IMPORTANCE OF CORPORATION FINANCE-FINANCIAL MANAGEMENT

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निगम वित्त, वित्तीय प्रबंध का महत्व (IMPORTANCE OF CORPORATION FINANCE-FINANCIAL MANAGEMENT):- वित्त किसी व्यवसाय का जीवन रक्त एवं स्नायु-तन्त्र होता है। जिस प्रकार जीवन को बनाये रखने के लिए मानवीय शरीर में रक्त का प्रवाह आावश्यक है, उसी प्रकार व्यवसाय के सुचारू संचालन के लिए वित्त अत्यावश्यक होता है। इसे बहुत ही ठीक एक विश्वव्यापी स्निग्धक के रूप में कहा गया है जो उपक्रम को गतिशील बनाये रखता है। कोई भी व्यवसाय, चाहे वह बड़ा, मध्यम या छोटा हो वित्त की पर्याप्त राशि के बिना आरम्भ नहीं किया जा सकता है। बिल्कुल प्रारम्भ की अवस्था से अर्थात्  व्यवसाय की स्थापना का विचार करने से लेकर आगे की अवस्थाओं तक यानि व्यवसाय का प्रवर्तन या स्थापना करने, स्थायी सम्पतियों को प्राप्त करने, अनुसंधान करने जैसे बाजार शोध, आदि, उत्पाद विकसित करने, मनुष्य और मशीन को कार्य पर बनाये रखने, प्रबन्धतन्त्र को प्रगति करने व मूल्यों का सृजन करने हेतु प्रोत्साहित करने के लिए वित्त की आवश्यकता पड़ती है। एक विघमान संस्था को भी अपने व्यवसाय का विकास करने तथा विस्तार करने के लिए और अधिक वित्त का आवश्यकता हो सकती है। इस प्रकार, वित्त के महत्व को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर नहीं कहा जा सकता है। व्यावसायिक वित्त का विषय विद्धानों और व्यवहारिक जगत में कार्यरत प्रबन्धकों इन दोनों के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो गया है। विद्धान-वृन्द की इस विषय अभी भी अपनी  विकासशील अवस्था में है एवं कार्यरत प्रबन्धकों का इस विषय में रूचि इसलिए होती है क्योंकि यह विषय अभी भी अपनी विकासशील अवस्था में है एवं कार्यरत प्रबन्धकों का इस विषय में रूचि इस कारण होती है क्योंकि किसी संस्था के सर्वाधिक महत्वपूर्ण निर्णय वित्त  से ही संबंधित होते हैं। निगम वित्त का महत्व इस तथ्य के कारण भी बढ़ गया है कि वर्तमान समय में अधिकांश व्यावसायिक क्रियाओं  संचालन संगठन के कम्पनी या निगम स्वरूप द्धारा ही किया जाता है। निगम या  कम्पनी उपक्रमों के उद्भ्व  निम्नांकित परिणाम हुए हैं:

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i) व्यावसायिक उपक्रमों के आकार और प्रभाव में वृद्धि, ii) निगमीय स्वामित्व का व्यापक वितरण, एवं iii) स्वामित्व और प्रबंध का पृथक-पृथक होना।

उपरोक्त तीन घटको ने निगम वित्त के महत्व ने और भी अधिक वृद्धि किया है। निगमीय उपक्रमों में स्वामी व्यापक स्तर  इधर-उधर बिखरे होते हैं और प्रबंध और स्वामित्व पृथक होते हैँ, अतः प्रबन्धतन्त्र को स्वामियों के आर्थिक कल्याण को अधिकतम करना होता है। एक संस्था की सफलता और उसका विकास उसके विनियोग पर मिलने वाले पर्याप्त प्रत्याय पर निर्भर करता है। निवेशक या अंशधारी किसी संस्था द्धारा तभी आकर्षित किये जा सकते हैं जबकि निगम वित्त में निर्धारित सिद्धांतों और क्रियाविधियों के प्रयोग द्धारा उनके धन को अधिकतम किया जाये। निगम  विषय का ज्ञान न केवल कार्यरत प्रबन्धकों के लिए ही महत्वपूर्ण है बल्कि  लोगों के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है जो निगम उपक्रम के साथ व्यवहार करते हैँ, जैसे निवेशक, ऋणदाता, बैंकर, लेनदार आदि, क्योंकि प्रबन्धतन्त्र के पास वित्तीय विवरणों में हेरा-फेरीकरने तथा ‘खिड़की प्रदर्शन’ करने का पर्याप्त अवसर सदैव उपलब्ध रहता है। 

आज के पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में, व्यावसायिक उपक्रमों का आकार दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है जिसके परिणामस्वरूप अत्यधिक सामाजिक और राजनैतिक प्रभाव से शक्ति सम्पन्न निगम साम्राज्यों की स्थापना हुई है। यह निगम वित्त को सब तरह से और अधिक महत्वपूर्ण बनाता है। इसके अतिरिक्त, यदि हम निगम वित्त को व्यावसायिक संस्थाओं द्धारा व्यवहार में लाये जाने वाले वित्तीय प्रबंध के रूप में लें तो वित्तीय प्रबंध के महत्व का निगम वित्त के महत्व के रूप में वर्णन किया जा सकता है। वित्तीय प्रबंध प्रत्येक प्रकार की संस्था के लिए चाहे किसी भी आकार-प्रकार व प्रकृति की हो, व्यवहार-योग्य होता है। यह छोटी संस्था के लिए जितना उपयोगी है उतना ही बड़ी के लिए भी लाभप्रद है। जिस प्रकार इसके प्रयोग से एक निर्माण इकाई आशा करती है उसी प्रकार एक व्यापारिक संस्था भी वर्सी ही लाभ प्राप्त कर सकती है। इस प्रकार यह विषय सभी प्रकार के स्वामित्व वाले महत्वपूर्ण और उपयोगी है। जहाँ कभी भी वित्त का प्रयोग होता है, वहाँ वित्तीय प्रबंध सहायक होता है। प्रत्येक प्रबंध के सर्वश्रेष्ठ और लाभप्रद ढंग से अपने कोषों के उपयोग करने का लक्ष्य होता है। अतएवं यह विषय सार्वभौमिक व्यवहार्यता की प्राप्ति  अग्रसर है।

यह किसी भी प्रकार के संगठन के लिए अपरिहार्य है क्योंकि यह निम्नांकित ढंग से सहायता करता है: i) किसी उपक्रम के सफल प्रवर्तन और वित्तीय नियोजन में; ii) जब कभी आवश्यकता हो न्यूनतम सम्भव लागत पर कोषों को प्राप्त करने में; iii) कोष के उचित प्रयोग तथा बँटवारा में; iv) सुदृढ़ वित्तीय निर्णय लेने के लिए; v) वित्तीय नियंत्रण के द्धारा लाभदायकता में सुधार करने हेतु; vi) निवेशकों एवं राष्ट्र के धन में वृद्धि हेतु एवं vii) व्यक्तिगत और निगम बचतों को बढ़ावा देने तथा गतिशील बनाने हेतु।

वित्त कार्य (FINANCIAL FUNCTION)

व्यवसाय विभिन्न कार्यों में वित्त कार्य का एक महत्वपूर्ण स्थान है। यह व्यवसाय के सभी क्रिया-कलापों का मुख्य केन्द्र होता है। यह एक ऐसा कार्य है जिसे प्रतिस्थापित करना अथवा समाप्त करना सम्भव नहीं है क्योंकि वित्त के अभाव में व्यवसाय को बंद करना पद सकता है। धन की आवश्यकता आरम्भ हो जाती है और व्यवसाय के जीवन-पर्यन्त बराबर बनी रहती है। व्यवसाय के विकास तथा विस्तार के लिए अपेक्षतया अधिक कोष की आवश्यकता होती है। इन कोषों का विभिन्न स्त्रोतों से सृजन करना पड़ता है। कोष-सृजन के लिए स्त्रोतों का चुनाव उन स्त्रोतों के गुण-दोष को ध्यान में रखते हुए किया जाता है। वित्त कार्य की सफलता इसके नियोजन पर निर्भर करता है। व्यवसाय में मुद्रा या धन की प्राप्ति ही पर्याप्त नहीं है, वरन उसका उपयोग अति महत्वपूर्ण है। जो धन प्राप्त किया जाता है , उसे वापस भी करना पड़ेगा। यदि इसका समुचित उपयोग किया गया है तो उसे वापस करना आसान होगा, अन्यथा प्राप्त धन के पुनर्भुगतान में कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं। अतः प्रबन्धतन्त्र के मस्तिष्क में मुद्रा या धन के लाभप्रद उपयोग का एक निश्चित प्रारूप होना चाहिए। वित्त का सृजन करना आसान हो सकता है, किन्तु उनकी पुर्नभुगतान करना कठिन हो सकता है। कोषों के अंतः प्रवाहों तथा बहिर्वाहों में समुचित अनुरूपता होनी चहिए।

वित्त कार्य संबंधी दृष्टिकोण (Approach to Finance Function)

वित्त कार्य से अनेक दृष्टिकोण संबद्ध हैं, किन्तु सुविधा की दृष्टि से विभिन्न दृष्टिकोणों को दो व्यापक वर्गों में विभाजित किया जा सकता है:

  1. परम्परागत दृष्टिकोण (The Traditional Approach)
  2. आधुनिक दृष्टिकोण (The Modern Approach)
  3. परम्परागत दृष्टिकोण (The Traditional Approach):- वित्त कार्य से अनेक दृष्टिकोण 1920 एवं 1930 के दशकों की अवधि से इसके विकास की प्रारम्भिक अवस्था से संबंध रखता है जब कि ‘निगम वित्त’ (‘Corporation finance’) शब्दों का प्रयोगम आज के शास्त्रीय जगत में जिसे ‘वित्तीय प्रबंध’ (financial management) के नाम से जाना जाता है, उसका वर्णन करने हेतु प्रयोग किया जाता था। इस के अनुसार वित्त कार्य के क्षेत्र का संबंध व्यवसाय के लिए आवश्यक कोषों की सर्वाधिक उपयुक्त शर्तों पर उपलब्धता से माना जाता था। यह के सृजन तक सीमित रखता था। कोषों का उपयोग वित्त कार्य के क्षेत्र के बाहर माना जाता था। यह देखा गया कि कोषों के उपयोग से संबंधित निर्णय संगठन के किसी अन्य स्तर पर किये जाते थे। हालाँकि, कोषों के सृजन के संस्थानों एवं विलेखों को वित्त कार्य का एक हिस्सा माना जाता था। इस प्रकार, वित्त कार्य के क्षेत्र का विस्तार तीव्रता से विकसित हो रहे पूंजी बाजार के संस्थानों, विलेखों तथा बाह्रा कोषों को जुटाने में निहित व्यवहारों के चारों ओर सीमित था। वित्त के कार्य व क्षेत्र के इस परम्परागत दृष्टिकोण का अब परित्याग कर दिया गया है, क्योंकि यह दृष्टिकोण कई भिन्न-भिन्न सीमाओं से ग्रस्त था।
  4. i) यह बाहरी-दृष्टि वाला दृष्टिकोण है क्योंकि इसमें कोष के उपयोग के विषय में आंतरिक निर्णयन को बिल्कुल उपेक्षा किया जाता है।
  5. ii) परम्परागत दृष्टिकोण का केन्द्र-बिन्दु दीर्घकालीन कोषों की प्राप्ति पर रहता था। इस प्रकार, इसमें कार्यशील पूँजी, वित्त और उसके प्रबंध जैसे महत्वपूर्ण विषय की अपेक्षा की जाती थी।

iii) कोषों के आवंटन की समस्या जिसे आज इतना महत्वपूर्ण मानते हैं, की भी बिल्कुल उपेक्षा की जाती थी।

  1. iv) इसमें एक संगठन की दिन-प्रतिदिन की वित्तीय समस्याओं पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है।
  1. आधुनिक दृष्टिकोण (The Modern Approach):- आधुनिक दृष्टिकोण वित्त कार्य को एक व्यापक दृष्टिसे देखता है। इस दृष्टिकोण में कोष जुटाने के साथ-साथ उनका समुचित उपयोग भी वित्त के कार्य-क्षेत्र केवल पर्याप्त कोषों पर्याप्त कोषों साधनों की खोज करने तक सीमित नहीं होता, बल्कि उनके उचित उपयोग  पर भी विचार किया जाता है। कोषों को जुटाने की लागत तथा उनके प्रयोग  प्रत्याशित प्रत्याय की तुलना की जानी चाहिए। अन्य शब्दों में कोष ऐसे होने चाहिए कि वे उन्हें प्राप्त करने में निहित लागत से अधिक प्रत्याय प्रदान करने में सक्षम हों। कोषों के उपयोग में निर्णयन क्रिया का समावेश होता है। इस प्रकार वित्त को समग्र प्रबंध के एक अभिन्न अंग के रूप में मानना चाहिए। इस दृष्टिकोण के अनुसार, वित्त कार्य की परिधि में वित्तीय नियोजन, कोषों का आवंटन, वित्तीय नियंत्रण, इत्यादि समाहित होते हैं। यह नया दृष्टिकोंण एक फर्म की वित्तीय समस्याओं को हल करने का एक विश्लेषणात्मक ढंग है। वर्तमान वित्त की जटिल समस्याओं की सुलझाने के लिए वित्तीय प्रबंध में मॉडलों, गणितीय प्रोग्रामिंग, स्टीम्युलेसन और वित्तीय  इंजीनियरिंग की तकनीकों का प्रयोग किया जाता है। आधुनिक दृष्टिकोण तीन आधारभूत प्रबंधकीय निर्णयों, यथा, वित्त कार्य के क्षेत्र के अन्दर आने वाले निवेश निर्णय, वित्त -पोषण निर्णय एवं लाभांश निर्णय पर विचार करता है।

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