वित्तीय प्रबंध की प्रकृति एवं क्षेत्र (NATURE AND SCOPE OF BUSINESS FINANCE)

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परिचय (INTRODUCTION) आज की अर्थव्यवस्था में वित्त का आशय आवश्यकता अनुसार धन के प्रावधान से है। प्रत्येक व्यवसायिक संस्थान को चाहे, वह बड़े, मध्यम अथवा लघु आकर का हो, उसके कार्यों को संचालित करने और उसके उद्देश्यों की पूर्ति के लिए वित्त अनिवार्य है। वास्तव में आज वित्त इतना अपरिहार्य हो गया है कि इसे संस्था का जीवन रक्त कहा जाता है। कोई भी उपक्रम वित्त के बिना अपने उद्देश्यों की पूर्ति नहीं कर सकता है। परम्परागत दृष्टि से वित्त विषय को दो भागों में वर्गीकृत किया गया है: (i) सार्वजनिक वित्त  (ii) निजी वित्त सार्वजनिक वित्त से अभिप्रायः  सरकारी  से है और इसके अंतर्गत सरकारी संस्थानों जैसे राज्यों, स्थानीय स्व-सरकारों और केन्द्रीय सरकार की वित्त आवश्यकताओं, प्राप्तियों और उसके वितरण को शामिल किया जाता है। निजी वित्त एक व्यक्ति, लाभ कमाने वाले व्यापारिक संगठन और गैरव्यापारिक संगठन की वित्तीय आवश्यकताओं, प्राप्तियों तथा उनके वितरण शामिल किया जाता है। निजी वित्त को तीन भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है

NATURE AND SCOPE OF BUSINESS FINANCE

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i) व्यक्तिगत वित्त (Personal Finance) ii) व्यापारिक वित्त (Business Finance)   iii) गैर-व्यापारिक संगठनों का वित्त (Finance of Non-Profit Organisation)

व्यक्तिगत वित्त किसी एक व्यक्ति के कोषों की दैनिक आवश्यकता का प्रबंध करने में निहित सिद्धांतों और व्यवहारों के विश्लेषण से संबद्ध होता है। उघोग, व्यापार एवं वाणिज्य में कार्यरत लाभ कमाने वाले संगठनों से संबंधित सिद्धांतों, व्यवहारों, क्रियाविधियों एवं समस्याओं का अध्ययन व्यावसायिक वित्त के क्षेत्र में सम्मिलित होता है। गैर-लाभ वाले संगठनों के वित्त का धर्मार्थ, धार्मिक, शैक्षणिक, सामाजिक और अन्य इसी प्रकार के संगठनों के वित्तीय प्रबंध निहित व्यवहारों, क्रियाविधियों एवं समस्याओं से संबद्ध होता है।

व्यावसायिक वित्त का अर्थ Commercial finance means

शाब्दिक अर्थ में  ‘व्यावसायिक वित्त’ पद व्यवसायिक क्रियाकलापों  बोधक होता है इसकी रचना दो शब्दों को मिलाकर हुई है: (i) व्यवसाय  एवं (ii) वित्त । इसलिए ‘व्यवसाय एवं ‘वित्त’ इन दोनों शब्दों का आशय समझना अत्यावश्यक है जो ‘व्यावसायिक वित्त’ पद की सम्पूर्ण अवधारणा तथा उसके अर्थ को विकसित करने का प्रारंभिक बिंदु है। ‘व्यवसाय शब्द का शाब्दिक अर्थ ‘व्यस्त होने की स्थिति’ है। मानवीय आवश्यकताओं की संतुष्टि के लिए वस्तुओं और सेवाओं  उत्पादन तथा वितरण  संबंधित समस्त सृजनात्मक मानवीय गतिविधियों या क्रियाकलापों को सम्मिलित किया जाता है जो वस्तुओं के उत्पादन और विनिमय में परोक्ष रूप से सहायक होते हैं जैसे, यातायात, बीमा, बैंकिंग, एवं भण्डार गृह, आदि। जब आवश्यकता पड़े, उस समय धन की व्यवस्था करने को वित्त कहा जा सकता है। वित्त का तात्पर्य किसी संगठन के द्धारा धन के प्रवाह का प्रबंध करना होता है। इसका संबंध धन के हेर-फेर, प्रयोग एवं नियंत्रण में कौशल या पटुता का उपयोग से होता है।

विभिन्न विद्धानों ने ‘वित्त’ शब्द की भिन्न-भिन्न ढंग से व्याख्या की है। तथपि, वित्त के संबध में तीन मुख्य दृष्टिकोण होते है।

(i)  प्रथम दृष्टिकोण वित्त को एक व्यवसाय द्धारा सर्वाधिक उपयुक्त शर्तों पर अपेक्षित कोषों को उपलब्ध कराने से सरोकार रखता है। यह दृष्टिकोण ‘वित्त’ को कोषों के सृजन या इन्हें जुटाने तथा उन सभी वित्तीय संस्थाओं व साधनों के अध्ययन तक ही सिमित रखता है, जहाँ से कोष प्राप्त किये जा सकते हैं।

(ii) द्वितीय दृष्टिकोण ‘वित्त’ का रोकड़ से संबंध रखता है।

(iii) तृतीय दृष्टिकोण ‘वित्त’ को कोषों को जुटाने तथा उनके प्रभावी उपयोग से संबद्ध करता है।

‘वित्त’ और ‘व्यवसाय’ इन दोनों शब्दों का आशय समझने के उपरान्त हम ‘व्यावसायिक वित्त’ पद का आशय एक ऐसी क्रिया या प्रक्रिया के रूप में विकसित कर सकते हैं जो किसी एक व्यावसायिक संस्था द्धारा कोषों की प्राप्ति, कोषों के प्रयोग एवं लाभ के विवरण से संबंधित होती है। इस प्रकार, व्यावसायिक वित्त प्रायः वित्तीय नियोजन, कोषों की प्राप्ति, कोषों के प्रयोग व विभाजन एवं वित्तीय नियंत्रण का व्यवहार करता है।

व्यावसायिक वित्त को और भी तीन वर्गों में उप-विभाजित के सकते हैं: (i) एकल स्वामिगत वित्त, (ii) साझेदारी-संस्थागत वित्त, एवं (iii) निगम या कम्पनी वित्त।

Personal Finance, Business Finance, Finance of Non-Profit Organisation

व्यावसायिक वित्त का उपरोक्त वर्गीकरण व्यावसायिक संस्था के संगठन के तीन प्रमुख स्वरूपों पर आधारित है। संगठन के एकाकी स्वामित्व वाले स्वरूप के एक व्यक्ति ही एक व्यक्ति ही एक मात्र व्यावसायिक उपक्रम का प्रवर्तन, वित्त-पोषण और प्रबंध करता है। दूसरी और, साझेदारी किसी व्यवसाय को ष-स्वामियोंं के रूप में चलाने तथा इसके लाभ या हानियों  बाँटने के लिए दो या अधिक व्यक्तियों का एक संघ अथवा संबंध है। यह एकल-व्यापार वाले व्यवसाय के विस्तार अथवा दो या अधिक व्यक्तियों के मध्य किसी समझौता के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आ सकती है। साझेदारों का असीमित दायित्व होता है और वे व्यवसाय के जोखिमों को सामूहिक रूप से बांटते है संयुक्त स्कंध में धन या धन मूल्य का योगदान करते हैं। मुख्य न्यायाधीश मार्शल के शब्दों में,”निगम एक कृत्रिम व्यक्ति है जिसका अदृश्य, अमूर्त एवं केवल विधि की दृष्टि में अस्तित्व में होता है मात्र विधि का सृजन होने के कारण इसका केवल ऐसी सम्पतियों पर अधिकार होता है जो इसके सृजन के शाही पत्र द्धारा स्प्ष्टया या इसके अस्तित्व के कारण प्रदत होते हैं।” निगम का एक वैधानिक अस्तित्व होता है जिसका सिमित दायित्व होता है, जिसे शाश्वत उत्तराधिकार प्राप्त होता हो और जिसकी एक सर्व-मुद्रा होती है निगम या कम्पनी ही अपनी सम्पतियों का स्वामी होती है, न कीं इसके सदस्य स्वामी होते हैं, एवं निगम के दायित्व इसके सदस्यों का दायित्व।

वर्तमान युग में, व्यावसायिक क्रियाओं का संगठन के कम्पनी स्वरूप द्धारा प्रमुख रूप से संचालन किया जाने लगा है, अतः समामेलित या निर्गमित उपक्रमों के वित्तीय व्यवहारों व समस्याओं पर अधिक बल प्रदान करने की आवश्यकता का अनुभव किया जाता है। इसी कारण से ही कुछ अधिकृत विद्धान व्यावसायिक वित्त एवं निगम वित्त में कोई भेद नहीं करते हैं। यहीं नहीं, व्यावसायिक वित्त के सिद्धांतों का व्यावसायिक उपक्रम के छोटे तथा बड़े दोनों प्रकार के स्वरूपों में प्रयोग किया जा सकता है

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