चंद दिनों में ही सरकारी स्कूलों की समस्याएं खत्म हो जाएंगी।

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भारत देश को आजाद हुए लगभग 70 वर्ष बीत गए हैं। शिक्षा किसी भी लोकतांत्रिक और कल्याणकारी सरकार के लिए महत्वपूर्ण विषय है। संभवत: इसी कारण से भारतीय संविधान में केंद्र और राज्य दोनों को सामूहिक रुप से यह जिम्मेवारी सौंपी है। लगभग सभी सरकारों ने शिक्षा का अधिक से अधिक प्रसार करने के लिए निजी हाथों में भी यह काम सौंपा है। आजादी के इतने वर्ष बीत जाने पर आम जन-मानस में यह चिंता फैल गई है कि सरकारी स्कूलों का स्तर गिर गया है, क्योंकि निजी स्कूलों के परीक्षा परिणाम अपेक्षाकृत अच्छे रह रहे हैं। अब जरूरत है उन कारणों का पता करने कि जिनसे सरकारी स्कूलों का स्तर गिरा है और उपायों की खोज करने की जिनसे वे अपनी गरिमा को पुनः प्राप्त कर लें। हमारी प्रजा हितैषी सरकारें अपने बजट का बहुत बड़ा हिस्सा शिक्षा के क्षेत्र में लगाती रही है फिर भी अपेक्षाकृत लाभ प्राप्त नहीं हुआ है। किसी भी विद्यालय के लिए सबसे महत्वपूर्ण तीन आवश्यकताएं हैं वे हैं छात्र, शिक्षक तथा विद्यालय भवन एवं अन्य सुविधाएं। सर्वप्रथम छात्रों की बात करें तो सरकारी विद्यालयों में कौन-कौन से छात्र शिक्षा ग्रहण करने आते हैं।

जिन अभिभावकों की थोड़ी-सी भी खर्च करने की क्षमता होती है वह भी किसी न किसी प्राइवेट स्कूल में अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं। क्योंकि उनका मानना है कि यह उनके सामाजिक स्तर की कसौटी है।  जिनकी क्षमता अधिक है उनकी तो अधिक से अधिक महंगे या लूटने वाले विद्यालय में लाडलों को डालने की होड़ लगी है। माननीय नेतागण और प्रशासनिक अधिकारी तो सरकारी स्कूल में अपने लाडलों को पढ़ाने का स्वप्न भी नहीं ले सकते हैं। अब शेष रह जाते हैं तो अत्यंत गरीब घरों के छात्र, प्रवासी मजदूरों के बच्चे,  इक्का-दुक्का सरकारी अध्यापकों के बच्चे या फिर वे जो कहीं भी प्रवेश नहीं ले पाते क्योंकि सरकारी स्कूलों में प्रवेश के लिए कोई परीक्षा नहीं होती है। गुदड़ी का लाल कहावत और मनोविज्ञान के सिद्धांत कहते हैं कि प्रतिभा गरीबी-अमीरी की मोहताज नहीं होती। इस स्तर और संख्या के अनुपात से तो सरकारी विद्यालयों का परिणाम बेहतरीन ही रहता है।

दूसरी आवश्यकता अध्यापकों के बारे में चर्चा करें तो अध्यापक सामाजिक प्राणी है। वह समाज से भिन्न तो कभी नहीं हो सकता, फिर भी समाज उसमें कुछ विशेषताएं जरूर चाहता है क्योंकि अध्यापक राष्ट्र-निर्माता कहलाता है। आचार्य चाणक्य के अनुसार भी प्रलय और विकास अध्यापक की गोद में खेलते हैं। इस लिहाज से अध्यापक का सामाजिक आर्थिक और मानसिक रुप से संतुष्ट होना बेहद आवश्यक है। अध्यापक को वे सारी सुविधाएं मिलनी चाहिए जो उसके सामाजिक रुतवे को बनाए रखें चाहे वे वेतन अथवा भत्ते संबंधी हों, चाहे सम्मानजनक पेंशन से संबंधित हों। साथ ही साथ अध्यापक भर्ती प्रक्रिया प्रारंभ से अंत तक सौ प्रतिशत पारदर्शी और विश्वसनीय होनी चाहिए। अध्यापक भर्ती की कामचलाऊ नीतियां भाई भतीजावाद और वैमनस्य को पैदा करती है। आगे जाकर यही नीतियां सरकार के ऊपर सवालिया निशान और बेरोजगारों में अविश्वास का भाव पैदा करती है। केंद्र सरकार ने एक बेहतर पहल की है कि Class Three और Class Four के लिए साक्षात्कार को खत्म कर दिया है। इसी तर्ज पर सभी राज्य सरकारों को भी इस स्तर पर साक्षात्कार को समाप्त कर देना चाहिए। जिससे बेरोजगार युवा पीढ़ी में सरकारी सेवा के लिए विश्वास और आकर्षण पैदा हो सके। संतुष्टि की बात करें तो शायद ही प्राइवेट स्कूल के अध्यापक वहां संतुष्ट हों वे सरकारी स्कूल में जाना ही पसंद करेंगे।

तृतीया आवश्यकता है विद्यालय भवन एवं अन्य सुविधाएं। यद्यपि कई विद्यालयों में अच्छे भवन और सुविधाएं हैं परंतु यह स्थिति सब जगह नहीं है। इसका कारण यह नहीं है कि शिक्षा पर कम खर्च हुआ है बल्कि योजनाबद्ध रुप से धन का खर्च नहीं हो पाया है। आवश्यकता से अधिक विद्यालय खोल दिए गए हैं ये सब विद्यालय किसी दूरदर्शी सोच का परिणाम नहीं है, ये राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए हुआ है। कई स्कूलों में तो संख्या ना के बराबर है।

ठीक है हमारा प्रदेश एक पहाड़ी राज्य है फिर भी विद्यालयों की संख्या सीमित करके शेष रहे विद्यालयों को आदर्श रुप दिया जा सकता है। नहीं तो विद्यालय में सुविधाएं तो कभी पूरी हो भी जाएं परन्तु छात्रों और शिक्षकों का टोटा कभी पूरा नहीं हो सकता।

सरकारी स्कूलों में शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए सबसे महत्वपूर्ण उपाय यदि है तो वह है हमारे माननीय नेताओं को दृढ़ इच्छाशक्ति दिखाते हुए स्वयं और प्रशासनिक अधिकारियों के लाडलों को सरकारी विद्यालय में पढ़ाना अनिवार्य कर देना चाहिए। सभी समस्याएं एक-एक करके चंद दिनों में ही दूर हो जाएँगी—

  1. सभी सरकारी कर्मचारी अपने बच्चों को सरकारी विद्यालय में पढ़ाएंगे।
  2. शिक्षक भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी होगी। कोई कामचलाऊ नीति नहीं बनेगी।
  3. अध्यापक गैर शैक्षणिक कार्यों में नहीं लगेंगे केवल शिक्षण कार्य ही होगा। वे अपनी क्षमताओं का बेहतरीन प्रयोग करेंगे।
  4. सभी विद्यालयों के लिए उचित समय पर सरकारी बस सेवा शुरू हो जाएगी। विद्यालय आने जाने की सारी समस्याएं खत्म हो जाएँगी।
  5. दोपहर के भोजन का स्तर सुधरेगा और छात्रों को पौष्टिक आहार मिलेगा।
  6. बेहतरीन वर्दियां मिलेंगी और कोई वर्दी घोटाला नहीं होगा।
  7. शिक्षक गैरजरूरी गतिविधियों में नहीं उलझेंगे।
  8. स्थानांतरण नीति सही हो जाएगी और इससे सम्बंधित कोई भय नहीं होगा।
  9. शिक्षण के लिए आवश्यक सारी सुविधाएं विद्यालयों को प्राप्त होंगी।
  10. किसी भी विद्यालय में शिक्षकों की कोई कमी नहीं होगी।
  11. गैर शिक्षक कर्मचारियों के पद रिक्त नहीं होंगे।
  12. कोई विद्यालय मुख्याध्यापक अथवा प्रधानाचार्य के बिना नहीं होगा।
  13. सारी मेरिट सूची सरकारी विद्यालयों के छात्रों से भरी होगी।
  14. कोई भी प्रतिष्ठित अधिकारी यह आरोप नहीं लगा पाएगा कि सरकारी विद्यालय में आकर अध्यापक निठल्ले बन जाते हैं।
  15. कोई समाचार पत्र यह नहीं पूछेगा कि सरकारी स्कूल में क्यों नहीं पढ़ना चाहते।
  16. बेहतरीन शिक्षा प्रणाली शुरू होगी।
  17. परीक्षा प्रणाली में भी सुधार होगा।
  18. विद्यालयों में पुनः शैक्षणिक माहौल पैदा होगा।
  19. विद्यालय छात्रों पर गैरजरूरी प्रयोग नहीं होंगे।
  20. विद्यालयों और व्यवस्था पर लोगों का विश्वास पुनः पैदा होगा।
  21. भावी पीढ़ी दिल से अध्यापक बनना चाहेगी।
  22. निजी विद्यालयों को आसानी से मान्यता नहीं मिलेगी।
  23. सबको समान वेतन मिलेगा कोई अनुबन्ध प्रणाली नहीं होगी।
  24. शिक्षक अपने शिक्षक होने पर गर्व करेगा।

सारे सरकारी स्कूल आदर्श विद्यालय होंगे।

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