पशुओं को खनिज तत्व की कमी से होने वाले कुछ रोग, लक्षण।

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कैल्शियम की कमी से मुख्यतः बच्चे एवं दूध देने वाले पशु प्रभावित होते हैं। छोटे पशुओं में वृद्धि दर में कमी, हड्डियों का कमजोर होकर मुड़ जाना, दुधारू पशुओं में उनके ब्याहने के बाद दुग्ध ज्वर, स्नायु कमजोरी से कंपकंपी होना आदि समस्याएं उत्पन्न होती है। फास्फोरस की कमी से पशुओं में वृद्धि दर में कमी, भूख कम लगना, खाद्य पदार्थों जैसे कपड़ा, चमड़, गोबर, मिट्टी खाने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। पशुओं की इस समस्या को पाईका कहते हैं। पशुओं के प्रजनन व उत्पादन क्षमता में कमी हो जाती है। सोडियम (नमक) की कमी से पशुओं की त्वचा सुखी व चमकहीन हो जाती है। आहार से अरुचि होना और शारीरिक वजन उत्पाद में कमी हो जाती है। लोहे व तांबा  रक्त में हिमोग्लोबिन निर्माण के लिए आवश्यक है। इनकी कमी से रक्ताल्पता हो जाती है। वृद्धि दर में कमी, शरीर पर सूजन आना और कभी-कभी दस्त हो जाते हैं। बांझपन क्यों होता है? 1. शारीरिक सरंचना में गड़बड़ी के कारण: 2. पशु जननांगों का जन्मजात पूर्ण विकास ना होना व उनकी सरचना ठीक ना होना। 3. शारीरिक क्रिया में गड़बड़ी के कारण: अ) शरीर में हार्मोन का असंतुलन। स) वीर्य की गुणवत्ता ठीक ना होना।  द)  कृत्रिम गर्भाधान की प्रक्रिया ठीक से ना होना इत्यादि। 3. पशु पोषण से संबंधित कमियां: अ) चारे में उर्जा व प्रोटीन का अभाव। स)चारे में खनिज लवणों की कमी होना। द) आहार का असंतुलित होना। अन्य: बीमारियों के कारण जैसे कि बच्चेदानी में मवाद, बच्चेदानी के मुंह का सख्त होना या जेर का कुछ भाग बच्चेदानी में रह जाने से भी बांझपन हो सकता है। उपरोक्त में से बीमारी जनित कारणों को पशु चिकित्सकीय परामर्श से ठीक करा सकते हैं। अगर पशु पोषण संबंधी विकार है तो संतुलित आहार देकर पशु की बच्चा पैदा करने की क्षमता को ठीक किया जा सकता है।

हिमाचल के परजीवी जनित रोग Himachal Parasitic Diseases

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परजीवी वह जीव है जो दूसरी जीवधारी पर अपना जीवन व्यतीत करते हैं। यह दो प्रकार के होते हैं शरीर के अंदर रहने वाले अंतः परजीवी कहलाते हैं तथा शरीर की त्वचा पर होनेवाले बाहिया परजीवी कहलाते हैं। 1.अंत: परजीवी जनित रोग: 2.यकृत- फलूक : यह रोग फेसयोला हैप्पीटिका और फैसीओला जैजब्तिक के कारण उत्पन्न होता है। यह दो प्रकार का होता है। तीव्र और चिरकालीन।  तीव्र  दशा में पशु अचानक मर जाता है। नाखूनों पर वक्त मिश्रित झाग आता है तथा गोबर में खून आता है। चिरकालीन दशा में भूख कम हो जाती है जानवर की शक्ति क्षीण होने लगती है। शतेशम कलाएं पीली पड़ जाती है तथा सूजन आ जाती है। त्वचा सूख जाती है। ऊन गिरने लगती है। पशु दुर्लब एवं कृशकाय हो जाता है। अक्सर पशुओं को अतिसार या कब्ज़ हो जाता है। हल्का बुखार रहने लगता है। अंतः पशु की मृत्यु हो जाती है। गाय भैंस में अक्सर कब्ज हो जाती है। गोबर करते समय पशुओं को काफी कष्ट होता है। रोग की तीव्र दशा में पशु को अतिसार हो जाता है तथा पशु कमजोर हो जाता है।

उपचार और बचाव Treatment and Prevention

  1. रोग का संदेह होते ही पशु चिकित्सा अधिकारी से सलाह लेनी चाहिए।
  2. पशुओं को खडड या नदी के आस-पास नहीं चराना चाहिए।
  3. वस्तुओं को साफ पानी पिलाना चाहिए।
  4. पशुओं को घोंघा रहित तलाब अथवा नदी का पानी नहीं पिलाना चाहिए।
  5. घोंघों को नष्ट करने के लिए नीला थोथा का गोल (कॉपर सल्फेट एक से एक लाख) उपयोग कर सकते हैं।
  6. रोगी पशुओं के गोबर को नदी या तालाब के पानी से दूर रखना चाहिए। 
  7. रोगी पशुओं का इलाज करना चाहिए। 

रेफोक्सनाईड 75 मिलीग्राम, किलोग्राम वि.वे. ऑक्सीक्लोजनाईड 1.5 मिलीग्राम किलोग्राम बी. वेट ट्रायकलावेंदजोल, एलंडाजोल 1. आंत के फलूक: यह रोग एम्पीस्टॉक की विभिन्न प्रजातियां में होता है। इसने पशु को अतिसार खून रहित गोबर खून की कमी तथा सूजन जैसे लक्षण आ जाते हैं। पशु में अविकसित फ्लूक पाए जाते हैं। पशु काफी कमजोर हो जाता है तथा बार-बार पानी पीता है। भारी मात्रा में पशुओं की मृत्यु हो जाती है। इस रोग का उपचार एवं बचाव यकृत फलूक जैसा है। यह रोग हिमाचल के पशुओं में भारी संख्या में पाया जाता है। 2. पेट और आंत में गोलकृमि द्वारा जनित रोग: पेट और आंत में गोलाक्रीमी जानवरों में खून की कमी कर देते हैं। यह कृमि आंत को बंद कर देते हैं। कई कृमि पाचक प्रणाली में विकार उत्पन कर देते हैं। पशुओं में अतिसार हो जाता है। पशु बहुत जल्दी कमजोर हो जाते हैं। पशु खाना पीना बंद कर देते हैं। सुस्ती और दुर्लभता के कारण पशु अवसत्र हो जाते हैं। अंत में पशु की मृत्यु हो जाती है। पशु की पूर्ण उत्पाद तथा दूध उत्पादन में भारी कमी आ जाती है।

उपचार और बचाव:- एलबेंडाजोल, क्लोजेटल, आईवरमेकटिन इत्यादि इलाज के काम आते हैं। बचाव में छोटे बच्चों को मां से अलग साफ चरागाह में चढ़ाना चाहिए। पशुओं को पानी के नजदीक लगी खास नहीं खिलानी चाहिए। पशुओं को नियमित रुप से दवाई पिलाने चाहिए। जानवरों के चरागाह बदलने चाहिए। चिडचिड़ा बुखार: यह छोटी उम्र तथा संकर संतति के पशुओं में अधिक होता है। देशी नस्ल के पशुओं में यह रोग कम पाया जाता है। यह रोग हायलोमा नामक चीचड़ी द्वारा फैलाया जाता है। इस रोग से पशुओं को बुखार (40 से 42 डिग्री सेल्सियस) हो जाता है। आंखों में पानी बहने लगता है, पशु सिर झुका लेता है। इससे लसीका ग्रंथियों व आंख की पलके पलके सूज जाती है। पशु अचानक ही खाना पीना छोड़ देता है। वह काफी सुस्त व कमजोर हो जाता है। शरीर में खून की कमी हो जाती है। पशु 2-3 दिन में मर जाता है।

उपचार और बचाव: Treatment and Prevention

वुपारवाकोन, परवकोन, ऑक्सीटटेरासाईक्लीन : इस रोग की रोकथाम के लिए चिचड़ीओ  के नष्ट करना आवश्यक है। 

  1. पशुशाला के चारों ओर बढ़ी हुई घास-फूस को जला देना चाहिए।
  2. पशुशाला में गड्ढे तथा दीवारों की दरारों को भर देना चाहिए।
  3. पशुशाला के आसपास घास नहीं जमा करना चाहिए।
  4. जमीन को वखेरने से चिड़ियों के अंडे और बच्चे धूप की तेजी से मर जाते हैं।
  5. कीटनाशक दवाओं का प्रयोग करना चाहिए।
  6. ववेसियोसिस:-  यह रोग पशुओं में लाल पेशाब नामक रोग से जाना जाता है। यह रोग छोटी आयु के पशुओं की अपेक्षा बड़ी आयु के पशुओं में प्रयोग अधिक होता है। रोटी पशुओं को ज्वर आने लगता है। शरीर का तापमान बढ़ जाता है, शरीर में रक्त की कमी हो जाती है और पशुओं को एनीमिया हो जाता है।  पशुओं के मूत्र में हिमोग्लोबिन के कण आने लगते हैं जिससे मूत्र लाल रंग का हो जाता है। प्रारंभ में पशुओं को दस्त आते हैं और बाद में कब्ज हो जाती है। बीमार पशुओं की प्राय: मृत्यु हो जाती है और जो बच जाते हैं वह बहुत कमजोर हो जाते हैं।

उपचार और बचाव: Treatment and Prevention

बेरिलिन, पयर्वान, ववेसेन इत्यादि। रोकथाम:- पशु को किलनी रहित पशुशाला में रखा जाए। किलनी नाशक दवाइयों का प्रयोग, पशुओं का चरागाह बदलना चाहिए। विदेशी नस्ल के पशुओं को स्वदेशी नस्ल के पशुओं से अलग रखना चाहिए। 1. बाहि: परजीवी जनित रोग: यह पशुओं के स्वस्थ एवं उत्पादन पर बुरा प्रभाव डालते हैं। यह परजीवी चार प्रकार के होते हैं। 1. किलिंया: यह तीन प्रकार से हानि करते हैं अ) दवा द्वारा क्षति पहुंचा कर जिसके कारण पशुओं पर मक्खियां आक्रमण करती हैं और वहां पर कीड़े पड़ जाते हैं जिससे खाल की कीमत कम हो जाती है। ब) रक्त चूसकर पशु में रक्त की कमी कर देते हैं। स) कीलनिया अन्य प्रकार के विषाणु, जीवाणु, रिकीटसिया एवं प्रोटोजोआ रोग संचारित करते हैं। जूँ:- जब किसी पशु के शरीर में बहुत ज्यादा जुएं हो जाती है तो वह बहुत परेशान हो जाता है। वह जुओं के कारण होने वाली खुजली को मिटाने के लिए अपने शरीर को रगड़ता है जिससे त्वचा खराब हो जाती है और पपडिया पड़ जाती है दूध की उत्पादन क्षमता कम हो जाती है। माइटल:- अनेक प्रकार के छिद्र बनाकर पशुओं की त्वचा में प्रवेश कर जाते हैं तथा खाज व खुजली उत्पन्न करते हैं। वे प्राय: पतले तथा अल्प वाले वालों भागो पर जैसे टांग के भीतर भागो पर पाए जाते हैं। खाज विभिन्न प्रकार की होती है जिससे सेरोंस्टिक्स, सरकोटिपिक और दिमोडक्वीव मुख्य है। पिस्सू: पिस्सू के काटने से जानवर में खाज तथा अनार्थिक रियेक्शन हो जाता है।

रोकथाम Prevention

  1. एक पशुशाला में पड़ी घास को जलाना।
  2. पशुशाला में घास इत्यादि को जमाना करना।
  3. पशुशाला में गड्ढे तथा दीवारों की दरारें भरना।
  4. जमीन को बिखेरना जिससे किलनियों के अंडे तथा बच्चे मर जाते हैं।
  5. पशुओं को जहां चीचचिड़िया रहती है वहां से कुछ समय के लिए हटा देना चाहिए ताकि उनके बच्चे तथा अण्डे नष्ट हो जाए।

तिपाई विधि: साइलेज: जब पर्याप्त नमी वाले चारे को हवा की अनुपस्थिति में किसी गड्ढे या बुर्जी में दबा दिया जाता है तो किण्वन से उत्पन्न पदार्थ को साइलेंज या संहरित चारा कहते हैं। साइलेज बनाने योग्य फसलें: ज्वार, मक्का, गिन्नी, सूडान, सीटेरिया तथा घासनियों की घास का अच्छा साइलेज बनता है। साइलेज अकेले घास अथवा उन्हें मिश्रण करके बनाई जाती है जिसमें घुलनशील कार्बोहाइड्रेट 8 से 10% के ऊपर होना चाहिए। फलीदार फसलों की दूसरी फसलों के साथ मिलाकर साइलेज बनाना चाहिए।

साइलेज के गड्ढे या विधि: साइलेज जिस गड्ढे में बनाया जाता है उन्हें साइलो कहते हैं। साइलो कई किस्म के होते हैं। जैस टावर, साइलो, ट्रेनच, बंकर साइलो इत्यादि। ग्रामीण क्षेत्रों में जमीन के नीचे गोलाकार साइलों सस्ते बनते हैं।

– एक हरे चारे को (65 प्रतिशत नमी हो) 2 से 5 सेंटीमीटर के टुकड़ों में कुट्टी कर ले।

– काटे गए चारे को अच्छी तरह दबाते हुए गड्ढे में भरे ताकि हवा की मात्रा कम से कम रहे। 

– गड्ढे के मुंह से 1 मीटर ऊंचाई तक चारा भरें।

–  भरे हुए गड्ढो की ऊपरी स्तर पर मोटी घास की एक परत बिछाकर बरसाती झिल्ली से ढक दें और उसके ऊपर मिट्टी की 18 से 20 सेंटीमीटर बिछाकर उसके ऊपर गोबर व चिकनी मिट्टी का लेप लगा देना चाहिए।

– साइलेज 45 से 60  दिनों में पशु को खिलाने योग्य हो जाता है। इसके बाद गड्ढे को एक तरफ से खोलकर मिट्टी व पॉलीथीन कवर को हटाकर आवश्यकता अनुसार सइलिज की परतों को सीधा निकाल लेना चाहिए और गड्ढे को फिर ढक देना चाहिए।

– साइलेज को पहले थोड़ी मात्रा में खिलाना प्रारंभ कर धीरे-धीरे मात्रा बढ़ाएं और इसे हरे चारे की कमी के समय खिलाना चाहिए।

– अच्छी बनी साइलेज का रंग चमकदार पीला हरा या बादामी हरा होना चाहिए और इससे अमलीय सुगंध होनी चाहिए।

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