मन भावनाओं के चिन्ह Mind Sign of Emotion

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इस मनोविज्ञान (Psychology) को समझते हुए जब हम मूल हिप्नोटिज्म (Hypnotism) की ओर बढ़ते हैं तो हम कुछ प्राचीन धारणाओं को भी मानने पर मजबूर हो गए हैं। अंतर तो केवल इतना है कि लोग मस्तिष्क की आवश्यकताओं को देवता को अर्पण कर देते हैं। हर दुःख ईश्वर दूर करेगा। सुखों का आनंद हम लेगें।

कहीं ऐसा तो नहीं इन दुःखों के अधिकतर भाग के जिम्मेदार हम स्वंय हैं। कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जो क्षय रोग (Tuberculosis) को भी वहम तक कह देते हैं। जबकि एक्सरे रिपोर्ट (X-ray report) साफ़ बताती है कि फेफड़े गल चुके हैं। ऐसे ही डर की बात है। यही डर इंसान के मन पर जब अपना प्रभाव डालता हैं तो वह अनेक रोगों का शिकार हो जाता है। जिस इंसान के मन में डर बैठ जाए उस पर दो प्रकार के प्रभाव देखने को मिलते हैं-



  1. फरार, यानी उससे भागने का प्रयास
  2. जवाबी हमला

इन दोनों ही सूरतों में हमारा दिमाग हमारे पुरे शरीर को प्रभावित करता है। यदि हमारी सुरक्षा शक्ति (Security Force) दृढ़ है तो हम इस डर का प्रभाव काम कर सकते है। यदि हमारा मन कमजोर हो तो यह हमारे पुरे शरीर को अपने प्रभाव में ले लेता है।

आपने यह बात तो सुन रखी होगी कि डर के मारे किसी व्यक्ति को पेचिश लग गई। इसका कारण यह होता है कि मन पर जब कोई अधिक बोझ पड़ता है तो उससे हमारे पेट की अंतड़ियों पर प्रभाव पड़ता है। खून का दौरा बढ़ जाता है । दिल की धड़कन तेज को जाती है। जिसके फलस्वरूप इंसान पर फाजिल भी गिर जाता है। जबाब साफ़ बोल नहीं सकती।

यह प्रभाव पड़ता है मन के डर का जो पूरे शरीर को ही अपनी चपेट में ले लेता है। हाल ही में अमेरिका (America) के एक बड़े शहर शिकागो (Chicago) में किसी ने यह खबर उड़ा दी कि पानी में ज़हर मिला हुआ है। बस फिर क्या था? उसी समय सारे अस्पतालों में फ़ोन पर फ़ोन बजने लगे। लोगों को यह समाचार भी सुनने को मिलने लगे कि इस जहर मिले पानी के कारण शहर में अनेक लोगों की मौत हो चुकी है। अब गो वह समय भी दूर नहीं जब हमारा भी नंबर लगेगा।

एक ही रात में सैकड़ों लोग बीमारियों में उलझ कर रह गए। जबकि यह खबर तो सिरे से ही गलत थी। केवल वहम और संदेह के कारण ही लोगों के मन में यह बात बैठ गई कि अब तो मौत आने ही वाली है। कुछ साल पहले की बात है जब जर्मनी (Germany) में मस्तिष्क (Brain) पर पड़े रहे बोझ का प्रभाव देखने को मिला। एक आदमी से डॉक्टरों ने कहा कि –तुम्हारा खून निकाला जाएगा। उसे एक टब में बैठाकर उसके शरीर में एक सुई लगा दी गई। उसका खून निकल कर पानी में गिरता रहा। पानी और खून मिलकर एक दर्दनाक (Causing Pain) दृश्य पेश कर रहे थे। जिसे देखकर वह रोगी बेहोश हो गया। उसे होश में लाने के लिए कई दवाइयाँ दी गई।

आपको यह सुनकर आश्चर्य होगा कि उस टब के पानी में खून था वह एक अलग नली से किसी जानवर के शरीर से निकाल कर टब तक पहुँचाया जा रहा था जिसे रोगी न यह समझा कि यह मेरे ही शरीर का निकला हुआ खून है।

इतना सारा खून मेरे ही शरीर से निकला है। यही डर उस रोगी की आत्मा (Spirit) में बैठ गया। एक अनहोनी (Untoward) सी बात का प्रभाव उसके मन पर इतना अधिक पड़ा कि वह बेहोश हो गया। यह बात तो प्रमाणित हो चुकी है कि हम मस्तिष्क (Brain)  के दास है और हमारा यही दिमाग हमारे पुरे शरीर पर अधिकतर जमाए हुए है। दिमाग में आने वाली हर कल्पना का प्रभाव हमारे पुरे शरीर पर पड़ता है। इस प्रभाव के कारण ही लोग कई प्रकार की बीमारियाँ खरीद लेते हैं।

अब मैं आपको कुछ स्थाई रोगों के बारे में बताता हूँ जिन के कारण मानव जीवन नर्क बना हुआ है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक “फ्राइड” (Fried) ने इस बात को सिद्ध करके दिखाया है कि मानव शरीर में दो शक्तियाँ काम करती हैं –

  1. जीवन में भय खाकर भागने की शक्ति
  2. चुंबकीय शक्ति (Magnetic Force) जो हमें प्रेम भी देती है और समय को देखते हुए घृणा भी।

मानव की आदिकाल से यह इच्छा रही है कि कोई उससे प्रेम करे। यही भावना उसके जीने का कारण बनती है। हमारे मन में जीने की आशा पैदा होती है। हर मानव के मन का कोई न कोई अर्थ तो होता ही है जब तक वह उस अर्थ से प्रेम करता है तब तक वह बड़े आनंद से जीवित रहता है। जब उसका यह अर्थ समाप्त हो जाता है तो उसका जीवन से मोह भंग हो जाता है। जब उसके मन से जीवन का मोह समाप्त हो जाए तो प्रेम के स्थान पर घृणा जन्म ले लेती है। यही नफरत तो एक दिन उसे अपने आप से होने लगती है। दूसरे लोगों के साथ भी वह घृणा का व्यवहार करता है।

“नफ़रत, घृणा” (Hate, Hatred)

यह एक ऐसी भावना है जो जीवन से मोह भंग करने का कारण बनती है। जैसे ही किसी इंसान का जीवन से मोह भंग हो जाए तो उसका मन इस दुनिया से भर जाता हैं। वह आत्महत्या (Suicide) करने की बात सोचने लगता है। असल में वह निराशा सहन नहीं कर सकता। उस समय उसका मन भी उसे यही कहता है कि इन दुःखों से बचने का एक ही रास्ता है –“मौत।” केवल मृत्यु ही इन दुःखों का अंत कर सकती है। यही अंतर है नफरत और प्रेम में। इनमें से एक तो जीना सिखाता है और दूसरा जीवन से नफरत सिखाता है। वह आत्महत्या (Suicide) करने पर मजबूर करता है।

नफरत के सामने तो इंसान एक दम बेबस होकर तड़पता रहता है। उसकी यही बेबसी और मज़बूरी उसे मृत्यु की ओर जाने पर मजबूर कर देती है। कई बार नफरत और प्रेम के इस नाटक में एक नया मोड़ आ जाता है वह है।

“संधि” (Treaty)

संधि की भावना उसे न तो मरने देती है और न ही जीवित रहने देती है। वह इन दोनों के बीच में लटकता रहता है ऐसे जीवन को कहते हैं SLOW DEATH अर्थात मानव धीरे – धीरे मृत्यु की ओर बढ़ता है।  धीरे – धीरे मरने के लिए यह जरुरी है कि मानव अपने शरीर में एक ऐसा ज़हर पैदा कर लें जो उसे  धीरे – धीरे मृत्यु तक पहुँचा दे।