रोगानुसार पथ्य – अपथ्य

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हृदय रोग, उच्च रक्तचाप (Hypertension)

पथ्य: गेहूँ का आटा, कम मात्रा में बाजरा एवं ज्वार, मूँग साबुत तथा अंकुरित दालें, काले चने, हरी पत्तेदार सब्जियाँ (पालक, मेथी, बथुआ), अजवायन, मुनक्का , अदरक,  नींबू,  लौकी, तुलसी पत्र,  तोरई पुदीना, परवल, सहिजन, कददू, टिंडा, करेला आदि। अँगूर, मौसमी, पपीता, अनार, संतरा, सेब, अमरुद, अन्नासास, बादाम, बिना मलाई का दूध, छाछ, अर्जुन छाल, सिद्ध दूध, सरसों, सूरजमुखी, सोयाबीन का तेल, शुद्ध गाय का घी, चीनी, गुड, शहद, मुरब्बे आदि।

अपथ्य: केक, पेस्ट्री, नान, रुमाली रोटी, नूडल्स, पिज्जा, बर्गर, नमक, तले एवं डिब्बाबंद खाद्य – पदार्थ, मक्खन, घी, खोया, मलाई, मांस, मछली, डालडा से बने पदार्थ, मैदा व बेसन से तले हुए पदार्थ, गरिष्ठ भोजन, कटहल, काजू, अखरोट, पिस्ता आदि सूखे मेवे, शराब, आचार, चटनी, साँस, तले पापड़, बिस्कुट, चिप्स, धूम्रपान आदि असेवनीय हैं।

विशेष निर्देश:

  1. साबुत अनाज व दालों का ही प्रयोग करें।
  2. रोज हल्का व्यायाम व सैर करें। खाने के एकदम बाद व्यायाम व सैर न करें।
  3. एक समय में वसायुक्त व भारी भोजन करने के बजाय हल्का भोजन थोड़े – थोड़े अंतराल से लें।
  4. खाँसी रहने की स्थिति में दही, कच्चा केला, टमाटर नहीं खाना चाहिए। दूध में दिव्य पेय डालकर प्रयोग करें।

मधुमेह (Diabetes Mellitus)

पथ्य: मिस्सा चोकर युक्त आटा, (गेहूँ + जौ + चना + सोयाबीन), मूँग, अरहर, चने की दाल, करेला, परवल, लौकी, तोरई, टमाटर, कददू, खीरा, हरी मिर्च, पालक, बथुआ, प्याज, लहुसन, नींबू, मेथी, सहिजन आदि की सब्जियाँ, आंवला, जामुन का फल व जामुन की गुठली का चूर्ण, मेथी दाने का पानी, प्रतिदिन 5 – 7 निम के कोमल पत्रों का सेवन, पपीता, अमरुद आदि फलों का अल्प मात्रा में प्रयोग किया जा सकता है। फीका दूध, छाछ, कषाय रस प्रधान फल का सेवन, भोजन के पश्चात 15 – 20 मिनट व प्रतिदिन 3 – 4 किलोमीटर टहलना चाहिए।

अपथ्य: अधिक समय तक बैठे रहना या आराम करना, भोजन के पश्चात दिन में सोना, नया अनाज, चावल, दही, गन्ने का रस, मौसमी, केला, अनार, अंजीर, चीकू, सेब, चीनी, गुड, मिश्री, आलू तथा धूम्रपान, मध्यपान का सेवन रोग को बढ़ाने वाला होता है। मूत्र व मल का वेग भी धारण नहीं करना चाहिए।

अतिसार, प्रवाहिका, संग्रहणी (Diarrhoea, Dysentery, sprue & Irritable bowel syndrome)

पथ्य: गेहूँ + चावल + बाजरा + मूँग को समान मात्रा में मिलाकर बनाया हुआ दलिया, बकरी का दूध, मटठा, पका केला, बेल फल, आँवला मुरब्बा, कच्चे नारियल का जल, पुदीना, खिचड़ी, दही, नीँबू + नमक + चीनी का घोल, बेल का मुरब्बा, मूँग व मसूर की दाल, धान का लावा (खील, मुरमुरे), दही + ईसबगोल मिलाकर खाना, लौकी, तोरई, टिंडा आदि सब्जियों का पानी, कुष्मांड खंड, नारिकेल खंड व फलों का रस सेवनीय होता है।

अपथ्य: पूड़ी, कचौरी, समोसा, पैटीज, विभिन्न प्रकार के उड़द व चने तथा मैदा से बने व्यंजन, चाट, आचार, अधिक नमक व मिर्च मसाले वाला भोजन, मिष्ठान्न, कददू, ककड़ी, टमाटर, आलू, पत्ते वाली सब्जियाँ, दूध, कोल्ड ड्रिंक्स, पिज्जा, बर्गर आदि का परहेज रखें।

अम्लपित्त (Acidity)

पथ्य: चोकरयुक्त आटे की रोटी, रेशेदार एवं पत्तेदार हरी सब्जियाँ, लौकी, तोरई, परवल, कद्दू, सहिजन, सेम, चौलाई की फली, सलाद व अंकुरित अन्न, सप्ताह में एक बार कब्जनाशक त्रिफला + इर्सबगोल का दूध या पानी के साथ प्रयोग, दलिया, खिचड़ी व ताजा मट्ठा, अनार, किशमिश, गुलकंद, मुनक्का, मूँग की दाल, मीठे एवं ठंडे पदार्थ, पेठा, आँवला व सेब का मुरब्बा।

अपथ्य: पूड़ी, हलवा, कचौरी, समोसा, पिज्जा, बर्गर, इडली, डोसा, चाय, कॉफी, कोल्ड ड्रिंक्स, उड़द, राजमा, चना, मसूर की दाल, गर्म मसाले, चावल, अमचूर, बैंगन, आलू गोभी, जिमीकंद, अचार, तैलीय पदार्थ, मैदा, बेसन व उड़द के बने पकवान व नमकीन, लाल मिर्च, तीखे पदार्थ, गरिष्ठ भोजन, बैंगन, कुलथी, दही, धूम्रपान, मध्यपान व जल्दी – जल्दी गर्म भोजन करना, मानसिक तनाव में रहना असेवनीय है।

नोट: अर्श, बिवन्ध, उदरगत वात व अन्य उदर रोगों में अदरक, नीँबू व विभिन्न प्रकार के नमको का सेवन हितकर होता है।

पाण्डु, कामला, यकृत शोथ , बी, सी, रक्तनिर्माणक रोग यकृत प्लीहा की वृद्धि तथा उनके रोग

(Jaundice, Anamia, Hepatitis A, B, C, Hematological disorders, Hepatosplenomegaly)

पथ्य: जौ, गेहूँ, चना की मिस्सी रोटी, हल्दी, खिचड़ी, दलिया, हरी – पत्तेदार सब्जियाँ (पालक, मेथी, बथुआ) लौकी, तोरई, घृतकुमारी, टिंडा, कददू, परवल, चौलाई, कच्ची मूली, पपीता, मौसमी, अनार, सेब, संतरा, लीची, बग्गुगोसा का फल, अंगूर, नारियल पानी, चीनी, मिश्री, आँवला, खजूर, मुनक्का, किशमिश, बकरी या गाय का दूध, ताजी दही, छाछ, रसगुल्ला व गन्ना चूसना व इसका रस हितकर है।

अपथ्य: गर्म मसाला, मिर्च, तेल, मिठाई, वसीय पदार्थ, पूड़ी, पराँठे, घी, आलू, चावल, मलाई वाला दूध, कुलथी, सरसों, लहसुन, हलवा, कचौरी, समोसा, पिज्जा, बर्गर, चाय, कॉफी, कोल्ड – ड्रिंक्स, उड़द, राजमा, चना, मसूर की दाल का सेवन व आधुनिक सभ्यता के बाजार के खाद्य पदार्थ का सेवन अहितकर है।

संधिशूल, शोथ, आमवात, वातरक्त, गृध्रसी, अस्थिगत मांसगत शूल, अदिर्त, विश्वाची वातज रोग

(Osteo Arthritis, Rheumatoid Arthritis, Gout, Sciatica, Skeletal & Muscular Pain, Facial Paralysis)

पथ्य: गेहूँ की रोटी, घृत व शक्कर डालकर बनाया हलवा, किसी भी प्रकार का अन्तः व बहिया स्नेहन, पुनर्नवा पत्रों का शाक, अनार, पक्का मीठा आम, अंगूर, एरण्ड तेल, मूँग की दाल, हींग, अदरक, सौंठ, मेथी, अजवायन, लहसुन, सहिजन के फूल व कच्ची फली की सब्जी, हल्दी, घृतकुमारी का सेवन, उष्ण जल का पान व स्नान, उष्ण वातावरण में निवास, सेवनीय होता है। गर्म जल में तेज नमक डालकर पीड़ा व सुजनयुक्त स्थान पर सिकाई करने से विशेष लाभ होता है।

अपथ्य: चना, मटर, सोयाबीन, आलू, उड़द, राजमा, मसूर, कटहल, फूलगोभी, खीरा, टमाटर, अमचूर, नीँबू, संतरा, अंगूर, दही, छाछ आदि खट्टा पदार्थ, भैंस का दूध, पेठा, ठंडा जल पीना व स्नान, सीलन व ठण्डे स्थान पर निवास करना अहितकर होता है।

प्रतिश्याय, कास, श्वास, श्वसन संस्थान के संक्रमण अनूजर्ताजन्य विकार (Ch. Rhinitis, Bronchitis, Br. Asthma, RTI, Respiratory Allergic disorders)

पथ्य: जौ, गेहूँ, मूँग, कुलथी की दाल, बैंगन, बथुआ, बकरी का दूध, मुनक्का, लौंग, इलायची, लहसुन, त्रिकुट, मधु, तेजपत्र, दालचीनी, जावित्री, उष्ण जलपान व स्नान, उष्ण वातावरण में निवास, दूध में हल्दी व सौंठ लगभग 2 –  2 ग्राम या शरीर की प्रकृति के अनुसार पकाकर पीयें, काली मिर्च व मुलहठी मुख में चूसना, भुने चने खाना हितकारी है।

अपथ्य: खीर, दही, सरसों, आइसक्रीम, फ्रिज का पानी, कोल्ड ड्रिंक्स, फ़ास्ट फ़ूड, जंक फ़ूड, खटाई, तली चीज़ें, इमली कैरी, आचार, ठंडी हवा, ठंडा जल, धूल, परागकण, धुँआ, नमी युक्त व गंदे वातावरण में प्रदूषित स्थान पर निवास सेवनीय है।

मोटापा (Obesity)

पथ्य: हल्का व सुपाच्य भोजन, अल्प मात्रा में गोदुग्ध, छाछ, प्रातः शहद व नींबू मिला उष्ण जलपान व व्यायाम, प्रातःकालीन भ्रमण, शारीरिक व मानसिक श्रम सेवनीय है। साथ ही सामान्य पथ्य और अपथ्य का भी पालन करें।

अपथ्य: किसी भी प्रकार की वसा व उसके उत्पाद, मीठा, भोजन के बाद शयन, दिन में शयन व जिह्वालोलुप होना, किसी भी प्रकार का गरिष्ठ भोजन, आलस्य करना असेवनीय हैं।

वृक्क रोग (Kidney Disease)

पथ्य: गाय के दूध की छाछ, ताजी दही (कम मात्रा में), गो – दुग्ध, पेठा, ककड़ी, परवल, धनिया, सौंफ, पुनर्नरवा, पपीता, सेब, अमरुद, मीठा आम, नागकेशर, लौकी, तोरी, टिंडा, कच्चा पपीता, कच्चा केला, सेमफली, सहजन की फली, गाजर, नारियल पानी, जौ पानी, अन्नानास का रस, पत्थरचट्टा के पत्ते, उबला हुआ पानी पीयें।

अपथ्य: मटर, दही, चना, राजमा, उड़द,  आलू, गोभी, पालक, चौलाई, टमाटर, चीकू, काजू, मशरूम, बैंगन, माँस, शराब, अदरक, लाल मिर्च, खटाई, नमक, काले पदार्थ, हरी मिर्च, अधिक व्यायाम त्याज्य हैं।

वृक्कशमरी (Renal Calculus /Stone)

पथ्य: चोकरयुक्त मिस्से आटे की रोटी, मूँग, कुलथी, अरहर की दाल, नींबू, गाजर, खीरा, ककड़ी, लौकी, तोरई, टिंडा, मौसमी, संतरा, करेला, नारियल पानी, जौ का पानी, पाषाणभेद के पत्ते, केला, अन्नानास का रस व द्रव पदार्थ, सौंठ, धनिया, पुदीना व अधिक मात्रा में पानी पियें।

अपथ्य: फूलगोभी, कददू, मशरूम, बैंगन, माँस, खट्टे व नमकीन पदार्थ, पालक, पनीर, टमाटर, चौलाई, आँवला, बीज वाले फल व सब्जी, चीकू, काजू, पत्ते वाली सब्जियाँ, प्याज, काला अंगूर, फास्फोरस एवं कैल्सियम वाले पदार्थ, मटर व विभिन्न दालें।

स्त्रीरोग (Gynecological Disorders)

पथ्य: सामान्य पथ्य का पालन करें।

अपथ्य: अधिक नमक, तेल, खटाई वाले पदार्थ, गर्म मसाला, आचार, चावल, उड़द, राजमा, आधुनिक व्यंजन, कटहल, आलू, जिमीकंद, रतालू बेसन, मैदा से बने पदार्थ।

त्वचागत रोग (Skin Diseases)

पथ्य: सामान्य पथ्य पालन करें।

अपथ्य: अम्ल व लवण रस युक्त भोजन, बैंगन,अरबी, उड़द, राजमा, छोले, आचार, तली चीज़ें, मैदा एवं बेसन से बने खाद्य पदार्थ, पिज्जा, बर्गर, पेटीज, पेस्ट्री, दूध, दही, गुड़, तिल, लहसुन, गर्म मसाले, अधिक उष्ण व सीलन युक्त वातावरण में निवास, साबुन व शैम्पू का अत्यधिक प्रयोग सौंदर्य प्रसाधन सामग्री का अधिक प्रयोग।

बाल रोग (Pediatric Diseases)

पथ्य: मातृ – दुग्ध, बकरी या गाय का दूध।

मनोरोग (Psychological Disorders)

पथ्य: शांत, एकांत व मनः प्रसन्नकारी स्थान, स्नान, अभ्यंग (मालिश), सकारात्मक विचार, भावात्मक सहयोग (Emotional support), ध्यान – प्राणायाम का अभ्यास एवं सामान्य पथ्य का पालन, वातनाशक आहार व विहार।

अपथ्य: मद्यपान, विरोधी आहार, उष्ण पेय व भोजन, भूखा व प्यासा रहना, निद्रा रोकना, अधिक नमक, सरसों का तेल, मसाला, आचार, तीक्ष्ण व उष्ण द्रव्यों का सेवन, अनुचित वातावरण, चिंता, भय, क्रोध, शोक, रात्रि जागरण व मानसिक दबाव।

सभी रोगियों के लिए सामान्य पथ्यअपथ्य

हितकारी पदार्थ:

गेहूँ मूँग की दाल (छिलके वाली),लौकी, तोरई, कच्चा पपीता, गाजर, टिंडे, पत्तागोभी, करेला, परवल, पालक, हरी मेथी,अंकुरित अन्न, सहजन की फली, चना, हरी मिर्च व अदरक (अल्पमात्रा में), गाय का दूध व घृत सर्वोत्तम है। गोदुग्ध उपलब्ध न होने पर ही भैंस के दूध  का प्रयोग करें।

फलों में सेब, पपीता, चीकू, अनार, अमरुद, बग्गुगोसा, जामुन, मौसमी आदि फलों का प्रयोग सामान्यता किया सकता है। सूखे मेवों में काजू, बादाम, मुन्नका, किशमिश, अंजीर, चिलगोजा, छुआरे, खजुरादि का प्रयोग करें

सर्वथा अहितकारी पदार्थ: चाय, कॉफी, कोल्ड ड्रिंक्स, आइसक्रीम, पिज्जा, बर्गर, पैटीज, इडली, डोसा, तम्बाकू, गुटखा, पान मसाला, माँस – मदिरा, अंडे व मैदे से बने ब्रेड आदि, कन्फैक्सनरी व सिंथेटिक फूड्स आदि अहितकर, अभक्ष्य व त्याज्य पदार्थोँ का सेवन कदापि न करें।

औषध सेवन की सामान्य विधि

  1. गोलियाँ व चूर्ण: गोली व चूर्ण खाने के लगभग 15 से 20 मिनट बाद लें। वात व कफ रोगों में गर्म जल से तथा पित्त रोगों से सामान्य जल से गोलियाँ व चूर्ण खाएँ। गोलियाँ चबाकर खाना उत्तम है। यदि गोली कड़वी हो तो बिना चबाये भी ले सकते हैं।

विशेष:

(i)  मुक्तावटी, मधुनाशिनी (मधुकल्प) व कायाकल्प वटी इनका सेवन भोजन करने से लगभग एक घंटा पहले ताजे पानी करें।

(ii) दस्त अथवा अम्ल पित्त  सेवनीय चूर्ण खाने से पहले वैध परामर्शानुसार लें।

  1. भस्म (पुड़िया): भस्म व रसादि का मिश्रण करके जो पुड़िया में दवा दी जाती है, उसको खाना खाने से लगभग आधे से एक घंटा पहले मधु, मलाई अथवा गर्म दूध से सेवन करें।
  2. आसव – अरिष्ट: सभी प्रकार के आसव, अरिष्ट खाना खाने के 10 – 15 मिनट बाद समान मात्रा में जल मिलाकर उपयोग में लाये जाते हैं।
  3. क्वाथ (काढ़ा): क्वाथ की औषधियों की मात्रा यदि 10 ग्राम है तो उसको लगभग 400 मिलीo पानी में पकाएँ तथा उबालते हुए जब लगभग 100 मिलीo शेष रह जाये तब छानकर पानी पी लें। यदि अधिक मात्रा में पानी न पीया जाये तो उबालकर पचास मिलीo तक कम करके पीयें। क्वाथ का स्वाद यदि कड़वा हो तो शहद या मीठा मिलाकर भी पी सकते हैं। वैसे मीठे के बिना पीना अधिक लाभप्रद है। क्वाथ की औषधियों को पकाने से लगभग 8 – 10 घंटे पहले भिगोकर रखना अधिक गुणकारी होता है।
  4. एक्यूप्रेशर: रोगानुसार निद्रिष्ट बिन्दुओं पर 30 से 40 बार तक अगुष्ठादि के माध्यम से दबाब डालें। एक्यूप्रेशर खाने से पहले करें। मर्म (नाजुक) स्थानों पर मध्यम बल का प्रयोग करते हुए दबाएँ। शारीरिक पीड़ाओं को दूर करने के लिए यह चामत्कारिक विधि है। यध्यपि प्रारम्भ में यह कष्टप्रद प्रतीत होता है; परन्तु इसका परिणाम बहुत सुखद है।
  5. मालिश: मालिश सदा ही हृदय की ओर उचित बल का प्रयोग करते हुए शनेः – शैनेः करनी चाहिए।
  6. क्वाथ स्नान:

(i) रोगानुसार दिए गये क्वाथ से यदि स्वेदन करना हो तो निदृष्ठ औषध को 1 – 1. 5 लीटर पानी में प्रेशर – कुकर में डालकर पकाएँ। जब सीटी से वाष्प निकलने लगे तब सीटी को हटाकर उसके स्थान पर गैस वाला रबड़ का पाइप लगा दें तथा पाइप के दूसरे सिरे से निकलती हुई वाष्प से रोग युक्त स्थान पर वाष्प दें। पाइप के जिस सिरे से वाष्प निकलती हैं, वहाँ कपडा लगाकर रखें। अन्यथा तेज उष्ण जल के छींटे शरीर को जलाकर रखसकते हैं। उचित समय तक वाष्प लेने के बाद शेष बचे जल से पीड़ायुक्त स्थान पर मध्यम उष्ण पानी डालते हुए सिकाई करें।

(ii) यदि वाष्प न सेकनी हो तो औषध को आवश्यकतानुसार 3 – 4 लीटर पानी में पकाएँ। जब उबलते हुए लगभग आधा पानी शेष रह जाये तो उचित गर्म जल को कपड़ा आदि के माध्यम से लेकर रोगयुक्त स्थान की सिकाई करें।

  1. योगासन प्राणायाम: प्रायः सभी साध्य – असाध्य रोगो में प्राणायाम का चामत्कारिक लाभ होता है। अपनी शक्ति व सामर्थ्य के अनुसार खाली पेट प्राणायाम नियमितरूप से अवश्य करें। संधिवात में सूक्ष्म व्यायाम, कमर व रीढ़ के दर्द में मेरुदण्ड के आसन करने से निश्चित लाभ मिलता है।