Learn Equity Ratio, Long term Funds, Net Sales, Net Profit & Gross Profit

0
136
Interpretation of Equity Ratio and Particular Expenses Ratio all over india

समता अनुपात का निर्वचन (Interpretation of Equity Ratio) चूँकि समता अनुपात स्वामियों के कोष का कुल सम्पतियों के साथ संबंध का प्रतिनिधित्व करता है, अतएवं यह अनुपात अर्थात् कम्पनी की पूँजी में अंशधारकों का हिस्सा जितना ऊँचा होगा, कम्पनी की शोधनक्षमता की स्थिति उतनी ही अच्छी होगी। यह अनुपात उस सीमा का संकेत करता है जहाँ तक कम्पनी की सम्पत्तियाँ कम्पनी के लेनदारों के हित को प्रभावित किये बिना खोयी जा सकती हैं।

शोधनक्षमता अनुपात अथवा कुल दायित्वों का कुल सम्पतियों से अनुपात: यह अनुपात समता से जोड़ा भिन्न है और “100 – समता अनुपात” के रूप में इसकी सरलता से गणना की जा सकती है। समता अनुपात के उपर्युक्त के आधार पर शोधनक्षमता अनुपात = 100 – 66.67 % यानी 33.33 % होगा। यहाँ अनुपात संस्था के बाह्रा -लोगों की कुल दायित्वों का कुल सम्पतियों से संबंध की ओर संकेत करता है और इसकी गणना निम्नांकित विधि से कर सकते हैं:

Solvency Ratio = Total Liabilities = Total Liabilities to Outsiders / Total assets

यदि बाह्रा -लोगों ककिल दायित्व 2, 00, 000 रु है और कुल सम्पत्तियाँ 6, 00, 000 रु है, तो

Solvency Ratio = 200000/600000*100 = 33.33%

सामान्यतः कुल दायित्वों का कुल सम्पतियों अनुपात का नीचा होने का यह अर्थ है कि किसी संस्था की दीर्घ -कालीन शोधनक्षमता की स्थिति अधिक संतोषप्रद या स्थिर है।

स्थायी सम्पतियों का शुद्ध मूल्य से अनुपात अथवा स्थायी सम्पतियों का स्वामित्व कोष से अनुपात

यह अनुपात स्थायी सम्पतियों और अंशधारकों के कोष यानी अंश पूँजी, संचिति, आधिक्य व प्रतिधारित लाभ के योग के बीच संबंध स्थापित करता है। इस अनुपात की निम्नांकित प्रकार से गणना की जा सकती है:

Fixed Assets to Net Worth Ratio = Fixed Assets (after depreciation) / Shareholders’ Funds

इस प्रकार, यदि स्थायी सम्पतियों का हासित पुस्तक मूल्य 4 00, 000 रु है और अंशधारकों का कोष भी 4, 00, 000  रु है तो स्थायी सम्पतियों का शुद्ध मूल्य/ स्वामित्व कोष से प्रतिशत के रूप में अनुपात होगा :-

= 4 ,00, 000/ 4, 00,000*100 = 100%

स्थायी सम्पतियों का शुद्ध मूल्य से अनुपात यह संकेत करता है  कि अंशधारकों का कोष किस सीमा तक स्थायी सम्पतियों में लगा हुआ है। सामान्यतया, स्थायी सम्पतियों के क्रय का वित्त -पोषण संचय, आधिक्य व प्रतिधारित अर्जन को सम्मिलित करते हुए अंशधारकों की समता द्धारा  करना चाहिए। यदि अनुपात 100 % से कम है तो इसका यह तात्पर्य है कि स्वामियों का कोष कुल सम्पतियों से अधिक है और कार्यशील पूँजी  भाग की अंशधारकों द्धारा व्यवस्था की गयी है। जब अनुपात 100 % से अधिक होता है तो इसका यह अर्थ होता है कि स्थायी सम्पतियों के वित्त -पोषण के लिए स्वामियों का कोष पर्याप्त नहीं है और संस्था को स्थायी सम्पतियों के लिए वित्त की व्यवस्था हेतु बाहरी -लोगों पर निर्भर रहना पड़ा है। इस अनुपात के निर्वचन हेतु कोई ‘स्वयं -सिद्ध नहीं है बल्कि औघोगिक उपक्रमों की स्थिति में 60 से 65 प्रतिशत तक एक संतोषजनक अनुपात माना जाता है।

स्थायी सम्पतियों का कुल दीर्घ–कालीन कोष से अनुपात अथवा स्थायी सम्पति अनुपात

स्थायी सम्पतियों का शुद्ध मूल्य से अनुपात से भिन्न एक अन्य अनुपात स्थायी सम्पतियों का कुल दीर्घ-कालीन कोष से संबंध स्थपित करने केलिए ज्ञात किया जाता है जिसकी संगणना निम्न प्रकार करते है:

Fixed Assets ratio = Fixed Assets (after depreciation) / Total Long term Funds

दीर्घ -कालीन कोष में ऋण अनुपात में गणना किये गए अंशधारकों के कोष और दीर्घ-कालीन उधार शामिल किये जाते हैं। इस प्रकार, यदि ह्रास लगाने केपश्चात् स्थायी सम्पत्तियाँ 4, 00, 000 रु की हैं और कुल दीर्घ-कालीन कोष 500000 रु हा तो प्रतिशत रूप में स्थायी सम्पति अनुपात निम्नांकित होगा –

400000/500000*100 = 80%

यह अनुपात उस सीमा का संकेतक होता है जिस सीमा तक संस्था के दीर्घ-कालीन कोष द्धारा स्थायी सम्पतियों का वित्त -पोषण किया गया है। सामान्यतया, स्थायी सम्पतियों का योग दीर्घ-कालीन कोष के योग के बराबर होना चाहिए, अर्थात् यह अनुपात 100 % होना चाहिए। किन्तु उस स्थिति में जब दीर्घ-कालीन कोष से  सम्पत्तियाँ बढ़ जाती हैं तो इसका यह तात्पर्य है कि संस्था ने स्थायी सम्पतियों के भाग का वित्त -पोषण चालू कोष अर्थात्  कार्यशील पूँजी से किया है जो एक अच्छी वित्तीय नीति नहीं मानी जाती है और इसी प्रकार, यदि, कुल दीर्घ-कालीन कोष कुल स्थायी सम्पतियों से अधिक होता है तो इसका यह अर्थ है कि कार्यशील पूँजी की आवश्यकताओं के एक हिस्से की पूर्ति संस्था के दीर्घ-कालीन कोष से की गयी है।

(Vi) चालू सम्पतियों का स्वामियों के कोष से अनुपात (Ratio of Current Assets to Proprietors’ Funds)

इस अनुपात की गणना चालू सम्पतियों के योग को अंशधारकों के कोष की राशि से भाग देकर करते हैं। उदारहरणार्थ, यदि चालू सम्पतियों 2, 00, 000 रु है, तो चालू सम्पतियों का सम्पतियों के कोष से अनुपात प्रतिशत रूप में निम्नांकित होगा :

 Ratio of Current Assets to Proprietors’ Funds = Current Assets / Shareholders’ Funds *100

 = 200000 / 400000 *100 = 50 %

यह अनुपात बतलाता है कि अंशधारकों के कोष का कितना हिस्सा चालू सम्पतियों में विनियोजित है। इस अनुपात के लिए कोई ‘स्वयं -सिद्ध ‘ नियम या आदर्श नहीं हैं और व्यवसाय की प्रकृति के अनुरूप विभिन्न संस्थाओं के लिए भिन्न -भिन्न अनुपात हो सकते हैं।

(viii) ऋण सेवा अनुपात अथवा ब्याज आवरण अनुपात (Debt-Service ratio or Interest Coverage Ratio)

एक संस्था की ऋण-सेवा क्षमता का परीक्षण करने के लिए शुद्ध आय का ऋण सेवा से अनुपात अथवा सरल रूप में ऋण-सेवा अनुपात का प्रयोग किया जाता है। इस अनुपात को ब्याज आवरण अथवा आवरण अनुपात अथवा स्थायी प्रभार आवरण अथवा ‘इतने गुना अर्जित ब्याज’ के नाम से भी जाना जाता है। इस अनुपात की गणना ‘ब्याज और कर के पूर्व शुद्ध लाभ ‘ को स्थिर ब्याज प्रभार’ से भाग से भाग देकर करते हैं:

Debt-Service ratio or Interest Coverage Ratio = Net Profit (before interest and taxes) / Fixed Interest Charges

ब्याज आवरण अनुपात का निर्वचन (Interpretation of Interest Coverage Ratio)

ब्याज आवरण अनुपात बतलाता है कि ब्याज प्रभारों के भुगतान हरतु उपमब्ध लाभ द्धारा ब्याज कितना गुना आवृत है अर्थात्  लाभ देय होने वाले ब्याज का कितना गुना है। एक संस्था के दीर्घ -कालीन लेनदार अपने दीर्घ-कालीन ऋणों पर ब्याज चुकाने का संस्था की क्षमता जानने में रूचि रखते हैं। सामान्यतः यह जितना ऊँचा अनुपात होता है, उतना ही अधिक दीर्घ-कालीन लेनदार सुरक्षित होते हैं क्योंकि यदि संस्था के अर्जन में गिरावट आती है तो भी संस्था  अपने स्थिर ब्याज प्रभारों की वचनबद्धता को पूरा करने में समर्थ हो सकेगी। किन्तु बहुत ऊँचा ब्याज आवरण अनुपात संस्था के लिए अच्छा नहीं हो सकता है क्योंकि यदि संस्था वित्त के स्त्रोत के रूप में अपने ऋण का उपयोग नहीं के रही हो सकता है क्योंकि इसका अर्थ होता है कि संस्था वित्त के स्त्रोत के रूप में अपने ऋण का उपयोग नहीं कर रही सकता है ताकि प्रति अंश अर्जन  वृद्धि की जा सके। ब्याज आवरण अनुपात में अन्य स्थिर देयताओं जैसे पूर्वाधिकारी लाभांश का भुगतान तथा ऋण के किस्तों का पुनर्भुगतान पर कोई विचार नहीं किया जाता है। अतएवं कुछ लेखक के लिए कुल आवरण अनुपात के लिए सुझाव देते हैं जिसकी गणना निम्न सूत्र से की सकती है:

Total Coverage or Fixed Charge Coverage = Net Profit before interest and taxes / Total Fixed charges

इसी प्रकार, पूर्वाधिकार लाभांश आवरण अनुपात (Preference Dividend Coverage Ratio) की गणना इस प्रकार की जा सकती है:

Preference Dividend Coverage Ratio = Net Income (after Interest and Income tax) / Preference Dividend.

रोकड़ का ऋण सेवा से अनुपात (CASH TO DEBT SERVICE RATIO)

रोकड़ का ऋण सेवा से अनुपात जिसे ऋण रोकड़ प्रवाह आवरण अनुपात भी कहते हैं, ब्याज आवरण अनुपात पर एक सुधार  है

लाभदायकता का विश्लेषण अथवा लाभदायकता अनुपात (ANALYSIS OF PROFITABILITY OR PROFITABILITY RATIOS)

एक व्यावसायिक उपक्रम का प्राथमिक उद्देश्य लाभ अर्जित करना होता है। व्यवसाय में लाभार्जन को उसे जीवित बनाये रखने के लिए आवश्यक माना जाता है। लार्ड किन्स के शब्दों में “लाभ ऐसा इंजन होता है जो व्यावसायिक उपक्रम  को चालित करता है।” किसी व्यवसाय को न केवल अपने अस्तित्व के लिए ही वरन् विस्तार और विविधीकरण के लिए भी लाभ आवश्यक होता है। विनियोगकर्ता अपने विनियोग पर पर्याप्त प्रत्याय चाहते हैं, लेनदार अपने उधार तथा उस पर ब्याज के प्रति अधिक सुरक्षा चाहते हैं और इसी प्रकार अन्य संबधित लोगों की अपेक्षायें होती हैं। एक व्यावसायिक उपक्रम केवल लाभ उपार्जन के द्धारा ही समाज के विभिन्न अंगो के प्रति अपने दायित्वों का निर्वाह कर सकता है। इस प्रकार लाभ किसी व्यवसाय की समग्र कुशलता का उपयोगी माप है। प्रबंध के लिए लाभ कार्यक्षमता  परीक्षण अतएवं नियंत्रण का माप होता है; स्वामियों के लिए उनके विनियोग के मूल्य का माप होता है; लेनदारों के लिए सीमान्त सुरक्षा (margin of safety); स्वामियों के लिए अनुषंगी लाभों का एक स्त्रोत; सरकार के लिए कर देय क्षमता का माप एवं वैधानिक कार्यवाही के लिए आधार; ग्राहकों के लिए बेहतर गुणवत्ता एवं मूल्य में कटौती हेतु माँग संकेत; एक उपक्रम के लिए विकास और अस्तित्व हेतु वित्त का एक कम कष्टकर स्त्रोत  ; एवं अंत में राष्ट्र के लिए आर्थिक प्रगति के निदेशांक होते हैं। व्यवसाय की समग्र कार्यकुशलता का माप करने के लिए लाभदायकता अनुपातों की गणना की जाती है। सामन्यतः, लाभदायकता अनुपात या तो बिर्की  संबंध में अथवा विनियोग के संबंध में संगणित किये जाते हैं। विभिन्न लाभदायकता अनुपातों का आगे विवेचन किया जा रहा है।

(अ) सामान्य लाभदायकता अनुपात

निम्नलिखित अनुपात ‘सामान्य लाभदायकता’ अनुपात माने जाते हैं।

 (i)  सकल लाभ अनुपात (Gross Profit Ratio)

(ii) परिचालन अनुपात  (Operating Ratio)

(iii) परिचालन लाभ अनुपात (Operating Profit Ratio)

(iv) व्यय अनुपात (Expenses Ratio)

(v) शुद्ध लाभ अनुपात (Net Ratio)

(vi) नकद लाभ अनुपात (Cash Profit Ratio)

उपर्युक्त अनुपातों की व्याख्या निम्न प्रकार हैं:

सकल लाभ अनुपात (Gross Profit Ratio)

सकल लाभ अनुपात सकल लाभ का शुद्ध बिक्री से संबंध का माप करता है और इसे सामान्यतया प्रतिशत के रूप में व्यक्त किया जाता है।

Gross Profit ratio = Gross Profit / Net Sales *100

चूँकि सरल रूप में शुद्ध  का बिक्री  माल की लागत पर आधिक्य सकल लाभ होता है, इस प्रकार लाभ अनुपात के दो मूल अंग बिक्री  एवं बिके  हुए माल की लागत होती हैं। बिक्री में से  वापसी या आंतरिक वापसी को, यदि कोई हो, घटाकर शुद्ध बिक्री ज्ञात की जा सकती है। यदि हम 100 में से सकल लाभ अनुपात घटा दें तो बिक्री से बिके माल की लागत का अनुपात ममलूम हो जाता है। अतएव, उपर्युक्त उदाहरण में,

बिक्री पर बिके माल की लागत का अनुपात = (100 – सकल लाभ अनुपात)

(Ratio of Cost of Goods Sold to Sales) = 100-Gross Profit Ratio) = 100-20% =80%

 सकल लाभ अनुपात का निर्वचन (Interpretation of Gross Profit Ratio)

सकल लाभ अनुपात उस सीमा की ओर इंगित करता है जहाँ तक वस्तुओं का प्रति इकाई विक्रय मूल्य एक फर्म की क्रियाओं पर हानि हुए बिना गिर सकता है। यह उस कार्यक्षमता को प्रतिबिम्बित करता ऐ जिससे एक फर्म अपनी उत्पादों का उत्पादन करती है। चूँकि शुद्ध बिक्री में से बिके माल की लागत घटाकर सकल लाभ ज्ञात किया जाता है, अतएवं जितना ऊँचा सकल लाभ अनुपात होगा, उतना ही अच्छा परिणाम भी होगा। सकल लाभ अनुपात के लिए कोई प्रमाप या मानक स्तर निर्धारित नहीं है। यह एक व्यवसाय में भिन्न-भिन्न हो सकता है, किन्तु इतना पर्याप्त सकल लाभ होना चाहिए कि उससे प्रशासनिक व कार्यालय व्यय, विक्रय व वितरण व्यय, आदि परिचालन व्ययों को पूरा किया जा सके तथा स्थायी प्रभारों जैसे ह्रास, लाभांश व संचयो के एकत्रीकरण के लिए प्रावधान किया जा सके। एक नीचा सकल लाभ अनुपात सामान्यतः बेचे गए माल की उच्च लागत की ओर संकेत करता है जो प्रतिकूल क्रय नीतियों, कम बिक्री, निम्न विक्रय मूल्य,अत्यधिक प्रतिस्पर्द्धा,सयंत्र व  मशीनरी में अधिक विनियोजन, आदि के कारण हो सकता है।

एक से अधिक वर्षो के लिए अथवा उसी उघोग में कार्यरत विभिन्न संस्थाओं के सकल  लाभ अनुपातों का तुलनात्मक अध्ययन लाभदायकता का एक उत्तम माप माना जाता है। किन्तु इस अनुपात में हुए किसी महत्वपूर्ण परिवर्तन की  गहराई के साथ खोज -बीन करनी चाहिए क्योंकि सकल लाभा अनुपात में कोई वृद्धि न केवल आर्थिक कारकों में  परिवर्तन के कारण होती है जैसे लागत में संबंधी आनुपातिक वृद्धि के बिना विक्रय मूल्य में वृद्धि अथवा  विक्रय मूल्य में कमी किये बिना लागतों में कमी, बल्कि कुछ निश्चित भरमात्मक कारको के कारण भी हो सकती है जैसे अंतिम स्कंध का अधि-मूल्यांकन  प्रारम्भिक स्कंध का अल्प-मूल्यांकन आदि। तथापि, सकल लाभ अनुपात किसी संस्था की लाभदायकता के माप का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अनुपात होता है।

परिचालन अनुपात (Operating Profit Ratio)

परिचालन अनुपात एक ओर बिके माल एवं अन्य परिचालन व्ययों में संबंध स्थापित करने के साथ-साथ दूसरी ओर बिक्री के साथ संबंध स्थापित करता है। अन्य शब्दों में, यह बिक्री के प्रति रूपये के संदर्भ में परिचालन की लागत का माप करता है। परिचालन लागतो में शुद्ध बिक्री से भाग देकर इस अनुपात की गणना करते है और सामान्यतः इसे प्रतिशत के रूप में व्यक्त करते हैं। इस अनुपात की गणना के लिए निम्नांकित सूत्र का प्रयोग किया जाता है:

Operating Profit Ratio = Operating Cost / Net Sales * 100 = Cost of goods Sold + Operating expenses / Net Sales   * 100

इस अनुपात के दो मूल तत्व परिचालन लागत एवं शुद्ध बिक्री होती है माल की लागत में निम्नांकित व्ययों को जोड़कर परिचालन लागत ज्ञात किया जाता है। परिचालन व्ययों में निम्नांकित सम्मिलित होते हैं:

(अ) प्रशासनिक व कार्यालय व्यय जैसे, किराया, कर्मचारियों का वेतन, बीमा, संचालको का शुल्क, आदि।

(ब) बिक्री व वितरण व्यय जैसे,विज्ञापन, विक्रयकर्ताओं का वेतन, आदि।

उपर्युक्त संगणित अनुपात यह बतलाता है कि बिक्री का 80 % भाग परिचालन लागतों अर्थात् बिके माल का लागत तथा परिचालन व्ययों में प्रयुक्त हुआ है और केवल 20 % (100 -80 %) ब्याज प्रभार, आय-कर भुगतान, लाभांश एवं संचिति के रूप में लाभ को प्रतिधारित करने के लिए बचा हुआ है।

परिचालन अनुपात का निर्वचन

परिचालन अनुपात शुद्ध बिक्री के उस प्रतिशत की ओर संकेत करता है जो परिचालन लागत में खप जाता है। स्पष्टतः जितना ऊँचा परिचालन अनुपात होता है. उतना ही यह संस्था के लिए कम अनुकूल माना  जाता हा क्योंकि ब्याज, लाभांश तथा संचय के आवरण हेतु बहुत अल्प-सीमांत अर्थात् परिचालन लाभ बचता  है। इस अनुपात के लिए कोई स्वयं- सिद्ध या आदर्श  मानक नहीं क्योंकि यह संस्था से दूसरी संस्था में भिन्न हो सकता है जो उसके व्यवसाय की प्रकृति तथा उसकी पूँजी संरचना पर निर्भर करता है। फिर भी, एक निर्माणी उपक्रम की दशा में 75 से 85 प्रतिशत तक का यह अनुपात अच्छा  समझा जाता है। इस अनुपात के बारे में बेहतर राय  बनाने के लिए या तो अनेक वर्षो के लिए परिचालन अनुपात की गणना करके प्रवृति ज्ञात की जा सकती हा अथवा एक संस्था का उसी व्यवसाय या उघोग में संलग्न किसी अन्य संस्था से तुलना की जा सकती है।

परिचालन अनुपात परिचालन कार्यक्षमता का मापदण्ड माना जाता है किन्तु इसका सावधानीपूर्वक प्रयोग करना चाहिए क्योंकि यह अनेक अनियन्त्रणीय कारको द्धारा प्रभावित हो सकता है  जिस पर प्रतिष्ठान का कोई नियंत्रण नहीं होता है। साथ ही साथ, कुछ प्रतिष्ठानों में गैर -परिचालन व्ययों का महत्वपूर्ण और पर्याप्त भाग होता है और उन स्थितियों में परिचालन अनुपात भरमात्मक परिणाम प्रदान कर सकता है।

परिचालन लाभ अनुपात

इस अनुपात की गणना परिचालन लाभ को बिक्री से विभाजित करके केते हैं। परिचालन लाभ इस प्रकार  ज्ञात क्या जाता है:

Operating Profit = Net Sales – Operating Cost

Or = Net Sales – (Cost of Goods Sold + Administrative and Office Expenses+ Selling and Distributive Expenses)

(iv) व्यय अनुपात विभिन्न व्ययों का शुद्ध बिक्री से संबध को अभिव्यक्त करते है। परिचालन अनुपात व्ययों में औसत कुल विचरणों को प्रकट करता है। किन्तु कुछ ऐसे व्यय होते हैं जिनमे वृद्धि हो सकती है और कुछ व्ययों में गिरावट हो सकती है। अतएवं, व्यय अनुपातों की गणना व्ययों के प्रत्येक मद अथवा व्यय के समूह को शुद्ध बिक्री से विभाजित करके करते हैं। परिचालन अनुपात के विचरण के कारणों का विश्लेषण करने के लिए व्ययों के प्रत्येक व्यकितगत मद किसी विशिष्ट व्यय के विभिन्न मदों के समूह के लिए अनुपात की गणना की जाती है, जैसे बिक्री की लागत अनुपात, प्रशासनिक व्यय अनुपात, बिक्री व्यय अनुपात, प्रयुक्त सामग्री अनुपात, आदि। यह अनुपात जितना नीचा होगा उतनी ही अधिक लाभदायकता होगी। ऊँचा अनुपात निम्न लाभदायकता का परिचायक होता है। इस अनुपात का निर्वचन करते समय यह स्मरण रखना  चाहिए कि यदि बिक्री बढ़ती है तो स्थिर व्यय, जैसे किराया के लिए अनुपात गिरेगा और परिवर्तनशील व्यय के लिए अनुपात बिक्री के अनुपात में लगभग उतना ही रहेगा।

व्यय अनुपात की गणना हेतु निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग किया जा सकता है:

Particular Expenses Ratio = Particular Expenses / Net Sales * 100

व्यक्तिगत या विशिष्ट व्यय अनुपात की गणना इस प्रकार भी के सकते है:

  1. Cost of Goods Sold Ratio = Cost of Goods sold / Net Sales *100
  2. Administrative & Office Expenses Ratio = Administrative & Office Expenses Ratio / Net Sales * 100
  3. Selling & Distributive Expenses ratio = Selling & Distributive Expenses ratio / Net Sales * 100
  4. Non – Operating Expenses Ratio =  Non –  Operating Expenses Ratio/ Net Sales   *100

शुद्ध लाभ अनुपात (Net Profit Ratio)

शुद्ध लाभ अनुपात शुद्ध लाभ तथा बिक्री के बीच संबंध स्थापित करता है, और प्रतिष्ठान की निर्माणी, बिक्री, प्रशासनिक और अन्य क्रियाओं के संदर्भ में प्रबंध की कार्यदक्षता का परिचायक होता है। यह अनुपात संस्था की लाभदायकता का पूर्ण माप होता है और इसकी गणना इस प्रकार करते है:

  1. Net Profit Ratio = Net Profit after tax / Net Sales * 100
  2. Net Profit Ratio = Net Operating Profit / Net Sales * 100

इस अनुपात के दो प्रमुख अंग शुद्ध लाभ और बिक्री है। शुद्ध लाभ आय कर घटाने के पश्चात्  ज्ञात करते हैं और सामान्यतः इस अनुपात की गणना  करने के लिए शुद्ध लाभ में गैर -व्यापारिक आय और व्ययों को  सम्मिलित नहीं करते हैं। इस प्रकार व्यवसाय के बाहर किये विनियोग पर ब्याज, स्थायी सम्पतियों की बिक्री पर लाभ जैसी आयों और को स्थायी सम्पतियों की बिक्री पर हुई हानियों को छोड़ देते हैं। यह अनुपात अत्यंत उपयोगी माना जाता है क्योंकि यदि शुद्ध लाभ पर्याप्त नहीं है तो व्यावसायिक संस्था अपने वोनियोग पर संतोषजनक प्रत्याय प्राप्त करने के योग्य नहीं हो सकती है।

यह अनुपात प्रतिकूल आर्थिक स्थितियों जैसे मूल्य स्पर्द्धा, निम्न माँग आदि का सामना करने के लिए संस्था की क्षमता की ओर संकेत करता है। स्पष्टता, ऊँचा अनुपात अच्छे लाभदायकता का परिचालक होता है। किन्तु इस अनुपात का निर्वचन करते समय यह ध्यान में रखना चाहिए कि लाभ के निष्पादन की न केवल बिक्री के वरन् संस्था के वविनोयोग या पूँजी के संदर्भ में समीक्षा करनी चाहिए।