आपके रोग का कारण कहीं ये तो नहीं है ?

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आयुर्वेद क्या है ? (What is Ayurveda?)

आयुर्वेद केवल अौषध-विज्ञानं ही नहीं, अपितु जागरूकतापूर्वक जीवन जीने का सिद्धान्त भी है। इसीलिए महर्षि चरक कहते हैं-



‘त्रय: उपष्टम्भा आहार-निद्रा-ब्रह्मचर्यमिति। ‘

हमारे आहार एवं विचार का दर्पण है – हमारा शरीर । अत : जीवन में चिन्मय  अर्थात चैतन्य से पूर्ण  स्वास्थ्य के लिए अपनी मूल प्रकृति ब्रह्मचर्य (सर्वविध सयंम) का पालन करते  हुए सदा स्वस्थ्य व आनन्दमय जीवन जीएं।

आपके रोग का कारण कहीं ये तो नहीं है ? (It Is Not Somewhere You Cause Disease?)

  1. भूख नहोने पर भी खाना तथा बिना चबाए जल्दी-जल्दी खाना।
  2. भूख से अधिक खाना तथा बार- बार खाना ।
  3. प्रकृति से प्रतिकूल आहार का सेवन।
  4. रसना के वशीभूत होकर चटपटे पदार्थ, चाय ,कॉफी ,चीनी ,ब्रेड ,पावरोटी तथा संश्लेषित आहार आदि का अत्यधिक सेवन करना ।
  5. उत्तेजना , शौक ,क्रोध ,चिंन्ता, घृणा तथा तनाव की स्थिति में भोजन करना ।
  6. रात्रि को देर से सोना तथा प्रात: देरी से उठना।
  7. शारीरिक श्रम का आभाव तथा असंयमित जीवन ।
  8. मांस , मदिरा तम्बाकू आदि अभक्ष्य पदार्थों का सेवन करना। आयुर्वेद की ऋषि परम्परा में नई क्रान्ति के सूत्रधार

वर्तमान  समय  (Current Time) में अनेक रोग इस प्रकार के हैं, जिनके निवारण के लिए  एलोपैथिक चिकित्सा (Allopathic Medicine) पद्धति सफल नहीं है । वैज्ञानिक अन्वेषणों के अनन्तर भी बहुत से रोगों की चिकित्सा अब तक फलीभूत नहीं हो सकी है अौर  असाध्य समझी जाती है । अभी तक जो चिकित्सा विधाएँ प्रचलित हो सकी हैं, वे केवल बाह्य लक्षणों वेदना आदि का उपशमन मात्र करती हैं । रोग को मूल से विनिष्ट नहीं करती हैं । रोग को मूल से विनष्ट करती हैं । ये लक्षण शान्त होने  के पश्चात पुन: जागृत हो जाते हैं । मधुमेह, (Diabetes) रूमेटिक -संधिशोथ, (Rheumatic – Sandhisoth) गठिया (आमवात व संधिवात ), माईग्रेन, (Maigren) सर्वाइकल  स्पोंडलाइटिस, (Cervical Spondlaitis) अस्थमा, (Asthma) कैंसर आदि रोग इसी कोटि में रखे जाते हैं। स्नायुगत रोग, हृदय रोग अपस्मार आदि मानसिक रोग भी इसी प्रकार के हैं।

इन असाध्य समझे जाने वाले रोगों की आधुनिक चिकित्सा पद्धति (Modern Medicine) में सफल  चिकित्सा न होने पर भी प्राचीन ऋषियों ने रोगों की सफल चिकित्सा का विधान किया था। उन ऋषियों की परम्परा में शास्त्रों के गहन अध्ययन प्रभु की अपार कृपा से आयुर्वेद के उद्धार, विकास व शोध कार्यों के लिये सम्पूर्ण रूप से समर्पित हरिद्धार के कनखल क्षेत्र में गंगा नहर की शाखा पर कृपालु बाग आश्रम में दिव्य योग मंदिर (ट्रस्ट द्धारा संचालित ब्रह्मकल्प चिकित्सालय वर्ष 1995 में स्थापित किया गया था, जहाँ अप्रैल 2006 तक लगभग बीस लाख हरिद्धार के कनखल क्षेत्र में गंगा नहर की शाखा पर कृपालु बाग आश्रम में दिव्य योग मंदिर (ट्रस्ट द्धारा संचालित ब्रह्मकल्प चिकित्सालय वर्ष 1995 में स्थापित किया गया था, जहाँ अप्रैल 2006 तक लगभग बीस लाख रोगियों को सफल योग व चिकित्सा परामर्श दिया जा चूका है। रोगियों को सफल योग व चिकित्सा परामर्श दिया जा चूका है।

अप्रैल 2006  से योग  व आयुर्वेद के कार्यों का विस्तार  करते हुए पतंजलि  योगपीठ  (Patanjali Yogpeeth) परिसर में योग एवं  आयुर्वेद   चिकित्सा  व अनुसंधान  विभाग की स्थापना  की गयी जो निरंतर  वृहद्  स्तर पर योग व आयुर्वेद के क्षेत्र  में चिकित्सा  व अनुसन्धान का कार्य कर रहा है| इस विभाग के अन्तर्गत  विश्व की विशालतम ओ.पी. डी.,  आई. पी. डी  अत्याधुनिक उपकरणों  (Art Equipment) से  सुसज्जित  विशाल  पैथोलॉजी  लैब,  (Pathology Lab) दक्ष  योगाचार्यों  के निर्देशन में  संचालित योग व प्राणायाम की नियमित कक्षा, आधुनिक दन्त चिकित्सा (Modern Dentistry) अनुभाग तथा विश्व की प्राचीन चिकित्षा पद्धति  पर अधारित  पंचकर्म पंचकर्म चिकित्सा अनुभाग अनवरत रूप से सेवा कार्यों में जुटे हुए हैं| वर्ष 1995 मैं ही ही ब्रम्ह्कल्प चिकित्सालय के निकट दिव्य फार्मेसी की स्थापना शुद्ध एव गुणवत्तायुकत उच्च कोटि की आयुर्वेदिक औषधियों (Ayurvedic Medicines) के निर्माण के उदेश्य से की गयी | इसकी अत्याधुनिक सयन्त्रों से सुसज्जित शाखायें ऐ-1, औद्दोगिक क्षेत्र, हरिद्धार (Hridwar) एवं अन्य स्थानों पर स्थापित की गयी हैं, जो विश्व स्तरीय मानकों, जी. एम.  पी., जी. एल. पी. , एवं  आई. एस. वाटिका भी  है, जिसमें चिकित्सा उपयोगी जड़ी-बूटियों को उगाया  जाता है|  यहाँ  अनेक दुर्बल वनस्पतियों  को अन्वेषण कर यत्नपूर्वक उगाया जाता है। वर्तमान में औषध वाटिका का विस्तार पतंजलि योगपीठ (Patanjali Yogpeeth) के निकट ही स्थापित दिव्य नर्सरी के रूप में किया गया है।  आश्रम  द्वार संचालित  मुख्य सेवा प्रकल्पों में यौगिक सेवा प्रकल्प का कार्यभार जहाँ तपोनिष्ठ योगऋषि परम पूज्य  स्वामी श्री रामदेव जी (Mr. Ramdev Ji) महाराज कजे संभल कन्धों पर है,  वहीँ आयुर्वेदिक चिकित्सा एवं अनुसंदन का महत्  कार्य आचर्य श्री बालकृष्ण जी के पावन  सान्निध्य में निष्पन्न हो रहा है।  यहाँ आयुर्वेदिक औषधि (Ayurvedic Medicine) के साथ  योग की वैज्ञानिक क्रियाओं-आसन, प्राणायाम तथा एक्यूप्रेशर का  भी रोगी की आवश्यकता के अनुसार प्रयोगतमक प्रशिक्ष  अहर्निश  सेवा द्वारा कोटि-कोटि जनों के तन-मन के रोगों व पीड़ाओं का हरण करते हुए, उनको स्वस्थ व आनन्दित निरामय जीवन जीने की कला का बोध करने वाले परम श्रद्धेय वंदनीय आचार्य श्री बालकृष्ण जी महाराज विश्व क्षितिज पर आयुर्वेेदिक चिकित्सा जगत के देदीप्यमान नक्षत्र हैं। उन्होंने तप, साधना व निरन्तर अनुसन्धान करके हिमालय की पवित्र जड़ी-बूटियों दवारा विश्व में पहली बार उच्च रक्तचाप जैसे जटिल रोगों के स्थायी उपचार की खोज की है।  शोक  संतप्त मानव की पीड़ा का शमन चिकित्सा के माध्यम से करके  प्राचीन ऋषियों के इस वचन को सार्थक कर रहे हैं-

“कामये दुःखतप्तानां प्रणिनामर्तिनशम्।”

श्रद्धेय आचार्य जी से वर्ष भर में जटिल  रोगों  से पीड़ित व्याक्ति आश्रम में आकर आरोग्य लाभ  प्राप्त करते हैं, जबकि इससे भी अधिक व्यक्ति आश्रम में नियमित ओषधियाँ, पत्राचाराधि के माध्यम से मंगवाकर रोगों से मुक्त हो स्वस्थ्य लाभ करते आ रहे हैं।

पूज्य आचार्य जा जहाँ आयुर्वेद चिकित्सा कार्य में अपना सम्पूर्ण समये समर्पित करके लाखों  साध्य -असाध्य रोगों  मुक्त करने में लगे हुए हैं.