मोटापा एवं मधुमेहनाशक दलिया

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Obesity and Diabetes alloverindia.in

Obesity and Diabetes-Defeating Porridge

गेहूँ                –            500 ग्राम

चावल            –            500 ग्राम

बाजरा            –            500 ग्राम

साबुत मूंग      –            500 ग्राम

सभी को उपरोक्त मात्रा में लेकर, सेककर दलिया बना लें। इसमें अजवायन 20 ग्राम तथा सफ़ेद तिल 50 ग्राम भी मिला लें।

आवश्यकता के अनुसार लगभग 50 ग्राम दलिया को 400 मिलीo पानी में डालकर पकाएँ, स्वादानुसार सब्जियाँ व हल्का नमक मिला लें। नियमित रूप से 15 – 30 दिन तक दलिया का सेवन करने से मधुमेह समाप्त हो जाता है। मोटापे से पीड़ित हृदय रोगी इस दलिया का नियमित सेवन कर निरपवादरूप से अपना वजन कम कर सकते हैं।

मोतियाबिन्द ग्लूकोमानाशकदृष्टि आई ड्राप

सफेद प्याज का रस        –         10 मिलीo

अदरक का रस               –         10 मिलीo

नीबू का रस                   –         10 मिलीo

शहद                            –          50 मिलीo

उक्त सभी को मिलाकर रख लें। नियमित रूप से 2 – 2 बूँद दवा आँखों में डालने से मोतियाबिंद कट जाता है। ग्लूकोमा के रोगी का आँख का दबाव कम को जाने से धीरे – धीरे ठीक हो जाता है।

उक्त दवा आश्रम में दिव्य नेत्रज्योति के नाम से विशेष रूप से तैयार की जाती है, जिनके प्रयोग से अनेकों रोगी लाभ पा चुके हैं।

दंतविकारनाशक मंजन

हल्दी                      –             100 ग्राम

सेंधा नमक              –              100 ग्राम

निम्ब पत्र                –              100 ग्राम

लौंग                       –                20 ग्राम

अकरकरा फूल          –                50 ग्राम

फिटकरी                  –              100 ग्राम

बबूल छाल               –              100 ग्राम

तुम्बरू बीज             –                50 ग्राम

बेहड़ा छिलका           –                50 ग्राम

उक्त सभी औषधियों को निदृष्टि मात्रा में लेकर कूट – पीसकर मंजन तैयार करें। आश्रम में उक्त औषधियों के अतिरिक्त कुछ विशिष्ट औषधियों को मिलाकर दिव्य दंतमंजन बनाया गया है, जो दन्त कृमि, पायरिया, आदि रोगों का समूल नाश करने में समक्ष है।

हृदय रोग, अम्लपित्त, उदर रोग एवं मोटापे में लाभप्रद लौकी का रस

लौकी 500 ग्राम + पुदीना पत्र 7 नग + तुलसी पत्र 7 नग

उक्त सभी से 1 कप रस निकालकर प्रतिदिन प्रातः काल खाली पेट पीने  हृदय की धमनियों में हुये अवरोध भी खुल जाते हैं। अम्लपित्त एवं समस्त उदररोगों का नाश करने  लिए लोकि रस का सेवन नियमित रूप  करना चाहिए।

अर्जुनछाल + क्षीर पाक

अर्जुन चूर्ण 5 – 10 ग्राम + 1 कप दूध +3 कप पानी मिलाकर पकाएँ। 1 कप शेष रहने पर छानकर प्रातः काल खाली पेट पी लें। उक्त क्षीर पाक  नियमित सेवन, कमजोर हृदय वालों को अति लाभकारी होता है।

पीलिया, हिपेटाइटिस एवं सिरोसिस ऑफ लीवर की अचूक दवा

श्योनाक की छाल          –           25 ग्राम

भूमि आँवले का पंचाडंग  –           25 ग्राम

पुनर्नवा की मूल             –           25 ग्राम

आवश्यकतानुसार निर्देशित मात्रा में उपरोक्त ताजी औषधियों लेकर एक कप रस निकालकर प्रातःकाल नियमितरूप से सेवन करने से पीलिया एवं हिपेटाइटस का निश्चितरूप से नाश हो जाता है।

उक्त औषधियों के अभाव में आश्रम द्धारा बनाई गई औषधि सर्वकल्प क्वाथ आदि का प्रयोग कर सकते हैं, जो कि सूखी पुनर्नवामूल, भूमि आँवला, श्योनाक आदि औषधियों के मिश्रण के साथ तैयार की गई है।

पुरानी खाँसी की अचूक दवा

मुलेठी का एक छोटा टुकड़ा + 2 काली मिर्च + मिश्री का एक छोटा टुकड़ा

इन तीनों को मुँह में लेकर धीरे – धीरे दिन भर दो – तीन बार खाली पेट या खाने के बाद चूसें। इससे पुराने  पुरानी खाँसी, गले की खराश, गले बैठना, स्वरभंग आदि में तत्काल एवं स्थायी लाभ होता है।

शुष्कार्श एवं रक्तार्श की अचूक दवाएँ

  1. आधा ग्राम देशी कपूर को केले के एक टुकड़े में रखकर खाली पेट निगल जाएँ। एक ही खुराक में रक्तस्त्राव बंद है। रक्तस्त्राव नहीं रुकने पर उक्त प्रयोग को तीन बार तक कर सकते हैं। इससे अधिक बार न करें।
  2. गाय के 1 कप पीने लायक गर्म दूध में आधे नीबू का रस निचोड़ कर दूध फटने से पहले तुरंत पी जाएँ। यह प्रयोग भी रक्तार्श रक्तस्त्राव को तुरंत बंद कर देता है। उक्त प्रयोग एक या दो बार से अधिक न करें। आवश्यकता होने पर चिकित्सीय परामर्श लें।

श्वेतप्रदर, प्रमेह, धातु रोग एवं मासिकधर्म सम्बन्धी अतिरक्तस्त्राव में लाभप्रद शीशम के पत्ते

शीशम के पत्ते 8 – 10 व मिश्री 25 ग्राम दोनों को मिलाकर घोंट – पीस कर प्रातःकाल सेवन करें। कुछ ही दिनों सेवन से स्त्रियों  श्वेत प्रदर तथा पुरुषों प्रमेह आदि रोगों में निश्चित लाभ होता है। मासिकधर्म के अंतर्गत होने वाला अतिरक्तस्त्राव सामान्य हो जाता है।

सर्दियों के मौसम में उक्त दवा में 4 – 5 काली मिर्च मिलाकर सेवन करना चाहिए। यह अत्यन्त शीतल है। अतः गर्मी से होने वाले रक्तस्त्राव में भी अत्यंत लाभदायक, निरापद एवं सरल प्रयोग है।

नोट:  मधुमेह के रोगी मिश्री के बिना ही प्रयोग करें।

बवासीर अति मासिकस्राव

  1. नारियल की दाढ़ी (भूरे रेशे) को जलाकर राख बनाकर छानकर रख लें। तीन – तीन ग्राम नारियल की यह भस्म सुबह – दोपहर – शाम तीन बार खाली पेट छाछ से लें। यह प्रयोग केवल एक ही दिन करना है। एक बार लेने से ही बवासीर ठीक हो जाती है। यह प्रयोग मासिकधर्म में अति रक्तस्त्राव तथा श्वेतप्रदर में भी लाभप्रद है।
  2. वमन (उल्टी), हैजा, हिचकी में इस भस्म को 1 – 1 ग्राम की मात्रा में थोड़े जल के साथ सेवन करने से विशेष लाभ होता है।
  3. मूयर – पिच्छ भस्म की 1/4 ग्राम मात्रा मधु (शहद) के साथ सेवन करने से हिक्का – हिचकी तुरंत बंद हो जाती है।

माताओं के दूधवर्धक प्रयोग

  1. शतावर चूर्ण 3 से 5 ग्राम सुबह – शाम गाय के दूध से लेने से, जिन माताओं के स्तनों में दूध सुख जाता है या कम हो जाता है, उनको पुनः यथेष्ट दूध स्तनों में उतर आता है।

शतावर चूर्ण गर्भवती माताएँ 2 – ३ ग्राम की मात्रा में गर्भावस्था के दौरान भी सेवन कर सकती हैं। ऐसा करने से प्रसव के बाद स्तनों में दूध की अल्पता नहीं होगी। प्रसव के बाद भी माताएँ शतावर का सेवन करती रहें।

शतावर चूर्ण 50 – 50 ग्राम सुबह – शाम गाय – भैंसों को देने से उनके दूध में भी वृद्धि हो जाती है।

कैंसर एड्स (AIDS) रोग में गेहूँ के ज्वारे का रस

सेवन विधि:

प्रतिदिन एक – एक गमले में या थोड़ी भूमि हो तो भूमि पर नौ दिन तक गेहूँ उगाएँ। 10 वें दिन प्रथम गमले में उग आई, गेहूँ की हरी पत्तियों को काट कर 10 ग्राम + 25 ग्राम [लगभग दो फुट लम्बी व एक अगुँली जितनी मोटी] गिलोय लेकर थोड़ा पानी मिलाकर पीस लें, कपड़े से निचोड़कर 1 कप की मात्रा में खाली पेट नित्य प्रयोग करें। खाली हुए गमले में अगली बार के लिये पुनः गेहूँ के दाने बो दें।

आश्रम द्धारा दी जाने वाली औषधियों के साथ उक्त रस  नियमित सेवन कैंसर जैसे भयानक रोग से शीघ्र मुक्ति प्रदान करने में सहयोग करता है।

पीपल की छाल + नीम की छाल + सर्वकल्प क्वाथ + वृक्कदोषहर क्वाथ

वृक्कदोषहर क्वाथ            –              200 ग्राम

सर्वकल्प क्वाथ                –              200 ग्राम

दोनों को मिलाकर एक चम्मच दवाई + 5 ग्राम पीपल की छाल + 5 ग्राम नीम की छाल को 400 मिलीo पानी में पकाएँ। 100 मिलीo शेष रहने पर छानकर खाली पेट सुबह नाश्ते से पहले एवं सायंकाल खाने से 1 घंटा पहले पीएँ।

इसके नियमित प्रयोग से कुछ ही दिनों में रक्त में यूरिया एवं क्रिएटिनीन की मात्रा घट जाती है।

थाइराइड, टॉन्सिल्स कफ रोग

त्रिकटु चूर्ण        –        50 ग्राम

बहेड़ा चूर्ण         –        20 ग्राम

प्रवाल पिष्टी      –        10 ग्राम

सेवन विधि:

सबको चूर्ण करके मिलाकर रख लें। बड़ी आयु के व्यक्ति एक – एक ग्राम तथा छोटी आयु के रोगी आधे – आधे ग्राम की मात्रा में चूर्ण लेकर सुबह – शाम खाली पेट मधु (शहद) के साथ सेवन करें। निरंतर सेवन करने से थाइराइड के रोग में विशेष लाभ होता है तथा बच्चों के टॉन्सिल्स की समस्या भी दूर हो जाती है। श्वास व कफ रोगों में भी यह प्रयोग लाभप्रद है।

कफ रोगों का घरेलू उपचार

बादाम गिरी – 100 ग्राम + खाण्ड – 50 ग्राम + काली मिर्च – 20 ग्राम मिर्च

उपरोक्त सभी का अलग – अलग पाउडर बनाएँ। तत्पश्चात उपरोक्त मात्रा में मिलाकर सुरक्षित रख लें।

सेवन विधि:

एक चम्मच सायं खाने के बाद गुनगुने दूध से सेवन करने से जीर्ण कफ रोग, नज़ला – जुकाम, साइनस में विशेष लाभ होता है। यह प्रयोग कब्ज को भी दूर कर देता है।

विशेष:

जिनको मधुमेह हो, वे व्यक्ति खाण्ड का प्रयोग न करें तथा जिनको अम्लपित्त हो, वे काली मिर्च 10 ग्राम की मात्रा में ही प्रयोग करें।

वात रोगों के घरेलू उपचार

    हल्दी                      –             100 ग्राम

    मेथी दाना               –                100 ग्राम

    सौंठ                      –              100 ग्राम

    अश्वगंधा चूर्ण          –                   50 ग्राम

उपरोक्त औषधियों को निद्रिष्ट मात्रा में लेकर चूर्ण कर लें। 1 – 1 चम्मच नाश्ते व शाम खाने के बाद गुनगुने पानी से लें। इसके सेवन से जोड़ों दर्द, गठिया, कमर दर्द आदि में विशेष लाभ होता है।

  1. लहुसन की 1 से 3 कली खाली पेट पानी पानी से लेने से जोड़ों के दर्द में लाभ होता है। साथ ही बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल, ट्राइगिलसराइड सामान्य होता है। हृदय की शिराओं में आए हुए अवरोध को भी दूर करने में लहसुन उपयोगी है।
  2. मोथा घास की जड़, जो कि एक गाँठ की तरह होती है, उसका पाउडर करके 1 से 2 ग्राम सुबह – शाम पानी या दूध से लेने से जोड़ों के दर्द व गठिया में आश्चर्यजनक लाभ मिलता है।
  3. निर्गुण्डी के पत्तों का चूर्ण एक – एक चम्मच सुबह – शाम खाना खाने के बाद पानी के साथ सेवन करने से वात रोगों का शमन होता है।

वन्ध्यत्वनाशक योग

शिवलिंगी बीज             –             100 ग्राम

पुत्रजीवक बीज             –             200 ग्राम

सर्वप्रथम पुत्रजीवक बीज से गिरी निकालकर तत्पश्चात दोनों को समान मात्रा में मिलाकर चूर्ण बनाएँ। 1/4 – 1/4 चम्मच सुबह – शाम नाश्ते व खाने से पूर्व गाय के दूध से लें। कुछ ही समय के नियमित सेवन से वन्ध्यत्व में लाभ मिलता है तथा शीघ्र ही संतान की प्राप्ति होती है। जिन स्त्रियों को बार – बार गर्भपात होता है, उनका गर्भपात होना रूक जाता है।

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