स्वदेशी वस्तु खरीदने का देश में क्या आर्थिक प्रभाव पड़ेगा? जानिए, कैसे?

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Economic Impact In The Country To Buy Goods

यदि हम स्वदेशी भाव अपनाते हुए अपनी आवश्यकताओं के लिए स्वदेशी वस्तुएं ही खरीद कर राष्ट्रनिष्ठा का परिचय देवें तो एक वर्ग में ही दृश्य बदल जायेगा। आज देश में जुटे का चेरी पॉलिश, कोलगेट के टूथपेस्ट, विदेशी कारों आदि के स्थान पर उपलब्ध स्वदेशी उत्पाद खरीदें तो भारत अल्पकाल में विश्व के औधौगिक देशों की अग्र-पंक्ति में स्थापित हो जायेगा। वर्ष में ही विदेशी कंपनियाँ अपने समग्र उत्पादन तन्त्र के कीमत पर बेच कर जाने को बाध्य हो जाएगी। किसानों के उत्पादन जब हम खरीदेंगे व इससे यदि किसान की आय दोगुनी हो जाती है तो वह आय से बाजार से उत्पादकीय उधोगों का माल प्रचुरता में खरीदेगा-यथा बर्तन, पंखा, फ्रिज़, स्कूटर, टीवी, वस्त्रादि सम्मिलित है। उससे देश में ओधौगिक उत्पादन, रोजगार, आय, सरकार का कर राजस्व आदि सभी बढ़ेंगे और विकास का मार्ग पप्रशस्त होगा। भीलवाड़ा (राजस्थान) के वस्त्राधोग में सूटिंग्स, मोरवी (गुजरात) के सेरेमिक व घड़ी उधोग के, सूरत में रत्न सवंर्धन एवम साड़ियों व शर्टिंग्स की उधोगों और तिरुपुर (तमिलनाडु) में बुनाई वाले वस्त्रों, जोधपुर में हैण्डीक्राफ्ट व बंधेज, बीकानेर में भुजिया पापड़, कोटा में डोरिया साड़ी, जयपुर में सांगानेरी प्रिंट, बालोतरा में सूती वस्त्र उधोग आदि के संकुल हैं।

बीस वर्ष पूर्व तिरपुर की जनसँख्या 1.5 लाख थी व आज 8 लाख है। वहां 6 लाख लोग 14-14 किमी क्षेत्र में लगी 4000 वस्त्रउधौग इकाइयों में कार्यरत हैं। ऐसे उध्यम संकुलों को उद्यम सहायता संघ के रूप में विकसित करके इनके उत्पादों व ब्रांडों को और अधिक वैश्विक प्रतिष्ठा, पहचान व बाजार दिलाये जा सकते हैं। आज तिरुपुर के अनेक उत्पादक अपना उत्पाद अन्य विदेशी बहुराष्ट्रीय ब्रांडों के लिए बनाते हैं। वहां के उन उत्पादकों के स्वयं के ब्रांडों का विकास करके उन्हें अधिक लाभ की स्थिति में लाया जा सकता है। उर्ध्व सहायता संघों के मशयम से उन जटिल व उच्च प्रौधौगिकी के उत्पादों एक संवर्धन भी किया जा सकता है जिनके सम्बद्ध में हम भी अभी बहुत पीछे हैं।

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Indigenous economic impact in the country to buy goods

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कॉम्पोनेन्ट सेक्टर में गुणन प्रभाव से रोजगार व कारोबार विस्तार इसी से समझ आ जायेगा तथा यदि गॉंव के किसी व्यक्ति ने 200 रूपये का जूता वहां के मोचि से ख़रीदा 100-100 रूपये के दो नोट उस मोची की जेब में चले गए, उस मोची ने गॉंव के लोहार से जूता बनाने  औज़ार 200 रूपये का ख़रीदा तो वे ही 100-100 रूपये के दो नोट उस लोहार के पास चले जाते हैं। लोहार अगर दर्ज़ी से 200 रूपये से कपडे सिलवाता है तो वे ही 100-100 के दो नोट उसके पास चले जाते हैं और दर्ज़ी, किसान से 200 रूपये के उत्पाद खरीदता है तो वे 100-100 रूपये के दो नोट उसके पास चले जाते हैं। यदि तहसील, तालुका या गॉंव में वह 100-100 रूपये के केवल दो वहां पचास लोगों के बीच मे घूम जाते हैं तो 10,000 रूपये की आय सृजित होती है तो वहीँ अगर हमने बाटा का जूता पहना तो बाटा इंडिया लिमिटेड, जो इंग्लैंड की कंपनी है और वे 200 रूपये अगर इंग्लैंड चले गए तो एक प्रकार से वह मल्टीप्लयेर इम्पैक्ट से 200 रूपये अगर से उस तहसील में 10,000 रूपये की आय और 50 लोगों को योगक्षेम मिल सकता था वह 200 रूपये की राशि बाहर चली जाती है इससे हमारे अर्थतन्त्र को नुक्सान होता है।