पढ़े अमृतारिष्ट, लोहासव, मसूरिका बुखार, वातज मसूरिका, पितज मसूरिका, कफज मसूरिका।

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अमृतारिष्ट गिलयो 400 ग्राम, दशमूल 400 ग्राम, पानी 500 ग्राम इन सबको मिलाकर आग पर पकायें जब इन का चौथाई भाग रह जाए तो इन्हें नीचे उतार लें। ‘फिर’ 400 ग्राम गुड, काला जीरा 4 ग्राम, पित्त पापड़ा 4 ग्राम सतौना 4 ग्राम सोंठ, 4 ग्राम मिर्च, 4 ग्राम पीपल, 4 ग्राम मोथा, 4 ग्राम नागकेसर, 4 ग्राम कुटकी, 4 ग्राम अतीस, 4 इन्द्रजौ, 4 ग्राम इन्द्रजौ को बारीक़ पीस कर, कवाय में मिलाकर मिटटी के बर्तन में मुँह को बंद करके 1 मास तक धूप में रखें, इसके पश्चात छान कर शीशियां में भर लें। खुराक 1 से 1/2 ग्राम पानी में मिलाकर लाभ – जीर्ण बुखार कमजोरी, सिरदर्द, पेट रोगों के लिए लाभदायक। लोहासव 4 ग्राम लोह चूर्ण, 2 ग्राम त्रिकुटा, 12 ग्राम त्रिफला, 4 ग्राम अजवायन विडिंग, 4 ग्राम मोथा 4 ग्राम, चीता चूर्ण 4 ग्राम, मंधु 7 किलो, गुड 2 किलो पानी 60 किलो। इन सबको इकट्ठा करके किसी चिकने पात्र में पात्र में भरकर उसका मुँह अच्छी तरह से बंद करके 30 दिन तक धूप में रखने के पश्चात छान कर जो रस निकले उसे काम में लाएं। खुराक – बच्चों को 1 ग्राम, बड़ो के लिए 1 1/2  ग्राम दिन में तीन बार। लाभ – जीर्ण बुखार, पाण्डु कामला, शोथ, कास, श्वास, लोहा तथा  भंगहर जैसे रोगों को जड़ से काटता है।

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मसूरिका बुखार (मोती झाल) आम चिन्ह – मोती झाला निकलने से पूर्व बुखार आता है, सारे शरीर में खुजली होने लगती है, भूख नहीं लगती, आँखों का रंग लाल हो जाता है।  वातज मसूरिका काली लाल रूखी, तीन वेदना वाली, कठिन देर में पकने वाली, फुंसी वात विकार से होती है। पितज मसूरिका यह मसूरिका पित्त से पैदा होती है, उसमें अति मोटी, खुजली महावेदना वाली होती है। इस मसरिका में प्यास अधिक लगती है, लाल पीली फुंसी होती है। कफज मसूरिका कफ के प्रकोप  मसूरिका होती है, उसमें सफ़ेद चिकनी अति मोटी खुजली महा वेदना वाली तथा देर से पकने वाली होती है। तीनों दोषों से उत्पन्न मसूरिका जो शरीर के वर्ण के समान रूखी चपटी कुछ एक ऊँची बीच में पिचकी हुई महान वेदना, युकृत दुर्गन्ध वाली प्राण नाशक होती है।

साधाहरण उपचार जैसे मसूरिका होने लक्षण पैदा होने वाले हुएहुए नाम की जड़ी बूटी का स्वरस अथवा चन्दन का कवाय मिलाकर फिर पीएं। 1. पंचमूल रास्ना,आमले खस, घमासा, गिलयो, मोथा, धनिया इनको पीस कर पीने से वाताज मसूरिका नष्ट होती है। 2. पटोल की जड़ का कवाय अथवा पोटल पत्र का कवाय बनाकर इर्ख के स्वरस के साथ पीने से पित्त की मसूरिका नष्ट हो जाता है। 3. अडूस, नागर मोथा, चिरायता, हरड़ बहेड़ा आमला इंद्र जौ जवासा, कड़वा परमल तथा नीम इनका कवाय बनाकर पीने से कफ की मसूरिका शांत हो जाती है। मसूरिका पकने पर कचनार की छाल का कवाय बनाकर पीने से दबी हुई मसूरिका बाहर निकल आती है।

मधुरान्तक वटी मोती की पिष्टी 1 भाग, कस्तूरी 2 भाग, केसर 3 भाग, जावित्री, 4 भाग जायफल 6 भाग, लौंग 6 भाग तुलसी 7 भाग, पत्र 8 भाग, अभ्रक भस्म भस्म 8 भाग। इन सबको कूट पीस कर अदरक के रस में खरल करें फिर फालसे के दाने जैसी गोलियां बना लें। खुराक – बच्चों की 1 गोली बड़ो के लिए 2 गोली इसके प्रयोग से मसूरिका के दाने बाहर निकल जाते हैं।

राज मृगांक पारे की भस्म 3 भाग, सोने की भस्म 1 भाग, ताँबे की भस्म एक भाग शिलाजीत 2 भाग शुद्ध गंधक, 2 भाग शुद्ध हरताल 2 भाग। इन सबको घोट पीसकर एक जान बना लें। इन सबको बकरी के दूध तथा सुहागे को मिल कर एक मिटटी के बर्तन में भर लें, उस बर्तन को सराव सम्पुट करने के पश्चात गजपुट में फुकें। शीतल होने पर सम्पुट खोल कर मिटटी के बर्तन से निकालकर एक ओर किसी शीशी में भर लें। खुराक – बच्चों के लिए 1 छोटी गोली गेहूं के दाने के बराबर बड़ो के लिए 2 से 3 गोली गेहूं के दाने के बराबर उपयोग – हृदय रोग मसूरिका, शीतला, क्षय कास, श्वास, प्रमय रोगों के लिए यह अति उत्तम है। संजीवनी वटीमसूरिका (चेचक, माता)



जैसा कि आपको पहले भी बताया जा चूका है कि संजीवनी वटी हर प्रकार के बुखार के लिए अति उपयोगी है, इसके बारे में एक और अनुभूत योग आपको बताया जा रहा है। 1. पत्थर सरा बूटी की जड़ में पीस कर दिन में दो बार पिलाने से बुखार उतर जाता है, मसूरिका से मुक्ति मिलती है। 2. तुलसी की जड़ को गंगाजल में पीस कर दिन में दो बार, एक – एक चम्मच पिलावें तथा नीम की 7 सीकों से सिर से पांव तक छिड़काव करें तो मसूरिका एवं शीतल शुद्ध होते हैं।

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चेचक के भेद इस रोग की पहचान करने के लिए, सबसे पहले रोगी को बुखार आता है, इस बुखार में उसे कभी सर्दी कभी गर्मी लगती है। इसके पश्चात चेचक के आकार की कुछ फुंसियां से निकलने लगती है जो कुछ ही दिनों में बड़ी बड़ी हो जाती हैं। 7 दिन तक निकलने वाली, इन फुंसियों को शीतल माता कहते हैं। उपचार क्या है  शीतला माता जब अपने पूर्ण रूप में प्रकट हो जाए तो, उपलों  राख नीचे बिछाएं तथा नीम की टहनियों से मक्खियों को भागते रहें, शीतल रोग में शीतला स्थान में रहें और शीतल जल पीते रहें। ठंडे पानी में हल्दी घोल कर पीने से बेचैनी दूर होती है।

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परहेज (बचाब) – शीतला रोगी के पास कोई गन्दी चीज़ नहीं होनी चाहिए और न ही कोई गन्दी स्त्री पास आए, नीम  पत्तों को हर समय शीतल रोगी के पास रखें। रोगी के घर में मांस, शराब तथा अन्य नशीले पदार्थ का प्रयोग नहीं होना चाहिए। गन्दी और अश्लील बातें घर में अथवा रोगी के पास न हों। अतिसार रोग लक्षण क्या होते हैं? रस, जल, पेशाब, स्वेद, मेद, कफ पित्त, रुधिर आदि द्रवधातु जड़ी हुई धातु का शमन कर विष्ठा के साथ मिल कर वायु के बल से गुदा मार्ग से मल रूप होकर प्रवाहित करता है। ‘परन्तु’ जो मल प्रवाहित रूप से अधोमार्ग द्धारा निकलता है उसे अतिसार कहते हैं।

अतिसार रोग की चिकित्सा धनिया, सुगंध वाला जल में औटाकर अर्द्धविशेष रहने पर देने से वह तृषायुक्त आत्मसितार शमन हो। मागर मोथा पित्त पापड़ा, सुगन्ध वाले जल में औटाकर आधा रहने पर पिलाने से दाह व तृषा युक्त अतिसार शमन होता है। पाठादिचूर्ण पाड़, हींग, वच, अजमोद, पीपल, पीपलमूल, चीता, सोंठ, सेंधा नमक इन सबको बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बनाएं। ‘खुराक’ 1 बड़ा चम्मच दिन में तीन बार बड़ो के लिए बड़ा चम्मच दिन में दो बार छोटों के लिए 2. मोच रस लोध, अनार का छिलका, अनार फल इन औषधियों को बारीक़ कूट पीस कर कपड़ छान कर चूर्ण बनाएं ऊपर लिखी खुराक के अनुसार देते हैं। 3. मोच रस, मोथा, सोंठ, इंद्र जौ, बेलगिरी, घव पुष्प  का चूर्ण बनाकर इसे गुड के साथ रोगी को देने से रोग मुक्त हो जाते हैं।

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संग्रहणी रोग रोग के लक्षण – अति दूषित वात, पित्त, खाँसी तथा तीनों दोषों से दूषित ग्रहणी खाया हुआ अन्नादिक कच्चा या पक्का मल रूप से गुदा मार्ग से बराबर निकलता है, जो दुर्गन्ध युक्त बंधा हुआ तथा बंधा दोनों प्रकार के मल होते हैं। विल्व तैल बेल गिरी 100 जल, जल का कवाय करें, इसके पश्चात बकरी के दूध व तेल कवाय में डाल, बेलगिरी, कब पुष्य, कूठ, सोंठ, रास्ना, पुनवर्दा देवदार वच मोथा, लोध, मोच रस, इन का कवाय कर उपयुक्त कवाय में मिलाकर हल्की आंच पर पकाएं, जब तेल ही रह जाएं तो नीचे उतार लें। उपयोग यह तेल, ग्रहणी अतिसार, अर्श, रक्तपित्त जैसे रोगों को नष्ट करता है।

ग्रहणी चूर्ण शुद्ध पारा 1 भाग, शुद्ध गंधक 1 भाग दोनों को कजली कर फिर लौह भस्म अभ्रक भस्म, हींग, पांचों नमक, दोनों हल्दी, कूट, वच, नागर मोथा, वायविडिंग, सोंठ, मिर्च, पीपल, हरड़, बेहड़ा, आमला,चीता अजमोद, अजवायन, गज, पीपल, जवाक्षार, सज्जक्षार, खील सुहागा, ग्रह धूम सबको एक – एक ग्राम लेकर चूर्ण बना कजली को इनमें मिलाकर घुटाई करे इसके पश्चात इसे बड़ी शीशी में भर लें। खुराक – बड़े लोगों के लिए एक चम्मच दिन में तीन बार छोटों के लिए चम्मच ,, दोबार लाभ – इस चूर्ण से सब प्रकार के अतिसार, पेचश, शूलातिसार, (सिर दर्द)  संग्रहणी तृष्णा बुखार प्लीहा पाण्डु रोगों को जड़ से उखाड़ देता है। 2. एक और चूर्ण लौंग, जीरा, रेणुका बीज, सेंधा नमक, दाल चीनी, इलाइची, तेजपाल अजमोद, अजवायन, नागर मोथा, सोंठ, मिर्च, पीपल हरड़, बेहड़ा, आमला, मिशोथ पादा, चिरायता हल्दी, खस, चन्दन, अटामांसी कचूर, सोंठ, मेवी, खोल, सुहागा जबाक्षार, जीरा, सज्जखार सुंगन्ध वाला, वेलगिरी, चीग, पीपलामूल, वायविडिंग, धनिया, शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, अभ्रक भस्म, लोहा भस्म। यह सब चीज़ें बराबर मात्रा में लेकर सबसे पहले गंधक को घोटकर कजली करें इसके पश्चात अभ्रक व लोह भस्म को मिलाकर घोटें फिर अन्य औषधियों को बारीक़ कूट कर कपड़े से छान कर बाकी सब चीज़ों को मिलाकर घुटाई करें, जब पूरी तरह घुटाई हो जाने के के पश्चात सारे चूर्ण के बराबर चीनी डाल दें।

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खुराक – बीमारी और शक्ति के अनुसार। उपयोग – दोष के अनुसार गर्म या शीतल जल से दें। आमतिसार, पुरानी संग्रहणी, पेट का दर्द, रक्तसितार, अर्श, रक्तपित्त शोथ विश चिका, पाण्डु कामला, काम श्वास सब बीमारियों इससे ठीक हो सकती हैं।  विलव दुग्ध बेलगिरी नागरमोथा इंद्र जौ, सुगंध वाला, मोच रस बकरी के दूध में डाल कर पका लें, इस दूध को पीने से पुरानी संग्रहणी दूर हो जाती है।