Hypnotherapy Treatment Free From Any Disease Measures

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ह्य्प्नोथेरपी ट्रीटमेंट किसी भी रोग से मुक्त करने के उपाय। Hypnotherapy Treatment Free From Any Disease Measures

हम जब भी किसी रोग के उपचार की बात सोचते है तो डॉक्टर (Doctor) के पास जाते है और आज के 90 प्रतिशत डॉक्टर मात्र धन लोभ में और अपनी बिशेषता का सिक्का ज़माने के लिये रोगी को सबसे पहले यही कहेंगे कि एक्सरे करवाओ, ई. सी. जी. करवाओ, खून, पेशाब, मल चैक करवाओ।

एल्ट्रा साउंड (Ultra Sound) तक भी डॉक्टर पहुँच गए है। अब इन सब चीजों का खर्चा डॉक्टर की फीस और फिर दवाओं (Drugs) का खर्च। इन सब को मिलाकर हजारों रुपए के बिल बनेगें। यह सारे खर्च मिलाकर देखा जाए तो एक आदमी के लिये यह कहना ही पड़ता है कि – “इस जीवन से तो मौत ही अच्छी है। न तो नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी”

आज हम कहाँ पहुँच गये है ?

हमारे विचार क्या है ?



हमारे मन में दया, प्रेम आपसी भाई चारे के सब रिश्ते टूट चुके हैं। बस एक ही रिश्ता रहा नजर आता हैं- “धन ” “माया ” ” सम्पति “

“सामान तो सौ वर्ष का है, पल की खबर नहीं ” । मानवता तो दम तोड़ रही है। स्वार्थ की बहती गंगा में मानवता को डूबते देखकर इंसान का मन खून के आँसू बहाने लगता है और ऎसे स्वार्थी और लोभी (Selfish and Grasping) लोग जब भगवान के नाम की दुहाई देते हुए मंदिर में जाकर प्रसाद चढ़ाते है और तीर्थ यात्रा (The Pilgrimage) पर जाते है तो उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि उन से बड़ा धर्मात्मा और दयालु (Pious and Compassionate) शायद इस संसार में कोई नहीं। लेकिन किसी ने ठीक ही कहा है कि – ” माया मरी न मन मरे , मर मर गए शरीर । ”

माया कभी नहीं मरती। जब मरता है तो मानव ही मरता है। मृत्यु का कालदेवता सब कुछ खा जाता है। हर चीज़ का अंत हो जाता है। हर चीज़ का अंत हो जाता है। जिस माया को संग्रह करते –  करते अज्ञानी मानव ने संसार भर के पाप किये थे वह माया उसके साथ तो नहीं गयी, उसके अपने सगे सम्बन्धी भी साथ नहीं गए। अकेला मानव मृत्यु का ग्रास बन गया।

” मृत्यु ” नाम ही ऐसा है कि इसे सुनते ही हर आदमी को पसीना आने लगता है। अब प्रश्न यह उठता है कि –

“क्या डरने से मृत्यु रुक जाएगी ?” What will stop fearing death!

इसका उत्तर यही है कि मृत्यु तो अटल है, वह तो किसी प्रकार से भी रुक नहीं सकती। लेकिन यह भी बात आपको जान लेनी होगी कि प्रकति की ओर से मृत्यु का समय जन्म के साथ ही निश्चित कर दिया जाता है। उस समय से पूर्व यदि कोई इंसान मरता है तो वह उसकी अपनी भूल अथवा मन में बसी अनेक प्रकार की  शंकाएँ (Concerns) भी होती हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं कि मानव का मन बहुत चंचल है। इस संसार में माया जाल जो बिछाया गया है उसका लाभ कम हानि अधिक प्राप्त होती है। मन तो इच्छाओं का सागर (Desires of the Sea) है। इसमें सब से बड़ी इच्छा का नाम है – “लालसा ” का ही दूसरा नाम लोभ, मोह है। किन्तु इस लालसा के साथ ही मानव में और भी हजारों इच्छाएँ जन्म लेती रहती हैं। इतनी अधिक कि अंत क्या होगा ? ऐसा कोई नहीं सोचता । प्रकृति का यह खेल कितना विचित्र है कि एक मन में हजारों इच्छाएँ अपने आप जन्म लेती हैं और पूर्ति कितनी इच्छाओं की हो पाती है ? केवल कुछ ही इच्छाओं की। शेष इच्छाओं का क्या होगा ?

इसका उत्तर यही है कि मानव मन सफल और असफल हर प्रकार की इच्छा को आगे धकेलता रहता है। वही इच्छाएँ हमारे शरीर में फैल कर हमें जीवन का एक मार्ग दिखाने में सफल होती हैं। इसी कारण इस कहावत का जन्म (Proverbs birth) हुआ था – ” आवश्यकता जरुरत की माँ है।

इस आवश्यकता के कारण मन पर जो भोझ पड़ता है उससे हमारा शरीर अनेक रोगों का शिकार हो जाता है। इसी बात को देखते हुए वैज्ञानिकों ने सोचा (Scientists Thought) कि मानव को रोगों से बचाने का एक रास्ता यह भी हो सकता है कि हम अपनी इच्छाओं को कम कर दें। इससे मानव मन पर पड़ने वाला भोझ कम हो जाएगा और शरीर भी रोगों से बचा रहेगा अर्थात जिन रोगों का उपचार हम हजारों लाखों रुपयों की दवाओं से कम नहीं कर सकते हैं। इस बात का प्रमाण है हमारे प्राचीन धर्म ग्रंथो (Ancient Religious Texts) में ऋषियों मुनियों (Rishis Munis) के यह विचार कि- ” विचार शून्य ”

उन विद्वानों (Scholars) ने कहा है कि यदि हम विचार को शून्य मन बना दें तो हम अपने हर लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार के अनेक महापुरुषों के उदाहरण (Examples of Men) हमारे सामने आते हैं। मन को इच्छामुक्त बनाकर जो लोग महान बने हैं उसमें ” महात्मा बुद्ध ” का नाम सबसे उच्च श्रेणी में आता है। महात्मा बुद्ध (Buddha) को जब संसार के सबसे अधिक लोग भगवान मानने लगे तो भारत, (India) नेपाल, (Nepal) चीन, (China) जापान, (Japan) बर्मा, (Burma) सिंगापुर, (Singapore) श्रीलंका, (Sri Lanka) थाई, (Thai) वियतनाम, (Vietnam) मलेशिया, (Malaysia) इंडोनेशिया (Indonesia) जैसे और कई देशों में भी लोगों ने महात्मा बुद्ध को भगवान मानकर उसकी उपासना शुरू कर दी।

बुद्ध धर्म तलवार (Buddhism Sword) से तो संसार में नहीं फैला था। खूनी होली की शक्ति से लोगों को धर्म परिवर्तन के लिये तो कहीं पर मजबूर नहीं किया गया था। बुद्ध धर्म तो अपने आदर्शों और ज्ञान के साथ –  साथ मानव जाति की भलाई और उसके उत्तम चरित्र (Best Character) की शिक्षा के कारण ही फैलता चला गया। अब यह बात बताने की आवश्यकता ही नहीं  रह जाती की मन की शक्ति ही सबसे महान है।

माया और मन कभी नहीं मरते। जब मरता हैं तो केवल शरीर ही मरता है और मेरे विचार में तो रोगी शरीर मृत्यु से भी अधिक कष्टदायक (Painful) होता है। मन सर्वशक्तिमान (The Almighty) है क्योंकि इसमें स्वयं प्रभु का बसेरा होता है। जिस मानव के मन में पाप हो, गंदे विचार हो उसमें प्रभु कहाँ प्रवेश करेंगे। प्रभु तो केवल निर्विचार बनाना इतना सरल भी तो नहीं। इसके लिये तो बहुत कुछ करना पड़ता है। महात्मा बुद्ध और उन ऋषियों – मुनियों के उदाहरण हमारे सामने हैं।

तप, त्याग, उपासना ये ऐसे मार्ग हैं जिसमें मानव मन को बस में करने में सफल हो सकता है। यह सब केवल जंगलों में ही तो नहीं हो सकते। इस कार्य के लिये तो एकांत की आवश्यकता है। मन को बस में करने का मार्ग है ” ध्यान “।

ध्यान क्या है ? अपने मन के अंदर झाँक कर देखना। इसके लिए आपको चाहिए शांत और एकांत वातावरण। (Secluded Environment) तभी आप अपने मन के अंदर झाँकने में सफल हो सकते हैं। वह भी एक दिन में नहीं बल्कि धीरे – धीरे आपको अपने मन में झाँकने का अवसर मिलने लगेगा।

जिन लोगों के मनों में चिंताएँ हैं, कष्ट है दुःख दर्द समा चुका है उन्हें इस बारे में सफलता मिलना संभव नहीं। “ध्यान ” ही से हम इन सब चीजों पर काबू पा सकते हैं। ध्यान ही शक्ति है। (Internal Power) ध्यान का अर्थ  है मन की शांति। जब तक हमारा मन शांत न होगा हम कोई भी सफल कार्य नहीं कर सकेगें। ध्यान लगाने की सबसे सरल विधि  ” त्राटक ” है। इसी त्राटक के द्धारा हम अपने ध्यान को एकाग्र कर सकते हैं। जब ध्यान एकाग्र (Concentrate) होगा तो हम अपने मन में झाँक कर देखेंगे। इससे अन्य सारे विचार छूट सकेंगे। मन की शुद्धि का दूसरा नाम ज्ञान है। यह तभी सम्भव हो सकता है जब हम अपना ध्यान इस संसार से हटाकर आत्मा से लगा लेंगे।

बस यही आत्म ध्यान (Self-Care) हमारे लिये ईश्वर से बात करने का अवसर देता है। उस समय हम इस संसार से मुक्ति पा लेते हैं। आत्मा ज्ञान का दूसरा नाम ईश्वर है। इसी आत्मा में बसा है परमात्मा। इसे ही हिप्नोटिज्म विद्या (Learning Hypnosis) कहते हैं। हिप्नोटिज्म विद्या (Learning Hypnosis) पश्चिम की ही देन है। यही कारण है कि पश्चिमी देशों में हिप्नोटिज्म सर्वाधिक लोकप्रिय (Neurohypnology Most Popular) और सफल हो रहा है।

भारत में हिप्नोटिज्म (Neurohypnology) को लोग जादू टोना समझ बैठे हैं। यही कारण है कि पढ़े लिखे लोगों ने इसे इतनी लोकप्रियता नहीं मिल सकी। सरकारी तौर पर भी इसकी शिक्षा का कोई प्रबंध नहीं है। हम हिप्नोटिज्म (Neurohypnology) की असली तस्वीर लोगों को दिखा ही नहीं पा सके। हमारे साहित्यकारों (Writers) ने भी इस विषय की ओर कम ध्यान दिया है। जबकि यह विषय सीधा हमारे जीवन से जुड़ा हुआ है।

विश्व के सारे बड़े डॉक्टर इस बारे में एक मत है कि यदि हम अपने मन को शुद्ध रखें तो हम बहुत से रोगों से बचे रह सकते हैं। हाँ, इससे बड़े रोगों का उपचार (The Treatment) होना कठिन है। इससे तो साधाहरण रोगों पर काबू पाया जा सकता है। यह कोई जादू टोना नहीं बल्कि एक विद्या है, ज्ञान है।