें दूर-दराज की बजाय अपने आस-पास के परिवेश के ही उपयोग एवम सेवा की ओर ले जाती है। आर्थिक क्षेत्र में मुझे निकट-पड़ोसियों द्धारा उत्पादित वस्तुओं का ही उपयोग करना चाहिए और यदि उन उद्योग-धन्धों में कहीं कोई कमी हो तो मुझे उन्हें ज्यादा सम्पूर्ण और सक्षम बनाकर सेवा करनी चाहिए। मुझे लगता है कि यदि ऐसे स्वदेशी-विचार को व्यवहार में उतारा जाए तो इससे सवर्ण युग की अवतारणा हो सकती है। (महात्मा गाँधी – मद्रास में स्वदेशी पर दिए गए भाषण का अंश, 14 फरवरी, 1916)

“यह मानना भूल है कि स्वदेशी का संबन्ध केवल वस्तुओं या सेवाओं से है। स्वदेशी का मतलब है देश को आत्मनिर्भर बनाने की प्रबल भावना, राष्ट्र की सार्वभौमिकता स्वतंत्रता रक्षा की भावना। स्वदेशी की धारणा माने देशभक्ति का अविष्कार है किन्तु इतना बोलने से यह प्रकट नही होती। राष्र्टीय जीवन, व्यव्क्तिगत जीवन के सभी कार्यों में  दर्शन होना चाहिए।” (दंतोपंत ठेंगड़ी, संस्थापक, स्वदेशी जागरण मंच)