वित्त कार्य तथा अन्य व्यावसायिक कार्यों के संबंध का विवेचन निम्न प्रकार है

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क्रय कार्य(Purchase Function):- वस्तुओं का उत्पादन करने कि लिए सस्ती शर्तों पर सामग्री प्राप्त करनी चाहिए और अधिकतम उतपादकता प्राप्त करने के लिए इनका कुशल ढंग से उपयोग  चाहिए। इस कार्य के निष्पादन में वित्त प्रबंधक अपेक्षित वित्त की व्यवस्था करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है। लागत को न्यूनतम करने तथा अधिकतम नियंत्रण का प्रयोग करने के लिए आर्थिक आदेश मात्रा, स्कंध स्तर का निर्धारण, निरंतर स्कंध प्रणाली, इत्यादि जैसी विभिन्न सामग्री प्रबंध तकनीकों काप्रयोग किया जाता है। वित्त प्रबंधक का कार्य जब क्रय-बिलों की राशि देय हो उस समय रोकड़ की उपलब्धता की व्यवस्था करना है। उत्पादन कार्य (Production Function):-  उत्पादन कार्य व्यावसायिक क्रिया-कलापों में एक प्रभावशाली स्थान रखता है और यह एक निरंतर चलने वाली प्रकिया है। उत्पादन चक्र बहुत कुछ विपणन कार्य पर आश्रित होता है क्योंकि जब बिक्री के माध्यम से अगम होता है तभी उत्पादन करना न्यायपूर्ण ठहरता है। उत्पादन कार्य के लिए स्थायी सम्पतियों तथा कार्यशील पूँजी में भारी नियंत्रण किया जाना आवश्यक हो जाता है। यह भी देखना चाहिए कि न तो अति पूँजीकरण और न ही अल्प पूँजीकरण की स्थिति उत्पन्न हो जाये। लागत-लाभ सिद्धांत कोषों के आंवटन में आधारभूत पथ-प्रदर्शक होना चाहिए और वित्त प्रबंधक और प्रबंधक दोनों को एक दूसरे के साथ सामंजस्य के साथ कार्य करना चाहिए।

वितरण कार्य (Distribution Function):- वस्तुओं का उत्पादन विक्रय हेतु किया जाता है, अतः वितरण कार्य एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक क्रिया है। यह एक और दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण है क्योकि यह रोकड़ के बहिर्वाह को पूरा करने के लिए रोकड़ का निरंतर अंतर्वाह उपलब्ध करता है। इसलिए विभिन्न वितरण वाहिकाओं का चुनाव करने, विज्ञापन का स्वरूप तय करने तथा विक्रय वृद्धि की युक्तियाँ निश्चित करने के समय लागत-लाभ सिद्धांत एक पथ-प्रदर्शक होना चाहिए। यदि कुशलता के साथ समझौता किये बिना वितरण कार्य की लागत में कमी जाती है, तो यह उपक्रम के अधिक लाभ के रूप में तथा उपभोक्ताओं को कम लागत के रूप में अधिक से अधिक लाभान्वित करता है। चूँकि वितरण कार्य के प्रत्येक पहलू में रोकड़ बहिर्वाह निहित होता है और प्रत्येक वितरण क्रिया का उद्देश्य रोकड़ अंतर्वाह प्राप्त करना होता है। अतएवं ये दोनों कार्य एक दूसरे के साथ निकट समन्वय के साथ सम्पन्न करना चाहिए। लेखांकन कार्य (Accounting Function):- चालर्स जेस्टनबर्ग अभिलेखों की वैज्ञानिक व्यवस्था के प्रभाव का आभास करते हुए कहते हैं कि इसकी सहायता से कोष के अंतर्वाह तथा बहिर्वाह का अधिक दक्षता के साथ प्रबंध किया जा सकता है और अंशों तथा बांडों का कुशलता साथ विपणन किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, वित्तीय आंकड़ों के सही अभिलेखन के द्धारा सम्पूर्ण संगठन कार्यक्षमता में बहुत सुधार किया जा सकता है। वित्त नीति के मूल्यांकन के लिए आवश्यक सभी लेखांकन औजार और नियंत्रण युक्तियों को तभी सही-सही निरूपित किया जा सकता है जब लेखांकन आंकड़ों का ठीक-ठीक अभिलेखन किया जाये। उदाहरणार्थ, कोष जुटाने की लागत, इन कोषों के निवेश पर प्रत्याशित प्रत्याय, तरलता स्थिति, बिक्री का पूर्वानुमानम आदि से संबंधित बातों को प्रभावशाली ढंग से पूरा किया जा सकता है, यदि अभिलेखित आंकड़े विश्वसनीय व भरोसेमंद हों। इस प्रकार, लेखांकन और वित्त के बीच गहरा संबंध होता है एवं वित्त प्रबंधक लेखांकन आंकड़ों की शुद्धता पर बहुत अधिक आश्रित रहता है।

कार्मिक कार्य (Personnel Function):- कार्मिक कार्य को व्यावसायिक प्रबंध के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। जब तक कार्मिकों के दक्ष प्रबंध वाली कोई सुदृढ़ कार्मिक नीति न हो तब तक कोई भी व्यावसायिक कार्य कुशलता के साथ सम्पन्न नहीं किया जा सकता है। एक सुदृढ़ कार्मिक नीति में समुचित मजदूरी ढाँचा, प्रेरणात्मक योजनाएँ पदोन्नति के अवसर, मानव संसाधन विकास और कर्मचारियों  किये जाने वाले अन्य अनुषंगी लाभ सम्मिलित होते हैं। ये सभी प्रकरण वित्त को प्रभावित करते है। किन्तु वित्त प्रबंधक जानकारी रखनी चाहिए कि संगठन केवल उतना ही भुगतान करने में सक्षम हो सकता है जितना कि वह उसका वहन कर सके। इसका आशय है कि एक सुदृढ़ कार्मिक नीति बनाने में कार्मिक प्रबंध गये व्यय तथा श्रम उत्पादकता के माध्यम से इस प्रकार के निवेश पर प्रत्याशित प्रत्याय पर विचार किया जाना चाहिए। शोध एवं विकास (Research And Development):- नूतन विचारों और प्रतियोगिता वाले जगत में शोध एवं विकास पर किया जाने वाला व्यय एक उत्पादक निवेश होता है और संस्था को जीवित एक्ने तथा उसकी प्रगति  के लिए शोध एवं विकास स्वंय एक सहायक होता है। यदि विघमान उत्पाद में सुधार तथा उसे अधिक परिष्कृत बनाने नयी प्रकार की वस्तुएँ प्रस्तुत करने के लिए कोई निरंतर प्रयास नहीं किया जाता है तो यह तय है कि संस्था धीरे-धीरे बाजार से बाहर हो जायेगी और हो सकता है कि उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाये। हालाँकि कभी-कभी फर्म की वित्तीय क्षमता के विपरीत अनुपात में शोध व विकास पर भारी व्यय करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में इससे उपक्रम में वित्तीय निर्बलता उत्पन्न हो सकती है और किया गया व्यय  अन्ततोगत्वा विफलता के रूप में परिणत हो सकता है दूसरी ओर,शोध व विकास पर होने वाले व्यय में भारी कटौती उत्पाद में सुधार तथा विविधीकरण के क्षेत्र के अवरुद्ध के सकती है। अतएवं, शोध व विकास कार्य   आवश्यक राशि और इस उद्देश्य के लिए उपलब्ध कोष संतुलन होना चाहिए। प्रायः यह संतुलन वित्त प्रबंधक एवं शोध व विकास कर्णधारों  प्रयास द्धारा प्राप्त किया जा सकता है।   

वित्तीय प्रबंध एवं अर्थशास्त्र (Financial Management And Economics) :- वित्तीय प्रबंध अपनी सैद्धांतिक अवधारणाओं के लिए अर्थशास्त्र जैसे विषय पर बहुत अधिक निर्भर करता है। वित्त के सिद्धांत का विकास अर्थशास्त्र  अध्ययन की एक शाखा के रूप में प्रारम्भ हुआ। एक वित्त प्रबंधक को अर्थशास्त्र के दो क्षेत्रों  अर्थात् सूक्ष्मम या व्यस्टि अर्थशास्त्र  एवं बृहत्  या समष्टि अर्थशास्त्र से परिचित होना पड़ता है। सूक्ष्म या व्यष्टि अर्थशास्त्र में व्यक्तियों तथा फर्मों के आर्थिक निर्णयों का अध्ययन किया जाता है, जबकि बृहत् या समष्टि अर्थशास्त्र एक अर्थव्यवस्था को सम्पूर्ण या समग्र रूप में देखता है जिसके अंतर्गत एक विशिष्ट व्यावसायिक इकाई संचालित हो रही है। सूक्ष्म अर्थशास्त्र की अवधारणायें निर्णयन मॉडल विकसित करने, जैसे मूल्य निश्चित करना, लागत-मात्रा-लाभ विश्लेषण, सम-विच्छेद बिंदु विश्लेषण स्कंध प्रबंध निर्णय, दीर्घ-कालीन निवेश निर्णय जिसे पूँजी बजटन कहते हैं, रोकड़ एवं प्राप्त प्रबंध मॉडल अथवा कार्यशील पूँजी प्रबंध निर्णय, में वित्त प्रबंधक की सहायता करती हैं। एक फर्म अर्थव्यवस्था की समग्र निष्पादन द्धारा भी प्रभावित होती है क्योंकि  निवेश करने योग्य कोष की प्राप्ति हेतु मुद्रा और पूँजी बाजारों पर आश्रित होती है। इस प्रकार, वित्त प्रबंधक को समष्टि आर्थिक सिद्धांतों, मौद्रिक तथा प्रशुल्क नीतियों एवं समग्र रूप से अर्थव्यवस्था पर और विशेष  रूप से फर्म पर पड़ने वाले इसके प्रभाव व आधात को पहचानना व समझना चाहिए।