औसत संग्रह अवधि अनुपात का निर्वचन (Interetation of Average Collection period Ratio)

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Interpretation of Average Collection period Ratio at alloverindia.in

सत संग्रह अवधि’ दिनों की उस औसत संख्या का प्रतिनिधित्व करती है जितने दिनों के लिए एक संस्था को अपने प्राप्यों को रोकड़ में परिवर्तित करने हेतु प्रतीक्षा करनी पड़ती है। यह अनुपात देनदारों की गुणवत्ता या उनके स्वरूप का माप करता है। औसत संग्रह अवधि जितनी ही अल्प होती है, देनदारों  द्धारा त्वरित भुगतान होता है। इसी प्रकार, ऊँची संग्रह अवधि का आशय अकुशल संग्रह निष्पादन होता है जो अपनी चालू दायित्वों का भुगतान करने में फर्म की अल्प – कालीन भुगतान क्षमता या तरलता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है जो औणी संग्रह अवधि का विस्तार जितना दीर्घतर होगा उतना ही अशोध्य का निर्वचन ऋणों के अधिक अवसर होगें। किन्तु, अति अल्प संग्रह अवधि का निर्वचन करने में सावधानी बरतनी पड़ती है क्योंकि अति नीची संग्रह अवधि संस्था की उधार विक्रय की रूढ़िवादी नीति अथवा अपने ग्राहकों को संसाधनो की कमी के कारण उधार स्वीकृत करने की असमर्थता का घोतक होती है, और फलस्वरूप उसे बिक्री तथा लाभ खोना पड़ सकता है।

इस अनुपात के निर्वचन के लिए कोई ‘स्वयं-सिद्ध नियम’ या ‘प्रमाप नहीं है जिसका आदर्श के रूप में प्रयोग किया जा सके, क्योंकि एक संस्था के दूसरी संस्था में यह अनुपात भिन्न -भिन्न हो सकता है जो साख या उधार नीति, व्यवसाय की प्रकृति तथा व्यावसायिक दशाओं पर निर्भर करता है। इसलिए, संग्रह की कुशलता का मूल्यांकन करने के लिए औसत संग्रह अवधि की संस्था की उधार की शर्तों  से तुलना करनी चाहिए, और इसके अतिरिक्त, ऋण संग्रह के कुशलता में सुधार या अन्यथा स्थिति के आकलन के लिए विभिन्न वर्षों की प्रवृति ज्ञात की जा सकती है।इसी प्रकार, संस्था के औसत संग्रह अवधि की तुलना उघोग के अथवा समान व्यवसाय करने वाली अन्य संस्थाओं के औसत संग्रह के अवधि से करनी चाहिए।

इस बात पर विशेष ध्यान देना चाहिए कि देनदार आवर्त अनुपात अथवा संग्रह अवधि की गणना करते समय अशोध्य ऋण व संदिग्ध ऋणों या इस हेतु किये गये प्रावधानों को घटाने के पूर्व के व्यापारिक देनदारों के अंक की लेना चाहिए, अन्यथा प्राप्त परिणाम भरमात्मक हो सकते है जैसा कि निम्नांकित उदाहरण से स्पष्ट है:

                                                                        Rs.

Annual Credit Sales                                   25,000

Returns Inewards                                         1,000

Debtors                                                         3,000

Bill Receivable                                             1,000

Provision for doubtful debts                      200

Average collection period is 60 days  : i.e.,

  • 4,000*360/24,000 =60 days
  • (4,000-200)*360/24,000  =57 days

उपर्युक्त से यह परिलक्षित होता है कि द्धितीय स्थिति (ii) प्रथम (i) की अपेक्षा अच्छी है क्योंकि इस स्थिति में प्रथम स्थिति के 60 दिन के स्थान पर संगणित 57 दिन की औसत संग्रह अवधि है। किन्तु तथ्य यह है कि अकुशल संग्रहण के कारण द्धितीय स्थितीत में 200 रु अशोध्य ऋण हो गये हैं।

एक उत्पाद के साथ एक बिल्कुल नये बाजार में प्रवेश करने का प्रस्ताव है, जिसका कारोबार पहहले कभी नहीं हुआ है। इससे 4,00,000 रु. अतिरिक्त वार्षिक बिक्री होगी जिसमे 20 % का सकल लाभ दर है। ग्राहक 60 दिन (2 माह) की साख(उधार) की आशा रखेंगे और इसके लिए 3 माह के बराबर कच्चे माल के अतिरिक्त स्टॉक की आवश्यकता होगी। विघमान उत्पाद के साथ-साथ नये उत्पाद में प्रयुक्त कच्ची सामग्री की लागत बिक्री का 75 % होगी।

लेनदार / देय आवर्त अनुपात  (Creditors/ Payables Turnover Ratio)

व्यावसायिक क्रियाओं के दौरान एक फर्म को उधार क्रय करना पड़ता है और अल्प -कालीन दायित्व उठाने पड़ते हैं। माल का आपूर्तिकर्ता, यानी लेनदार, स्वाभाविक रूप से यह ज्ञात करने में रूचि रखता है कि एक फर्म अपने व्यापारिक लेनदारों का पुनर्भुगतान करने में कितना समय लेती है। लेनदार आवर्त के लिए मूलतः विश्लेषण उसी प्रकार कियाजाता है जैसा कि देनदार आवर्त अनुपात के संदर्भ में अपनाया जाता है, केवल अपवाद यह है कि व्यापारिक देनदारों के स्थान पर व्यापारिक लेनदारों को इस अनुपात के एक अंग के रूप में और औसत दैनिक बिक्री की जगह औसत दैनिक क्रय को एक दूसरे अंग के उप में लिया जाता है। देनदार आवर्त की अनुपात की तरह लेनदार आवर्त अनुपात को भी दो रूपों में संगणित किया जा सकता है:

  • Creditors/ Payables Turnover Ratio = Net Credit Annual Purchases /Average Trade Creditors

यदि उधार क्रय के बारे में सूचना  उपलब्ध न हो तो कुल क्रय के अंक  को अंश के रूप में लिया जाता है। व्यापारिक लेनदारों में विविध लेनदार तथा देय  विपत्र शामिल किये जाते हैं। यदि लेनदारों के प्रारम्भिक एवं अंतिम शेष ज्ञात न हो तो लेनदार में अंतिम शेष को अनुपात की गणना हेतु लिया जाना चाहिए। यह अनुपात उस वेग की ओर संकेत करता है जिससे लेनदारों का क्रय के संदर्भ में आवर्त हुआ है। सामान्यतया, लेनदारों का वेग जितना ऊँचा होगा, उतना ही यह अच्छा होगा अथवा जितना नीचा लेनदारों का वेग होगा उतना कम अनुकूल परिणाम होगा।

औसत भुगतान अवधि अनुपात   (Average Payment Period Ratio)

यह अनुपात उन औसत दिनों की ओर संकेत करता है जो कि एक संस्था अपने लेनदारों को भुगतान करने में लेती है। इस अनुपात की गणना करने के लिए निम्नांकित सूत्रों का प्रयोग करते हैं

  • Average Daily Payment Period Ratio = Average Trade Creditors (Creditors + Bills Payable) / Average Daily Purchases = Annual  Purchases / No. of Working Days in a Years

Or

 Average Payment Period =  Trade Creditors*No. of Working Days / Net Annual     Purchases

Or

Average Payment Period = No. of Working days / Creditors Turnover Ratio

उस स्थिति में जबकि उधार क्रय के बारे में सूचना उपलब्ध न हो तो कुल क्रय को ही उधार क्रय माना जा सकता है।

औसत भुगतान अवधि अनुपात का निर्वचन   (Interpretation of Average payment Period Ratio)

जैसा कि ऊपर कहा गया है, औसत अनुपात अवधि अनुपात उन दिनों की औसत संख्या का प्रतिनिधित्व करता है जो कि संस्था अपने लेनदारों का भुगतान करने  लेती है। सामान्यतया, नीचा अनुपात होने पर संस्था  तरलता स्थिति अच्छी होती  है और  जितना  ऊँचा अनुपात होता है, संस्था की स्थिति उतनी ही तरल होती है। किन्तु ऊँची भुगतान अवधि का अभिप्रायः संस्था द्धारा अधिक साख अवधि की सुविधा उठाना भी है और फलस्वरूप आपूर्तिकर्ताओं से उधार का अधिक से अधिक अधिलाभ प्राप्त करना है। किन्तु इस अनुपात के निर्वचन में एक व्यकित को सावधान रहना चाहिए क्योंकि ऊँचे अनुपात का यह भी आशय हो सकता है कि कम छूट की सुविधाये ली जा रही हैं अथवा उधार खरीदे गये माल के  लिए अधिक ऊँची कीमत दी गयी हो। इस अनुपात का उचित निर्वचन करने के लिए अच्छा होगा कि उघोग में कार्यरत विभिन्न संस्थाओं का तुलनात्मक विश्लेषण किया जय अथवा विभिन्न वर्षों के लिए इस अनुपात की प्रवृति ज्ञात की जाय।

कार्यशील पूँजी आवर्त अनुपात (Working Capital Turnover Ratio)

किसी प्रतिष्ठान की कार्यशील पूंजी का उसकी बिक्री से प्रत्यक्ष संबंध होता है। चालू सम्पत्तियाँ जैसे देनदार, प्राप्य विपत्र, नकद, स्कंध, आदि बिक्री में वृद्धि या कमी के साथ परिवर्तित होती है।

कार्यशील पूँजी = चालू सम्पत्तियां – चालू दायित्व

कार्यशील पूँजी आवर्त अनुपात शुद्ध कार्यशील पूँजी के उपयोग की गति या वेग की ओर संकेत करता है। यह अनुपात बतलाता है कि एक वर्ष के दौरान कार्यशील पूँजी का कितना गुना आवर्त अथवा फेर हुआ है। यह अनुपात उस कुशलता की माप करता है जिससे एक संस्था द्धारा कार्यशील पूँजी का उपयोग किया गया है। एक ऊँचा अनुपात कार्यशील पूँजी के कुशल उपयोग का परिचायक होता है जबकि नीचा अनुपात अन्यथा स्थिति अभिव्यक्त करता है। किन्तु अति ऊँचा कार्यशील पूँजी आवर्त अनुपात एक संस्था के ;लिए उत्तम स्थिति का घोतक नहीं होता। अतएव इस अनुपात के निर्वचन में सावधानी बरतनी चाहिए। उसी उघोग की विभिन्न वर्षो के लिए तुलनात्मक एवं प्रवृति विश्लेषणों की सहायता से इस अनुपात का सर्वोत्तम उपयोग किया जा सकता है। इस अनुपात की गणना निम्न प्रकार की जा सकती है :-

Working Capital Turnover Ratio = Cost of Sales / Average Working Capital

Average Working Capital   = Opening Working Capital + Closing Working Capital / 2

यदि बिक्री की लागत की राशि न हुई हो तो इसके स्थान पर बिक्री के अंक का गणना हेतु प्रयोग किया जा सकता है। दूसरी ओर, यदि प्रारम्भिक कार्यशील पूँजी का प्रयोग किया जा सकता है। ऐसी दशा में अनुपात निम्नवत्  होगा –

Working Capital Turnover Ratio = Sales / Net Working Capital

दीर्घ -कालीन वित्तीय स्थिति का विश्लेषण अथवा शोधनक्षमता का परीक्षण अथवा पूँजी ढाँचा अनुपात  (ANALYSIS

‘शोधनक्षमता शब्द का तात्पर्य किसी प्रतिष्ठान की उसके दीर्घ-कालीन कालीन दायित्वों को पूरा करने के सामर्थ्य से है। संस्था के दीर्घ -कालीन ऋणों में ऋणधारी, मध्यम और दीर्घ अवधियों के लिए ऋणों की व्यवस्था करने वाले वित्तीय संस्थान, क़िस्त पद्धति पर माल बेचने वाले लेनदार सम्मिलित किये जाते हैं। संस्था के अल्प -कालीन लेनदार मुख्य रूप से संस्था के अल्प-कालीन ऋणों कको पूरा करने की क्षमता जानने के लिए उत्सुक रहते है ; जबकि ऋणपत्रधारक एवं दीर्घ -कालीन ऋणपत्रदाता यह मालूम करने के लिए उत्सुक रहते है  कि दीर्घ-कालीन ऋणों पर ब्याज नियमित रूप से प्राप्त होता रहे, परिपक्क्ता पर मूलधन का पुनर्भुगतान हो जाय और उनका ऋण सुरक्षित रहे, आदि के संबंध के संस्था की क्षमता क्या है। इस प्रकार दीर्घ -कालीन शोधनक्षमता अनुपात इस बात का प्रतीक होता है कि संस्था की उसके द्धारा स्थिर ब्याज व लागतों का निर्वाह करने एवं उसके दीर्घ-कालीन उधारों से संबद्ध पुनर्भुगतान कार्यक्रम  के बारे में कितनी क्षमता है।

निम्नलिखित अनुपात किसी प्रतिष्ठान की शोधनक्षमता निर्धारित करने के उद्देश्य की पूर्ति करते हैं :-

  1. i) ऋण -समता अनुपात (Debt –Equity Ratio)

ii)निधि ऋण -कुल पूँजी करण अनुपात (Funded Debt- Total Capitalisation Ratio)

iii) स्वामित्व अनुपात (Propriertory Ratio) अथवा समता अनुपात (Equity Ratio)

  1. iv) शोधनक्षमता अनुपात (Solvency Ratio) अथवा क्लू दायित्वों का कुल सम्पतियों से अनुपात (Ratio of Total Liabitlies to Total Assets)
  2. v) स्थायी संतियो का शुद्ध मूल्य से अनुपात (Fixed Asstes to Net-worth ratio) अथवा स्थायी सम्पतियों का स्वामित्व कोष से अनुपात (Ratio of Fixed Assets to proprietors’ funds)
  3. vi) स्थायी सम्पतियों का दीर्घ -कालीन कोष से अनुपात (Fixed Asstes to Long-term Funds Ratio) अथवा स्थायी संपत्ति अनुपात (Fixed Asstes Ratio)

vii) चालू सम्पतियों का स्वामित्व कोष से अनुपात (Ratio of Current Assets to Propritors’Funds)

viii) ऋण सेवा अनुपात (Debt Serivce Ratio) अथवा ब्याज आवरण अनुपात (Interest Coverage Ratio)

  1. ix) रोकड़ -ऋण सेवा अनुपात (Cash to Debt Serivce Ratio)

(i)  ऋण – अनुपात (Debt –Equity Ratio)

ऋण -समता अनुपात, जिसे बाह्रा -आंतरिक समता अनुपात भी कहा जाता है, कि गणना संस्था की सम्पतियों के विरुद्ध बाह्रा- लोगों एवं स्वामियों के सापेक्षिक दावों की माप करने के लिए करते हैं। यह अनुपात बाह्रा संता या बाह्रा -पक्षों तथा  या अंशधारकों के कोष के मध्य संबंध अभिव्यक्त करता है। इस अनुपात की गणना निम्न दो प्रकार  जाती है :

Debt-Equity Ratio = Outsiders’ Funds / Shareholders’ Funds

Or Debt to Equity Ratio = External Equities / Internal Equities

ऋण -समता  अनुपात के दो मुलभूत अंग बाह्रा -लोगों का कोष अर्थात् बाह्रा समता तथा अंशधारकों का कोष अर्थात् आंतरिक समता होते हैं। बाह्रा लोगों के कोष में संस्था के बाहरी व्यक्तियों के सभी ऋण / दायित्व, चाहे वे दीर्घ -कालीन या अल्प -कालीन हों अथवा ऋणपत्रों, बांडो, बंधकों और विपत्रों के रूप में हों, सम्मिलित किये जाते है। अंशधारकों के कोष में समता अंश पूँजी, पूर्वाधिकार अंश पूँजी, पूंजीगत संचय, आयगत संचय और एकत्रित लाभों का प्रतिनिधित्व करने वाले संचय व आधिक्य जैसे आकस्मिकताओं के लिए संचय, सिंकिग फण्ड, आदि शामिल होते हैं। यदि कोई एकत्रित हानियाँ और आस्थगित व्यय हों तो उन्हें अंशधारकों का कोष ज्ञात करने के ये योग में से घटा देना चाहिए। इस प्रकार अंशधारकों के कोष में से जब एकत्रित हानियां और आस्थगित व्यय घटा दिए जाते है तो यह शुद्ध मूल्य कहलाता है तथा इस पर आधारित अनुपात को ऋणों का शुद्ध मूल्य पर अनुपात कहते हैं।

कुछ लेखको का यह मत है कि पुर्वधिकार अंश पूँजी को बाह्रा समता या बाह्रा लोगों के कोष में सम्मिलित करना चाहिए, न कि आंतरिक समता या अंशधारकों के कोष में। बाह्रा लोगों के  पूर्वाधिकार  अंश पूँजी को सम्मिलित केने का वे यह कारण बताते हैं कि इन अंशो पर एक स्थिर दर  से  लाभांश देय होता है और साथ ही एक निर्दिष्ट अवधि के उपरान्त उनका शोधन हो सकता है। इस प्रकार, इस अनुपात की गणना करने में पूर्वाधिकार अंशो के संबंध में व्यवहार के करने के बारे में लोगों के लोगों के मतों में भिन्नता पायी जाती है। तथापि, यह परामर्श दिया जाता है कि पूर्वाधिकार अंशो की प्रकृति तथा विश्लेषण के प्रयोजन पर उचित व्यवहार निर्भर करता है। शोधनीय पूर्वधिकार अंशो को  लोगों को  अंशधारकों के कोष में सम्मिलित किया जाना चाहिए।

ऐसी प्रकार  चलु दायित्वों के संबंध में भी लोगो में विवाद है। कुछ लेखक इस विचार के है कि चालू दायित्व दीर्घ -कालीन वचनबद्धता को प्रतिबिम्बित नहीं करते है अतएवं इन्हें बाह्रा -लोगो के कोष निकलते समय छोड़ देना चाहिए। चालू दायित्वों को शामिल न किये जाने के पक्ष में निम्निलिखित कारण बताये जाते हैं: (i)चालू दायित्व अत्यंत अल्पावधि में देय  होते हैं और उनके भुगतान के संबंध में संस्था की क्षमता का निर्णय तरलता अनुपातों द्धारा किया जाता है; (ii) ऐसे दायित्वों पर ब्याज की कोई महत्वपूर्ण रकम देय नहीं होती है (iii) वर्ष भर में चालू दायित्वों की रकम से भारी उच्चावचन होता रहता है। कुछ अन्य ऐसे भी लेखक है, जो यह सुझाव देते हैं कि ऋण समता अनुपात की गणना करते समय बाह्रा -लोगों के कोष में चालू दायित्वों को सम्मिलित किया जाना चाहिए जिसका कारण  यह है कि दीर्घ -कालीन उधार की तरह चालू दायित्व भी बाहरी लोगों के प्रति देयता का प्रतिनिधित्व करते है और वे जोखिम के एक महत्वपूर्ण निर्धारक होते हैं। फिर, हमारा यह मत है कि ऋण संता अनुपात की गणना करने के लिए चालू दायित्वों को बाह्रा -लोगों के कोष के आधार पर संगणित अनुपात को दीर्घ -कालीन ऋण का अंशधारकों के कोष से अनुपात कह सकते हैं, जो इस प्रकार है ;

Long-term Debt to Shareholder’s Funds (Debt-Equity Ratio)

= Long-term Debt / Shareholders’ Funds

ऋण -समता अनुपात का निर्वचन (Interpretation of Debt-Equity Ratio)

ऋण समता अनुपात की गणना यह माप करने के लिए की जाती है कि एक व्यवसाय में किस सीमा तक ऋण वित्त -पोषण का प्रयोग किया गया है। यह अनुपात संस्था की संपत्तियों के विरुद्ध स्वामियों और बाह्रा -लोगों के आनुपातिक दावों की ओर संकेत करता है। एक संस्था के समापन की दशा में बाहरी लोगों की लिए उपलब्ध तल्प के बारे में धारणा बनाना इस अनुपात का उद्देश्य होता है। सामान्य नियम यह है कि व्यावसायिक संस्था की सम्पतियों का वित्त -पोषण करने में सम्पतियों के कोष और बाह्रा -लोगों के कोष में एक समुचित सम्मिश्रण होना चाहिए। वैसे, स्वामी अपने विनियोग पर कम से कम जोखिम उठाने तथा बाहरी लोगों को नीची स्थिर दर से ब्याज का भुगतान करके अपने अर्जन को बढ़ाने की दृष्टि से बाह्रा -लोगों के कोष के अधिकतम प्रयोग द्धारा अपना व्यवसाय करना चाहते हैं। दूसरी ओर, बाह्रा -लोग चाहते हैं कि अंशधारी विनियोग करें तथा अपने आनुपातिक विनियोग के हिस्से का जोखिम उठायें। इसलिए, इस अनुपात का निर्वचन संस्था की वित्तीय नीति तथा उसके व्यवसाय की प्रकृति पर मुख्य रूप से निर्भर करता है। सामान्यतः 1:1 का अनुपात संतोषजनक अनुपात माना जाता है,यघपि यह सभी प्रकार के व्यवसाय के लिए कोई ‘स्वयं -सिद्ध ‘ अथवा प्रमाप स्तर नहीं हो सकता है। कुछ व्यवसायों में 2 :1 या उसके अधिक का अनुपात संतोषप्रद माना जा सकता है, उदाहरणार्थ ठेकेदार के व्यवसाय में।

सामन्यतया कहा जाता है कि एक नीचा अनुपात दीर्घ -कालीन लेनदारों के दृष्टिकोण से अनुकूल माना जाता हैक्योकि वित्त-पोषण में स्वामियों के कोष का एक उच्च भाग होने के कारण लेनदारों को अधिक सीमांत सुरक्षा भी प्राप्य हो जाती है। एक ऊँचा ऋण -समता अनुपात जो यह संकेत करता है कीं स्वामियों की अपेक्षा बाह्रा -लोग अधिक है, लेनदारों द्धारा अच्छा नहीं माना जा सकता है क्योंकि संस्था के समापन के समय ऊँचा भुगतान होने से उन्हें अपेक्ष तया कम सीमान्त सुरक्षा उपलब्ध होगी।किन्तु यह भी सावधानी बरतनी चाहिए कि संस्था के दृष्टिकोण से एक बहुत ऊँचा अनुपात प्रतिकूल भी हो सकता है क्योंकि संस्था ब्याज की अति ऊँची दर चुकाये बिना तथा लेनदारों के अनुचित दबाब और शर्तों को स्वीकार किए बिना उधार प्राप्त करने में समर्थ नहीं हो सकती है। इसी प्रकार, एक अति नीचा अनुपात अंशधारकों के लिए सन्तोषजनक नही हो सकता है क्योंकि यह इस बात का संकेत होता है कि संस्था अपने अर्जन को बढ़ाने के लिए कम लागत वाले बाह्रा -लोगों के कोष का प्रयोग करने में समर्थ नहीं रही है। इस प्रकार, इस अनुपात का निर्वचन विश्लेषण के उद्देश्य, संस्था की वित्तीय नीति और व्यवसाय की प्रकति पर निर्भर करता है।

निधि ऋण का कुल पूँजीकरण से अनुपात (Fund ed Debt to Total Capitalisation Ratio)

यह अनुपात बाह्रा -लोगों से प्राप्त दीर्घ-कालीन कोष और व्यवसाय में उपलब्ध कुल दीर्घ-कालीन कोष के मध्य संबंध स्थापित करता है। इस अनुपात में दो पदों का प्रयोग किया जाता है जो (i) निधि ऋण एवं (ii) कुल पूँजीकरण होते हैं। इन दोनों को इस प्रकार ज्ञात करते हैं :

Funded Debt = Debentures + Mortgage Loans +Bonds + Other Long-Trem Loans.

Total Capitalisation = Equity Share Capital + Preference Share Captial + Reserves and Surplus+Other undistributed reserves + Debentures + Mortgages Loans +Bonds + Other Long- Term Loans.

निधि ऋण कुल पूँजीकरण का वह भाग होता है जिसका बाह्रा -लोगों के द्धारा वित्त- पोषण किया जाता है। इस अनुपात की गणना निम्न प्रकार करते है।

Funded Debt to Total Capitalsation ratio = Funded Debt (Long term debt) / Total Capitalisation  * 100

यघपि कोई ‘स्वयं सिद्ध नियम नहीं है, फिर भी बाह्रा-लोगों पर कम निर्भरता अनस्था के लिए अच्छा होता है। यदि अनुपात अपेक्षतया कम है तो इसे अच्छा मानते है:  50 % से 55% तक का यह अनुपात सहनीय या टालने योग्य होता है, उससे ऊपर नहीं।

स्वामित्व अनुपात अथवा समता अनुपात (Proprietory ratio Or Equity Ratio)

ऋण समता से भिन्न अनुपात स्वामित्व अनुपात(Proprietor Ratio) है। जिसे समता  अनुपात (Equity Ratio) या अंशधारकों के कोष का कुल समताओं से अनुपात (Shareholders’ Fund to Total Equities Ratio) या शुद्ध मूल्य का कुल सम्पतियों से अनुपात  नाम से भी जाना जाता है। यह अनुपात अंशधारकों के कोष तथा संस्था की कुल सम्पतियों के मध्य संबध स्थपित करता है। स्वामियों के कोष का कुल कोषों (Proprietors’ +Outsiders’ funds or total assets) से अनुपात एक संस्था की दीर्घ -कालीन  शोधनक्षमता का निर्धारण करने का महत्वपूर्ण अनुपात होता है। इस अनुपात के अंग ‘अंशधारकों का कोष किआ आशय समता अंश पूँजी, पूर्वाधिकर अंश, पूँजी, अवितरित लाभ, संचितियाँ और आधिक्य के राशियों के योग से है। इस रकम में से संचित हानियों को घटा देना चाहिए। दूसरी ओर, कुल सम्पतियाँ प्रतिष्ठान के कुल संसाधनो का घोतक होती है। इस अनुपात की गणना नीचे दिये हुए सूत्र से ही जा सकती  है:

Proprietory ratio Or Equity Ratio = Shareholders’ Funds / Total Assets

यदि अंशधारकों के कोष 4, 00, 000 रु हैं तथा कुल सम्पत्तियाँ 6, 00, 000 रु हैं, तो,

Proprietory ratio Or Equity Ratio = 4, 00, 000/ 6, 00, 000 = 2:3

इस अनुपात को प्रतिशत के रूप में भी व्यक्त कर सकते हैं जो संस्था की कुल पूँजी से स्वामियों की पूँजी का प्रतिशत बतलाता है, जैसा कि नीचे   प्रदर्शित है:

 Proprietory Ratio or Equity Ratio = 4, 00, 000/ 6, 00, 000 *100   = 66.67%