निष्पादन बजटन, नियंत्रण अनुपात, शून्य-आधार बजटरी, कार्यक्रम बजटन।

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निष्पादन बजटन (PERFORMANCE BUDGETING) निष्पादन बजट को “कार्यों, क्रियाकलापों एवं परियोजनाओं पर आधारित बजट” के रूप में परिभाषित किया गया है। इस प्रकार, निष्पादन बजटन को ऐसी बजटन प्रणाली के रूप में वर्णित किया जा सकता है जिसके अन्तर्गत आदान लागतें निष्पादन या उपलब्धि, यानी अन्तिम परिणाम से संबद्ध होती हैं। यह बजटन की ऐसी प्रणाली है जो कार्य-निष्पादन के मूल्यांकन के साथ-साथ अनुवर्ती करती है। बजटन की परम्परागत प्रणाली में बजट वहन किये जाने वाले विभिन्न प्रकार व्ययों के लिए किए गए प्रावधान की विभिन्न  राशियों के विवरण का प्रतीक होता है। इस प्रकार के बजट का ऐसा प्रारूप होता है जिसे “आयोजनों की सूची” कहा जाता है एवं जब तक संबधित विभाग द्धारा किये जाने वाले व्यय बजट में निर्धारित राशि से अधिक नहीं होते, तब तक कोई प्रकट रूप से अनियमितता नहीं होती है इस प्रकार, परम्परागत बजटन में किये जाने वाले व्ययों की राशि पर जोर दिया जाता है। दूसरी ओर, निष्पादन बजटन किये जाने वाले व्यय की अपेक्षा प्राप्त परिणामों या कार्य-निष्पादन या उपलब्धि पर जोर देता है। ‘बजटरी सुधर पर प्राक्कलन समिति’ के परिवर्दन में निष्पादन बजट को इस प्रकार परिभाषित किया गया है:

“निष्पादन बजट कार्यों, क्रियाकलापों एवं परियोजनाओं पर आधारित बजट होता हो जो कार्य-सम्पादन में साधनों जैसे कर्मचारी, सेवा, पूर्ति, उपकरण, आदि की अपेक्षा कार्य सम्पादन, किये जाने वाले कार्य की सामान्य व सापेक्षिक महत्व एवं अर्पित की जाने वाली सेवा पर ध्यान केंद्रित करता है। इस प्रणाली के अंतर्गत, विभिन संगठनात्मक इकाइयों के कार्यो को क्रियाकलापों के कार्यक्रमों, उप-कार्यक्रमों और आंगिक योजनाओं,आदि में विभक्त कर दिया जाता है, एवं प्रत्येक के लिए अनुमान प्रस्तुत किये जाते है। निष्पादन बजटन आदान एवं उनके प्रत्यक्ष उत्पादों के मध्य संबंध स्थापित करता है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ बैंक मैनेजमेंट के अनुसार “निष्पादन बजटन संगठनात्मक उद्देश्यों, कार्य के प्रयोजन व उद्देश्यों के ढाँचा में एक अवधि में प्राप्त किये जाने वाले कार्य का विश्लेषण करने, पहचान करने, उसे सरल बनाने एवं पारदर्शी बनाने की प्रक्रिया है। यह तकनीक संगठन के व्यावसायिक उद्देश्यों की दिशा में इसके विशिष्ट निर्देशन द्धारा चित्रित की जाती  है।

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निष्पादन बजटन में अग्रांकित का समावेश होता है: (i) विभिन्न कार्यक्रमों के लिए कसौटियों को विकसित करना: (ii) प्रत्येक कार्यक्रम के निष्पादन का एवं प्रत्येक उत्तरदायित्व इकाई प्राप्त उपलब्धि का आकलन करना (iii) बजट के साथ वास्तविक निष्पादन की तुलना करना; एवं (iv) आवश्यकतानुसार संशोधन करने की दृष्टि से कार्यक्रम की आवधिक समीक्षा करना।     

निष्पादन बजटरी बनाम कार्यक्रम बजटन (PERFORMANCE BUDGETING VS. PROGRAMMER BUDGETING)

कार्यक्रम बजटन जिसे नियोजन, कार्यक्रमीकरण एवं बजटरी प्रणाली भी कहते हैं,  रक ऐसी बजटरी प्रकिया है जिसका लक्ष्य सरकारी परिचालनों को अधिक कार्यदक्ष एवं अधिक प्रभावी बनाना होता है। यह प्रणाली सर्वप्रथम 1961 में संयुक्त राज्य अमेरिका के रक्षा विभाग में प्रचलित की गयी। ब्रिटेन में इसे ‘उत्पाद बजटन’ कहते हैं। कार्यक्रम बजटन का उद्देश्य सार्वजनिक क्षेत्र के अंदर कोषों के नियोजन में सुधार करना एवं निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्रों के बीच कोष के बंटवारे को समुन्नत बनाना है। नियोजन कारकर्मीकरण एवं बजटन प्रणाली में बजटन को एक विभाजन प्रक्रिया माना जाता है तथा बजट को नीति का विवरण मानते हैं। यह परम्परागत आयगत बजट की तरह कोई वार्षिक अभ्यास नहीं होता है, बल्कि 3 से 5 वर्षो का एक दीर्घावधि वाला कार्यक्रम होता है। इस प्रणाली में व्यय वर्गीकरण उद्देश्यों के अनुसार, न कि कार्यो के अनुसार किया जाता है।

नियंत्रण अनुपात (CONTROL RATIOS)

प्रबंधतंत्र यह जानना चाहता है कि क्या उसके व्यवसाय का कार्य-निष्पादन पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम केर अनुसार है अथवा नहीं। इस उद्देश्य को दृष्टि में रखते हुए कुछ ‘नियंत्रण अनुपातों’ की गणना की जाती है। यदि ये अनुपात 100%से अधिक हैं तो निष्पादन अनुकूल माना जाता है, किन्तु यदि 100% से कम हैं तो निष्पादन प्रतिकूल अथवा असंतोषजनक माना जाता है। निम्नलिखित नियंत्रण अनुपातों की गणना है:

Capacity Ratio = Actual Hours Worked / Budgeted Hours*100

यह अनुपात इंगित है कि कितने बजट घण्टे वास्तविक प्रयोग में लाये गए हैं। यह कार्य के घंटों की वास्तविक संख्या का बजट अवधि में कार्यशील घण्टों की अधिकतम सम्भव संख्या संबंध व्यक्त करता है। जैसे यदि यह अनुपात 80% बजटीय घण्टों का उपयोग हुआ है तथा शेष 20% क्षमता निष्क्रिय पड़ी रही जिसका कोई उपयोग नहीं किया गया।

Activity Ratio = Standard Hours for Actual Production/ Budgeted Hours*100

यह अनुपात एक अवधि विशेष में प्राप्त कुशलता के स्तर को प्रदर्शित करता है। जैसे यदि  अनुपात 130% है तो इसका यह आशय है कि कार्यकुशलता 30% अधिक है या कुशलता में 30% वृद्धि हो गयी है।

Efficiency Ratio = Standard Hours for Working Days in a Period/ Number of Working days in the Budget Period*100

यह अनुपात बतलाता है कि किसी अवधि में उपलब्ध वास्तविक कार्यशील दिवस बजट अवधि के कार्य दिवसों की संख्या से अधिक है या कम। यदि अनुपात 100% से अधिक है तो इसका अर्थ यह है कि कार्य दिवसों की बजटीय संख्या से अधिक वास्तविक कार्य दिवस हैं। यदि अनुपात 100 से या कम है तो विपरीत स्थित का परिचायक होता है।

Calendar Ratio = Number of Actual Working Days in a Period/ Number of Working Days in the Budget Period*100

शून्य-आधार बजटरी (ZERO-BASE BUDGETING)

शून्य आधार बजटन बजटरी की एक नवीनतम तकनीक है और प्रबंधकीय के रूप में इसका अधिक उपयोग किया जाने लगा है। इस तकनीक का सर्वप्रथम 1962 में अमेरिका मेप्रयोग किया गया था। अमेरिका के भूतपूर्व राष्ट्रपति जिमि कार्टर ने, जब वे जार्जिया के गवर्नर थे, राजकीय व्ययों को नियंत्रित करने के लिए इसका प्रयोग किया तभी यह तकनीक प्रकाश में आयी। जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट होता है, इसमे ‘प्रस्थान रेखा’ से बजटन प्रारम्भ होता है। बजटन की सामान्य तकनीक में गत वर्ष के लागत स्तरों को वर्तमान वर्ष के लिए बजट बनाने हेतु आधार मानते है। इस प्रकार, गत वर्ष को वर्तमान वर्ष के लिए पथ-प्रदर्शक माना जाता है और इसके आधार पर यह निश्चय किया जाता है कि ‘गत वर्ष’ कार्य-निष्पत्ति इतनी थी तो इस वर्ष क्या किया जाना है’ अतः इस विधि के अन्तर्गत गत वर्ष की अकुशलताएँ वर्तमान वर्ष में संवहित हो जाती हैं। इसके विपरीत, ‘शून्य आधार बजटन’ में प्रत्येक वर्ष को वर्ष को एक नया वर्ष माना जाता है और गत वर्ष को आधार के रूप में नही लिया जाता है। बजटन की इस विधि में यह सिद्ध करना पड़ता रखता है कि वर्तमान वर्ष का बजट वर्तमान दशा के अनुसार है। प्रबंध-तंत्र किसी कार्य के लिए जो भी प्रस्ताव एख्ते है उसके औचित्य को सिद्ध करना पड़ता है कि कार्य आवश्यक है तथा उसे सम्पादित करने के लिए जो भी राशि माँगी गयी है वह कार्य को देखते हुए वास्तव में उचित है। इस प्रकार बजट बनाते समय शून्य को आधार माना जाता है और वर्तमान दशाओं के परिप्रेशय में संभावित भावी क्रियाएँ निश्चित की जाती है। पीटर ए. पहर के शब्दों में यह ऐसी “नियोजन एवं बजटन प्रक्रिया है जिसमे यह अपेक्षा की जाती है कि प्रत्येक प्रबंधक को प्रस्थान रेखा से अपनी सम्पूर्ण बजट माँग  को विस्तारपूर्वक न्यायसंगत ठहराना पड़ता है एवं वह माँग की गयी धन को क्यों व्यय करेगा, इसके औचित्य को भी सिद्ध करने का भार प्रत्येक प्रबंधक पर डाल दिया जाता है। इस दृष्टिकोण में भी सभी क्रियाएँ ‘निर्णय संकुलों में विश्लेषित की जाती हैं जिनका व्यवस्थित विश्लेषण द्धारा मूल्यांकन किया जाता है तथा इन्हें महत्व के अनुसार क्रमबद्ध किया जाता है।”

शून्य-आधार बजटन में एक प्रबन्धक क्यों व्यय करना चाहता है इसके औचित्य को उसे ही सही ठहराना पड़ता है। यह सिद्ध करना पड़ता है कि एक क्रिया कितनी और क्यों आवश्यक है तथा उसके लिए माँगी गई राशि क्रिया की मात्रा को देखते हुए वास्तव में उचित है। विभिन्न क्रियाओं पर व्ययों की प्राथमिकता की न्यायसंगतता पर निर्भर करती है और उसके अनुसार ही व्यय की प्राथमिकताएँ तय की जाती है।

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